उज्जैन में पुलिस के साये में मां शिप्रा की आरती; लाठी और लहरों के बीच उलझा धार्मिक अधिकार का विवाद

The CSR Journal Magazine

उज्जैन में 11 साल बाद आरती के अधिकार पर संग्राम: रामघाट पर पंडों का जल सत्याग्रह

उज्जैन के रामघाट पर शिप्रा आरती के अधिकार को लेकर 11 साल पुरानी परंपरा और प्रशासनिक बदलाव के बीच गहरा संग्राम छिड़ गया है, जिसके विरोध में स्थानीय तीर्थ पुरोहितों की पंडा समिति ने मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के पवित्र जल में उतरकर ‘जल सत्याग्रह’ शुरू कर दिया है। उज्जैन के प्रसिद्ध रामघाट पर पिछले 11 वर्षों से नियमित रूप से संध्या आरती का संचालन कर रही श्री क्षेत्र पंडा समिति और प्रशासन (महाकाल मंदिर प्रबंध समिति) के बीच अधिकारों की यह लड़ाई अब पूरी तरह से सतह पर आ चुकी है। स्थानीय प्रशासन द्वारा आरती का अधिकार छीनकर श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के बटुकों को सौंपे जाने के बाद से रामघाट छावनी में तब्दील हो चुका है। इस प्रशासनिक आदेश के विरोध में पंडा समिति ने इसे परंपराओं पर आघात बताते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

विवाद का मुख्य कारण: 11 साल की परंपरा बनाम प्रशासनिक भव्यता

उज्जैन के रामघाट पर रोजाना सूर्यास्त के समय होने वाली माँ शिप्रा की भव्य आरती का एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। साल 2015 से निरंतर श्री क्षेत्र पंडा समिति के स्थानीय तीर्थ पुरोहित और पंडे पूरी निष्ठा के साथ इस आरती का आयोजन और प्रबंधन संभाल रहे थे।

विवाद की क्रोनोलॉजी

5 अगस्त के दिन जिला प्रशासन ने एक आधिकारिक आदेश जारी कर रामघाट की शिप्रा आरती की कमान आधिकारिक तौर पर श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति को सौंप दी। 6 अगस्त को महाकाल मंदिर समिति के बटुक (विद्यार्थी) जब रामघाट पर आरती की पूर्व तैयारी के लिए पहुंचे, तो पंडा समिति ने उनका कड़ा विरोध किया। दोनों पक्षों के बीच गतिरोध को देखते हुए प्रशासन ने मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।

पुजारी पंडों का जल सत्याग्रह

7 अगस्त शुक्रवार की शाम विवाद अपने चरम पर पहुंच गया। जैसे ही मंदिर समिति के बटुक आरती के लिए घाट पर लकड़ी के पाट (तख्त) बिछाने लगे, तीर्थ पुरोहितों ने उन्हें भौतिक रूप से रोक दिया। माहौल बिगड़ता देख एसडीएम एल.एन. गर्ग, एसडीएम पवन बारिया और महाकाल थाने की भारी पुलिस फोर्स ने मोर्चा संभाला। पुरोहितों को बलपूर्वक घाट से खदेड़ा गया और पुलिस के कड़े पहरे के बीच बटुकों से आरती संपन्न कराई गई। 8 अगस्त को पुलिसिया कार्रवाई और आरती के अधिकार छिनने से आक्रोशित पंडा समिति ने आज शाम 4 बजे से शिप्रा नदी की लहरों के बीच खड़े होकर ‘जल सत्याग्रह’ शुरू कर दिया है।

प्रशासन और महाकाल मंदिर समिति का रुख

प्रशासन का कहना है कि वे किसी की धार्मिक स्वतंत्रता या आजीविका को प्रभावित नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस व्यवस्था का आधुनिकीकरण और सौंदर्यीकरण कर रहे हैं। एसडीएम पवन बारिया के अनुसार, शासन इस आरती को हरिद्वार की गंगा आरती और अयोध्या की सरयू आरती की तरह व्यापक, सुव्यवस्थित और वैश्विक स्तर पर भव्य बनाना चाहता है। इसके लिए मंदिर समिति के प्रशिक्षित बटुकों की सेवा ली जा रही है।

संयुक्त आरती का प्रस्ताव खारिज

एसडीएम एल.एन. गर्ग ने स्पष्ट किया कि प्रशासन ने तीर्थ पुरोहितों के सामने प्रस्ताव रखा था कि वे महाकाल मंदिर के बटुकों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से आरती करें। परंतु, पंडा समिति पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में रखने की बात पर अड़ गई और उन्होंने इस सहयोगात्मक प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया।

धार्मिक परंपराओं को ‘इवेंट’ बनाने का विरोध

श्री क्षेत्र पंडा समिति के आरोपतीर्थ पुरोहितों का नेतृत्व कर रहे पंडित राजेश त्रिवेदी ने स्थानीय प्रशासन और नगर निगम पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। पुरोहितों का तर्क है कि भारत के सनातन तीर्थों को राजाओं या आधुनिक सरकारों ने नहीं, बल्कि सदियों से यहां की पंडा-पुजारी परंपराओं ने जीवित रखा है। पंडा समिति का कहना है, “धार्मिक आस्था और परंपराओं को कॉर्पोरेट या प्रशासनिक इवेंट का रूप देना पूरी तरह से गलत है।”

प्रशासनिक प्रताड़ना का दावा

पंडा समिति ने आरोप लगाया कि प्रशासन पिछले कुछ हफ्तों से सोची-समझी साजिश के तहत उन्हें हटाने की भूमिका बना रहा था। करीब 8-10 दिन पहले नगर निगम ने आरती में इस्तेमाल होने वाले साउंड सिस्टम और माइक जब्त कर लिए थे। इसके बाद घाट पर रखे लकड़ी के तख्तों और लोहे की टेबल को ‘अतिक्रमण’ बताकर हटाने का नोटिस थमा दिया गया, जिसका पुरोहित समाज ने तीखा विरोध किया है।

अतीत के विवाद और वर्तमान व्यवस्था का टकराव

रामघाट का यह संग्राम अचानक भड़का हुआ कोई तात्कालिक विवाद नहीं है। यदि बीते कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो रामघाट पर स्थानीय स्तर पर कई छोटे-छोटे विवाद होते रहे हैं। जुलाई 2026 के शुरुआती सप्ताह में रामघाट पर आरती के दौरान ही पुरोहितों और घाट पर फूल-दीपक बेचने वाली महिलाओं के बीच जगह को लेकर हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें लाठियां चली थीं और मामला थाने तक पहुंचा था। इसके अलावा, उज्जैन नगर निगम ने हाल ही में महाकाल की शाही सवारियों और श्रावण मास की सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए रामघाट से अवैध गुमटियां, काउंटर और तख्त हटाने का एक बड़ा अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया था। प्रशासन इन्हीं आंतरिक अव्यवस्थाओं, गुटबाजी और घाट पर होने वाले विवादों को खत्म करने के लिए पूरी व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेना चाहता था, ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को एक शांत और अलौकिक अनुभव मिल सके।

आस्था, परंपरा और आधुनिक प्रबंधन में संतुलन की आवश्यकता

उज्जैन, जो राजाधिराज बाबा महाकाल की नगरी और मोक्षदायिनी शिप्रा के आंचल में बसी सनातन संस्कृति का केंद्र है, वहां इस प्रकार का टकराव किसी भी दृष्टिकोण से सुखद नहीं है। प्रशासन का आरती को भव्य और वैश्विक स्वरूप देने का उद्देश्य तो सराहनीय है, लेकिन 11 वर्षों से निस्वार्थ भाव से धार्मिक अनुष्ठान करा रहे स्थानीय पुरोहितों को पुलिस बल के दम पर पूरी तरह बेदखल कर देना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था और धार्मिक संवेदनशीलता के अनुकूल प्रतीत नहीं होता। वर्तमान में पंडा समिति का ‘जल सत्याग्रह’ जारी है और पूरे मध्य प्रदेश के तीर्थ पुरोहितों का समर्थन इस आंदोलन को मिल रहा है। इस गतिरोध को समाप्त करने का एकमात्र उपाय यही है कि प्रशासन पंडा समिति को विश्वास में ले और उनके धार्मिक अधिकारों का सम्मान करते हुए, उन्हें महाकाल मंदिर समिति के साथ एक सम्मानजनक हिस्सेदारी दे। जब तक दोनों पक्ष संवाद की मेज पर बैठकर एक साझा रास्ता नहीं निकालते, तब तक अवंतिका नगरी के रामघाट पर आस्था की लहरों के बीच अधिकारों का यह संग्राम यूं ही उबलता रहेगा।

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