मुंबई में BMC की नई पहल: 5 अस्पतालों में पब्लिक-प्राइवेट मॉडल पर शुरू होंगे ब्लड बैंक
मुंबई महानगरपालिका यानी Brihanmumbai Municipal Corporation (बीएमसी) ने शहर की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। BMC अब अपने पांच प्रमुख उपनगरीय अस्पतालों में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत ब्लड बैंक शुरू करने जा रही है। इन ब्लड बैंकों का संचालन निजी संस्थाओं के सहयोग से किया जाएगा। प्रारंभिक अनुबंध 10 वर्षों का होगा, जिसे बाद में 10+10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा। BMC का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य मुंबई के सरकारी अस्पतालों में रक्त और रक्त घटकों (Blood Components) की उपलब्धता को बेहतर बनाना, आधुनिक तकनीक लाना और मरीजों को तेज़ एवं सुरक्षित सेवाएं उपलब्ध कराना है। हालांकि, इस निर्णय को लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के बीच बहस भी तेज हो गई है।
किन अस्पतालों में शुरू होंगे ब्लड बैंक?
BMC जिन अस्पतालों में ब्लड बैंक सेवाएं निजी साझेदारी के तहत शुरू या संचालित करने की योजना बना रही है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
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Rajawadi Hospital
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Bhabha Hospital Bandra
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Bhabha Hospital Kurla
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Shatabdi Hospital Kandivali
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Dr Babasaheb Ambedkar Hospital Kandivali
इनमें कुछ अस्पतालों में पहले से मौजूद ब्लड बैंकों का संचालन निजी संस्थाओं को सौंपा जाएगा, जबकि कुछ जगहों पर नए ब्लड बैंक स्थापित किए जाएंगे।
क्या है ‘सिविक हेल्थ कोलैबोरेशन मॉडल’?
BMC ने पारंपरिक “प्राइवेटाइजेशन” शब्द से बचते हुए इस व्यवस्था को “Civic Health Collaboration Model” नाम दिया है। इसके तहत निजी कंपनियां या ट्रस्ट अस्पताल परिसर में आधुनिक मशीनों, तकनीकी स्टाफ और प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि अस्पताल बीएमसी के नियंत्रण में ही रहेंगे। बीएमसी अधिकारियों का दावा है कि इससे-
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रक्त की उपलब्धता बढ़ेगी
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आधुनिक NAT Testing जैसी तकनीकें लागू होंगी
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प्लेटलेट्स, प्लाज़्मा और रेड सेल्स जैसे ब्लड कंपोनेंट्स अलग-अलग उपलब्ध कराए जा सकेंगे
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आपातकालीन मरीजों को तेजी से रक्त मिल सकेगा
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थैलेसीमिया और गंभीर रोगियों के उपचार में मदद मिलेगी
ब्लड बैंक क्यों जरूरी हैं?
मुंबई जैसे महानगर में रोज़ाना हजारों यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है। सड़क दुर्घटनाएं, कैंसर, थैलेसीमिया, डेंगू, प्रसूति और बड़ी सर्जरी के मरीजों के लिए ब्लड बैंक जीवनरेखा माने जाते हैं। शहर में गर्मियों और त्योहारों के दौरान रक्त की कमी अक्सर गंभीर समस्या बन जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अब चिकित्सा विज्ञान “Whole Blood” की जगह “Component Therapy” पर अधिक जोर देता है। यानी एक यूनिट रक्त को अलग-अलग हिस्सों- प्लाज़्मा, प्लेटलेट्स और रेड ब्लड सेल्स में बांटकर कई मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकता है।
BMC का पक्ष
BMC का कहना है कि कई सरकारी ब्लड बैंक पर्याप्त रक्त संग्रह नहीं कर पा रहे थे और आधुनिक तकनीक की कमी भी महसूस की जा रही थी। राष्ट्रीय रक्त संक्रमण परिषद (NBTC) के नियमों के अनुसार, यदि कोई ब्लड बैंक सालाना न्यूनतम संग्रह लक्ष्य पूरा नहीं करता, तो उसका लाइसेंस खतरे में पड़ सकता है। इसी कारण बीएमसी निजी भागीदारी के जरिए सेवाओं को आधुनिक और कुशल बनाना चाहती है। हाल के वर्षों में बीएमसी ने डायलिसिस, MRI, CT Scan और कार्डियोलॉजी जैसी सेवाओं में भी PPP मॉडल अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
विवाद और विरोध भी तेज
हालांकि इस योजना का कई सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ताओं ने विरोध किया है। उनका आरोप है कि बीएमसी धीरे-धीरे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण कर रही है। उनका कहना है कि गरीब मरीजों के लिए सरकारी अस्पताल अंतिम सहारा होते हैं और निजी संस्थाओं के आने से इलाज महंगा हो सकता है। कुछ डॉक्टरों और एक्टिविस्टों ने यह भी सवाल उठाया है कि-
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क्या निजी कंपनियां गरीब मरीजों को रियायती या मुफ्त रक्त देंगी?
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क्या थैलेसीमिया और हीमोफीलिया मरीजों के लिए विशेष छूट जारी रहेगी?
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ब्लड बैंक संचालन में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी?
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निजी संस्थाओं के शुल्क पर नियंत्रण कौन रखेगा?
इसके अलावा, कुछ विशेषज्ञों ने ब्लड बैंकों के लिए निर्धारित जगह से अधिक स्पेस निजी संस्थाओं को दिए जाने पर भी चिंता जताई है।
मरीजों को क्या होगा फायदा?
यदि योजना सही तरीके से लागू होती है तो इसके कई लाभ सामने आ सकते हैं-
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मरीजों को रक्त और प्लेटलेट्स के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा
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अत्याधुनिक जांच तकनीकों से संक्रमण का खतरा कम होगा
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आपातकालीन सेवाएं तेज होंगी
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सरकारी अस्पतालों में उपचार क्षमता बढ़ेगी
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रक्त की बर्बादी कम होगी
विशेषज्ञ मानते हैं कि मुंबई जैसे शहर में आधुनिक ब्लड बैंक नेटवर्क स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
आगे की रणनीति
बीएमसी की यह योजना फिलहाल प्रशासनिक और स्थायी समिति की मंजूरी की प्रक्रिया से गुजर रही है। मंजूरी मिलने के बाद निजी संस्थाओं के चयन और संचालन प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाएगा। मुंबई की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले ही देश की सबसे बड़ी शहरी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में गिनी जाती है। ऐसे में यह योजना आने वाले वर्षों में यह तय करेगी कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में निजी भागीदारी कितना लाभ पहुंचाती है और कितना विवाद पैदा करती है।
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