बिस्मिल्लाह खान और बनारस का अनूठा संबंध
बिस्मिल्लाह खान ने हमेशा बनारस (काशी) को अपना घर माना और गंगा किनारे अपनी साधना जारी रखी। उन्होंने यह कहकर विदेश जाने से इनकार कर दिया था कि “विदेश में मेरी गंगा कहाँ से लाओगे?” वे भोर में बालाजी घाट पर मां गंगा का पूजन करते और काशी विश्वनाथ मंदिर में मंगला आरती से पहले अपनी शहनाई की धुन से बाबा विश्वनाथ को जगाया करते थे। शिया मुसलमान होने के बावजूद, वे हिंदू संस्कृति से गहराई से जुड़े थे, जो बनारस की सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है। भले ही वे भारत रत्न से सम्मानित थे, वे बनारस की गलियों में एक साधारण जीवन जीते थे। वे मुहर्रम के दौरान ताजिया के आगे शहनाई बजाकर शोक भी व्यक्त करते थे।
शहनाई का जादू और काशी का रंग