सुप्रीम कोर्ट का CBSE की 3-भाषा नीति पर रोक लगाने से इनकार, कहा-भाषा सीखना बेकार नहीं जाता

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: CBSE की 3-भाषा नीति पर रोक लगाने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) की नई 3-भाषा नीति (Three-Language Policy) पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि “कोई भी भाषा सीखना कभी बेकार नहीं जाता”। यह नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत मौजूदा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जा रही है। इसके तहत कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है, जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं (Native Indian Languages) होना जरूरी है।

3-भाषा नीति को लेकर विवाद बढ़ा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 जुलाई) को सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) की 3-भाषा नीति को पलटने से इंकार कर दिया है। यह नीति अगले शैक्षणिक वर्ष 2026-27 से लागू होने जा रही है। कोर्ट ने इस मामले में याचिकाएं दायर करने वाले छात्रों की चिंताओं पर गौर करते हुए सुनवाई को अगले हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया।

छात्रों की चिंताएं और नई नीति

याचिकाकर्ताओं ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्या कांत की अध्यक्षता में सुनवाई के दौरान अपनी बात रखी। उनके अनुसार, नई नीति के तहत क्लास 9 के छात्रों को दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाएंगी। यह स्थिति उन छात्रों के लिए कठिनाइयाँ पैदा कर सकती है, जो पहले से क्लास 5 से अपनी मूल भाषाएं पढ़ रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं की चिंता

दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के अभिभावकों व शिक्षकों ने याचिका दायर कर CBSC के 15 मई के सर्कुलर को चुनौती दी थी। उनका कहना है कि अचानक नीति लागू होने से उन छात्रों को दिक्कत होगी जो कक्षा 5 से कोई विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच, जर्मन) पढ़ रहे हैं, क्योंकि अब उन्हें कक्षा 9 से दो भारतीय भाषाएं चुननी होंगी। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में चिंता जताई कि स्कूलों के पास नई भाषाओं के लिए पर्याप्त शिक्षक और पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं।

अंग्रेजी को ‘गैर-मूल’ भाषा मानने का मुद्दा

याचिकाकर्ताओं ने यह भी उठाया कि नई नीति के तहत अंग्रेजी भाषा को ‘गैर-मूल’ (non-native) भाषा माना गया है। उनकी चिंताओं का मुख्य बिंदु यह था कि क्या सरकारी स्कूलों में मूल भाषाओं के लिए अच्छे शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।

CBSC का रुख

CBSC ने कोर्ट को बताया कि उसके करीब 47% स्कूलों में पहले से ही दो या अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि विदेशी भाषाओं पर कोई प्रतिबंध नहीं है; छात्र इसे चौथी (अतिरिक्त) भाषा के रूप में चुन सकते हैं। छात्रों को राहत देने के लिए सीबीएसई ने साफ किया है कि तीसरी भाषा (R3) के लिए कक्षा 10 में कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी, बल्कि इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही किया जाएगा।

कोर्ट की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी भाषा सीखना कभी भी बेकार नहीं जाता। इस परिभाषा के तहत, 3-भाषा नीति को सकारात्मक रूप में देखने की आवश्यकता है। यह बोलचाल से जुड़ी भाषा और दृष्टिकोण को व्यापकता प्रदान कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, CBSC और NCERT को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विस्तृत सुनवाई के बाद ही कोई अंतिम आदेश दिया जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को तय की गई है, तब तक यह नीति प्रभावी रहेगी।

शिक्षा में भाषा का महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न भाषाओं का ज्ञान छात्रों को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है। यह उनके लिए बेहतर नागरिक बनना और सामाजिक साक्षरता के स्तर को बढ़ाने में सहायक हो सकता है। छात्रों का भाषाई कौशल उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा में मदद करेगा, जो कि आधुनिक शिक्षा की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

आगे क्या होगा?

अब सभी की निगाहें अगले हफ्ते होने वाली सुनवाई पर होंगी। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि कोर्ट इस नीति की पुनरावृत्ति के लिए उचित कदम उठाए। हालांकि, इस संबंध में केंद्र सरकार का क्या रुख रहेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। वर्तमान में इन सबके बीच छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

नीति के इस बदलाव का दूरगामी असर होगा। यह न केवल छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित करेगा, बल्कि इससे संबंधित राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे भी भड़क सकते हैं। विभिन्न भाषाओं को समाहित करने वाले इस नीति पर व्यापक बहस होने की संभावना है।

सरकार और कोर्ट के अगले कदम का इंतजार

भाषा को लेकर देश की विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कई सामजिक मुद्दों को जन्म देती है। कोर्ट के इस निर्णय से कई छात्र और अभिभावक चिंतित हैं। अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर सरकार और कोर्ट का क्या अगला कदम होगा, और क्या यह नीति शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला सकेगी।

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