अगर सरकारें ठान लें तो बड़े से बड़े मुश्किल हालात बदल सकते हैं। जब कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सख्त फैसले लिए जा सकते हैं, जब पश्चिम बंगाल जैसे तनावपूर्ण चुनाव भी कम हिंसा के साथ कराए जा सकते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि सरकार और प्रशासन ने उसे गंभीरता से लिया, तो फिर देश की बेटियों को दहेज की यातना और मौत से बचाने के लिए वैसी ही सख्ती और वैसी ही ईमानदार इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई जाती? आखिर इस देश की बेटियां क्या किसी राजनीति, चुनाव या सत्ता से कम महत्वपूर्ण हैं? हर दिन बेटियां रो रही हैं, टूट रही हैं, मारी जा रही हैं। कई मां-बाप हर रात डर में जीते हैं कि उनकी बेटी अगली सुबह जिंदा होगी भी या नहीं। अगर सरकार सच में चाहे, तो दहेज के खिलाफ ऐसा डर पैदा किया जा सकता है कि कोई भी परिवार बहू को पैसों के लिए प्रताड़ित करने से पहले सौ बार सोचे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है — आखिर देश अपनी बेटियों को बचाने के लिए उतना गंभीर कब होगा, जितना वह दूसरे बड़े मुद्दों के लिए दिखाई देता है?
एक बेटी की शादी का दिन किसी भी परिवार के लिए सबसे खुशी का दिन माना जाता है। माता-पिता सालों तक उस दिन के सपने देखते हैं। पिता अपनी पूरी जिंदगी की कमाई जोड़ते हैं, मां अपनी छोटी-छोटी खुशियों का त्याग करती है ताकि बेटी की विदाई अच्छे से हो सके। लेकिन आज के भारत में हजारों परिवारों के लिए यही शादी धीरे-धीरे एक डरावने सपने में बदल जाती है।
एक ऐसा सपना, जहां शादी के बाद बेटी को “कम दहेज” लाने के लिए ताने दिए जाते हैं। जहां प्यार की जगह लालच ले लेता है। जहां शादी रिश्ते से ज्यादा पैसों का सौदा बन जाती है। और जहां कई महिलाओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, पीटा जाता है, अपमानित किया जाता है और आखिर में मार दिया जाता है — सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी को और पैसे, गाड़ी, गहने या संपत्ति चाहिए होती है।
हाल ही में नोएडा और भोपाल से सामने आए दहेज हत्या के मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। सबसे दर्दनाक मामलों में से एक 33 वर्षीय त्विशा शर्मा सामने आया जिनकी शादी के कुछ ही महीनों बाद भोपाल स्थित ससुराल में मौत हो गई। एक लड़की जो सपने लेकर अपने नए घर गई थी, वह कुछ महीनों बाद दहेज मौत का एक और आंकड़ा बन गई। परिवार का आरोप है कि उसे लगातार दहेज के लिए मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा था।
नोएडा क्षेत्र से भी एक और भयावह मामला सामने आया, जहां एक विवाहित महिला को दहेज के लिए कथित तौर पर प्रताड़ित कर मार दिया गया। इन खबरों के पीछे सिर्फ एक घटना नहीं होती, बल्कि एक बर्बाद परिवार होता है। ऐसे मां-बाप होते हैं जिन्होंने कभी अपनी बेटी की शादी में खुशियां मनाई थीं, लेकिन बाद में उसी बेटी की लाश के सामने खड़े होकर खुद से सवाल पूछते रह जाते हैं कि आखिर उनकी गलती क्या थी।
कोई भी पिता अपनी बेटी की शादी की तस्वीरें देखते हुए उसकी अंतिम यात्रा की तैयारी नहीं करना चाहता। कोई मां अपनी बेटी की रोती हुई आवाज सुनना नहीं चाहती, जो फोन पर कह रही हो कि उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जा रहा है। लेकिन भारत में यह दर्द अब आम होता जा रहा है।
सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में इन घटनाओं ने बेटियों वाले परिवारों के अंदर डर पैदा कर दिया है। कई माता-पिता अब खुलकर पूछ रहे हैं कि क्या आज के भारत में शादी अब रिश्ते से ज्यादा पैसों और सामाजिक दिखावे का सौदा बन चुकी है।
दहेज विरोधी कानून बने छह दशक से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन हालात आज भी बेहद डरावने हैं। हर साल हजारों महिलाएं दहेज के कारण प्रताड़ना, हिंसा और मौत का शिकार होती हैं। जो कभी “सामाजिक बुराई” कहा जाता था, वह अब महिलाओं के खिलाफ सबसे सामान्य हिंसा में बदल चुका है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े इस संकट की गंभीरता दिखाते हैं। NCRB की “क्राइम इन इंडिया 2024” रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली लगातार पांचवें साल देश के महानगरों में दहेज मौत के मामलों में सबसे ऊपर रही। साल 2024 में दिल्ली में 109 दहेज हत्या के मामले दर्ज हुए, जिनमें 111 महिलाओं की जान गई। वहीं, बेंगलुरु दहेज प्रताड़ना का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा, जहां महानगरों में दर्ज 1,008 मामलों में से 878 मामले अकेले बेंगलुरु से थे।
देशभर के आंकड़े और भी ज्यादा डराने वाले हैं। NCRB के “क्राइम इन इंडिया 2023” के अनुसार, पूरे भारत में दहेज से जुड़े 15,489 मामले दर्ज हुए, जबकि 6,156 महिलाओं की मौत दहेज हिंसा के कारण हुई। यानी हर दिन करीब 17 से 18 महिलाएं दहेज की वजह से मारी गईं। आसान शब्दों में कहें तो भारत में लगभग हर 84 मिनट में एक महिला दहेज के कारण अपनी जान गंवा रही है।
उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 7,151 मामले दर्ज हुए, जबकि बिहार में 3,665 मामले सामने आए। दहेज मौत के मामलों में उत्तर प्रदेश में 2,122 महिलाओं की मौत हुई, जबकि बिहार में 1,143 महिलाओं ने जान गंवाई। वहीं 83 हजार से ज्यादा दहेज मामले अब भी अदालतों में लंबित पड़े हैं, जो दिखाता है कि पीड़ित परिवारों को इंसाफ पाने के लिए कितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
सबसे दर्दनाक सच यह है कि ये सिर्फ दर्ज हुए मामले हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि हजारों महिलाएं आज भी चुपचाप अत्याचार सह रही हैं। कई परिवार सामाजिक बदनामी, आर्थिक मजबूरी या समाज के डर से शिकायत तक दर्ज नहीं कराते।
आज बेटियों के माता-पिता के लिए दहेज सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं रहा, बल्कि एक स्थायी डर बन चुका है। कई पिता बेटी की शादी के लिए जमीन बेच देते हैं, कर्ज लेते हैं, मां अपने गहने तक दे देती है। लेकिन सब कुछ देने के बाद भी कई माता-पिता को देर रात अपनी बेटी के रोते हुए फोन आते हैं, जहां वह बताती है कि उसे और पैसे लाने के लिए ताने दिए जा रहे हैं, पीटा जा रहा है या मानसिक रूप से तोड़ा जा रहा है। और कई मामलों में कुछ समय बाद वह आवाज हमेशा के लिए खामोश हो जाती है।
इन अपराधों के लगातार बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सजा का डर कमजोर पड़ चुका है। कई आरोपी जानते हैं कि जांच और अदालत की प्रक्रिया सालों तक चलेगी, गवाहों पर दबाव बनाया जाएगा और कई बार सबूत भी गायब हो जाएंगे। ऐसे में पीड़ित परिवार के लिए न्याय की लड़ाई खुद एक सजा बन जाती है।
अगर भारत सच में इस समस्या को खत्म करना चाहता है, तो सिर्फ भाषण और जागरूकता अभियान काफी नहीं होंगे। दहेज अपराधों के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति अपनानी होगी। दहेज हत्या के मामलों की फास्ट ट्रैक जांच और सुनवाई होनी चाहिए।
जो परिवार दहेज प्रताड़ना या हत्या के दोषी पाए जाएं, उन्हें सिर्फ जेल ही नहीं बल्कि आर्थिक सजा भी मिलनी चाहिए। उनकी संपत्ति जब्त हो, सरकारी नौकरियां खत्म हों और सरकारी योजनाओं का लाभ भी बंद किया जाए। शादी में दिए जाने वाले बड़े लेन-देन, महंगे गिफ्ट, गाड़ी और संपत्ति की डिजिटल निगरानी भी जरूरी हो सकती है ताकि दहेज को “गिफ्ट” का नाम देकर छिपाया न जा सके।
लेकिन सिर्फ कानून काफी नहीं होंगे, क्योंकि समाज खुद इस बुराई को सामान्य मान चुका है। आज भी कई परिवार लड़के की नौकरी, सैलरी, विदेश में रहने या सरकारी पद के आधार पर उसका “रेट” तय करते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर और NRI लड़कों को शादी के बाजार में किसी वस्तु की तरह देखा जाता है। कई पढ़े-लिखे परिवार जो बाहर महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, वही अंदर बंद कमरों में दहेज की डील करते हैं।
यह परंपरा नहीं है। यह समाज की स्वीकार की हुई लालच है।
भारत खुद को तब तक प्रगतिशील समाज नहीं कह सकता जब तक बेटियां शादी के बाद पैसों के लिए मारी जाती रहेंगी। हर दहेज मौत सिर्फ एक लड़की की जान नहीं लेती, बल्कि एक मां का विश्वास, एक पिता की उम्मीद और पूरे परिवार की खुशियां खत्म कर देती है। पीछे रह जाते हैं खाली कमरे, अधूरे सपने, बंद हो चुके फोन कॉल और ऐसा दर्द जो जिंदगीभर खत्म नहीं होता।
और शायद सबसे कड़वा सच यही है कि जब टीवी स्क्रीन से एक खबर गायब होती है, उसी समय कहीं न कहीं भारत में एक और बेटी उसी डर, दबाव, हिंसा और खामोशी वाले चक्र में प्रवेश कर रही होती है।
जब तक समाज शादी को व्यापार और बेटियों को बोझ समझना बंद नहीं करेगा, तब तक भारत अपनी बेटियों को ऐसे ही खोता रहेगा — एक शादी के बाद दूसरी शादी में।

