यूपी चुनाव 2027: क्या ठाकुरों और सवर्णो को ज्यादा बढ़ावा देना योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के लिए बड़ा खतरा बन सकता है?

The CSR Journal Magazine
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति हमेशा सबसे बड़ा मुद्दा रही है। चुनाव चाहे किसी भी मुद्दे पर लड़ा जाए, लेकिन आखिर में पूरा खेल जातीय समीकरणों पर आकर टिक जाता है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भी यूपी में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की हो रही है कि क्या योगी आदित्यनाथ सरकार में ठाकुर समाज और सवर्णो को जरूरत से ज्यादा ताकत और महत्व मिला है। विपक्ष अब इसी मुद्दे को भाजपा के खिलाफ बड़ा हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।
उत्तर प्रदेश में ओबीसी आबादी लगभग 45 से 50 प्रतिशत मानी जाती है। दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी लगभग 19 प्रतिशत है। इसके मुकाबले ठाकुर आबादी सिर्फ 6-7 प्रतिशत मानी जाती है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार और प्रशासन में ठाकुर समाज का प्रभाव जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है।
योगी आदित्यनाथ खुद ठाकुर समाज से आते हैं। इसी वजह से विपक्ष लगातार उन पर आरोप लगाता रहा है कि उनके शासन में ठाकुर अधिकारियों और नेताओं को ज्यादा ताकत मिली। समाजवादी पार्टी और दूसरे विपक्षी दल यह नैरेटिव बना रहे हैं कि भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में पिछड़े वर्गों ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन सत्ता का सबसे ज्यादा फायदा ठाकुर समाज और सवर्णो को मिला।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत गैर-यादव ओबीसी वोट रहे हैं। कुर्मी, मौर्य, निषाद, राजभर, कुशवाहा, लोध और सैनी जैसे समुदाय बड़ी संख्या में भाजपा के साथ आए थे। माना जाता है कि इन समुदायों की आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है। 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा को 312 सीटों की बड़ी जीत दिलाने में इन जातियों की अहम भूमिका रही थी।
लेकिन अब विपक्ष इन्हीं जातियों के बीच यह संदेश फैलाने की कोशिश कर रहा है कि “वोट पिछड़ों का था, लेकिन सत्ता कुछ खास लोगों तक सीमित रही।” यही वजह है कि अखिलेश यादव लगातार PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।
विपक्ष कई बार यह आरोप भी लगा चुका है कि बड़े जिलों में पुलिस और प्रशासन में ठाकुर अधिकारियों का दबदबा ज्यादा दिखाई दिया। भाजपा इन आरोपों को राजनीति बताकर खारिज करती रही है, लेकिन यूपी की राजनीति में धारणा बहुत मायने रखती है। अगर लोगों के बीच यह बात बैठ गई कि सरकार में जातीय संतुलन नहीं है, तो इसका असर चुनाव में बड़े स्तर पर पड़ सकता है।
हाथरस कांड ने भी इस मुद्दे को और बड़ा बना दिया था। पीड़िता दलित समाज से थी जबकि आरोप ठाकुर समाज के लोगों पर लगे थे। विपक्ष ने इस मामले को ठाकुर प्रभाव और प्रशासनिक पक्षपात से जोड़कर भाजपा पर हमला किया। विकास दुबे एनकाउंटर मामले में भी विपक्ष ने सवाल उठाए कि अपराध और सत्ता के बीच जातीय नेटवर्क कितने मजबूत थे।
2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा फिर सत्ता में आई, लेकिन उसकी सीटें 312 से घटकर 255 रह गईं। इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को यूपी में नुकसान हुआ। कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पिछड़े वर्गों के कुछ वोटरों में नाराजगी इसकी एक वजह रही।
सबसे बड़ा खतरा भाजपा के लिए तब होगा अगर गैर-यादव ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट एक साथ जुड़ने लगें। यूपी में यादव आबादी लगभग 9-10 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत मानी जाती है। अगर इसके साथ छोटे पिछड़े वर्ग भी बड़ी संख्या में विपक्ष के साथ चले गए, तो भाजपा का गणित बिगड़ सकता है।
यही वजह है कि भाजपा अब छोटे पिछड़े समुदायों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की कोशिश कर रही है। पार्टी जानती है कि यूपी में सिर्फ हिंदुत्व के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। यहां जातीय राजनीति आज भी सबसे बड़ा सच है।
2027 का चुनाव इसलिए बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सिर्फ भाजपा और विपक्ष की लड़ाई नहीं होगी। यह चुनाव इस बात पर भी तय हो सकता है कि क्या पिछड़े और दलित समाज को लगने लगा है कि योगी आदित्यनाथ सरकार में ठाकुर समाज और सवर्णो को जरूरत से ज्यादा ताकत मिली। अगर विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच मजबूत करने में सफल हो गया, तो यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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