खतरे में पैसा, पार्टी और पद, 65 दिन में बदल गई ममता बनर्जी की सियासी दुनिया

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पैसा ब्लॉक, पद गायब, पार्टी साफ! क्या 65 दिनों में खत्म हो गया ममता बनर्जी का राजनीतिक वजूद?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी ने तीन दशकों से अधिक समय तक राज्य की राजनीति पर राज किया है। चाहे वह वामपंथ के 34 साल पुराने किले को ढहाना हो, या धुआंधार रैलियों के दम पर लगातार तीन बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना हो, ममता बनर्जी भारतीय राजनीति के सबसे मजबूत और जुझारू नेताओं में से एक मानी जाती रही हैं।

65 दिनों में ढहा राजनीतिक साम्राज्य

राजनीति की हवा कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद के केवल 65 दिनों में ममता बनर्जी की पूरी सियासी दुनिया 180 डिग्री घूम चुकी है। आज उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संकट सामने खड़ा है, जहां उनका पैसा, पार्टी और पद तीनों ही गंभीर खतरे में पड़ चुके हैं। यह संकट केवल बाहरी राजनीतिक विरोधियों की वजह से नहीं है, बल्कि इसकी मुख्य जड़ें पार्टी के भीतर भड़के गृहयुद्ध, वित्तीय संकट और केंद्रीय एजेंसियों की कड़े कानूनी शिकंजे से जुड़ी हैं।

पहला बड़ा प्रहार: पैसा खतरे में

किसी भी राजनीतिक दल के संचालन, चुनाव प्रचार और संगठन के विस्तार के लिए वित्तीय मजबूती रीढ़ की हड्डी होती है। विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद ममता बनर्जी की आर्थिक ताकत पर सबसे बड़ा आघात लगा है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचे अभूतपूर्व विद्रोह और केंद्रीय जांच एजेंसियों के दखल के बाद पहले चुनाव आयोग और फिर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पार्टी के खातों पर बेहद सख्त रुख अपनाया। वर्तमान स्थिति यह है कि टीएमसी के विभिन्न बैंक खातों में जमा करीब ₹440 करोड़ का विशालकाय फंड पूरी तरह से फ्रीज कर दिया गया है।

मालिकाना हक को लेकर छिड़ा कानूनी युद्ध

इस फंड के फ्रीज होने से ममता बनर्जी के धड़े के सामने दैनिक राजनीतिक गतिविधियों को चलाने का संकट खड़ा हो गया है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि पार्टी से बगावत कर चुके नेताओं का गुट भी इस ₹440 करोड़ के पार्टी फंड पर अपना कानूनी दावा ठोक रहा है। इस कारण ममता बनर्जी के लिए इस धनराशि का उपयोग करना तो दूर, इसे वापस पाना भी एक लंबी और पेचीदा कानूनी लड़ाई बन चुका है।

दूसरा बड़ा प्रहार: पार्टी खतरे में (सांसदों और विधायकों का महाविद्रोह)

जो पार्टी कभी ममता बनर्जी के एक इशारे पर बंगाल से लेकर दिल्ली तक हिल जाती थी, आज उसी पार्टी का ढांचा पूरी तरह बिखर चुका है YouTube। राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों स्तरों पर तृणमूल कांग्रेस के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने ममता के नेतृत्व के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया है।

दिल्ली में लोकसभा सांसदों का बड़ा झटका

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस विपक्षी मोर्चे की एक अहम धुरी हुआ करती थी, लेकिन महज 65 दिनों के भीतर संसद में पार्टी की ताकत आधी से भी कम रह गई है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में कुल 19 सांसदों ने ममता बनर्जी के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया।

समर्थित दल में विलय

इन सभी बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को एक औपचारिक पत्र सौंपकर खुद को टीएमसी से अलग कर लिया और एनडीए (NDA) समर्थित ‘NCPI’ पार्टी में अपने गुट के विलय का ऐलान कर दिया। इस ऐतिहासिक टूट के बाद अब लोकसभा में ममता बनर्जी के साथ केवल 8 वफादार सांसद ही बचे हैं, जिससे दिल्ली के सियासी गलियारों में उनका रसूख बेहद कमजोर पड़ गया है।

बंगाल विधानसभा में विधायक दल का विभाजन

दिल्ली की तर्ज पर पश्चिम बंगाल के भीतर भी ममता बनर्जी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है। विधानसभा में टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायक बागी हो चुके हैं। इन विधायकों का नेतृत्व रितब्रत बनर्जी कर रहे हैं, जिन्होंने ममता के तानाशाही रवैये और नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

अल्पमत में वफादार गुट

अब राज्य की विधानसभा के भीतर ममता बनर्जी के खेमे में केवल 22 विधायक ही बचे हैं। अपनी ही बनाई पार्टी में इस स्तर का विद्रोह भारतीय राजनीतिक इतिहास में दुर्लभ माना जाता है, जिसने पार्टी संगठन की नींव हिला दी है।

तीसरा बड़ा प्रहार: पद खतरे में (अध्यक्ष पद से निष्कासन)

ममता बनर्जी का नाम ही तृणमूल कांग्रेस का पर्याय माना जाता था। उन्होंने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर इस पार्टी की स्थापना की थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि उन्हें अपनी ही बनाई पार्टी के सर्वोच्च पद से बेदखल कर दिया गया है। पार्टी के भीतर असंतोष का घड़ा तब फूटा जब विद्रोही धड़े के नेताओं और सांसदों ने एक आपातकालीन महाबैठक बुलाई।

ममता बनर्जी पार्टी अध्यक्ष पद से बर्खास्त

लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और बहुमत का हवाला देते हुए बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से ही बर्खास्त कर दिया। इस अप्रत्याशित कदम के बाद बागी नेताओं ने सर्वसम्मति से वरिष्ठ नेता अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष चुन लिया। इस तख्तापलट ने ममता बनर्जी को तकनीकी और सांगठनिक रूप से अपनी ही पार्टी में हाशिए पर धकेल दिया है।

बगावत के पीछे के मुख्य कारण: आखिर ऐसा क्यों हुआ?

यह समझना बेहद जरूरी है कि जो मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय नेता कुछ महीने पहले तक अपराजेय लग रही थीं, उनके खिलाफ अचानक इतना बड़ा असंतोष कैसे पनप गया। इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण जिम्मेदार रहे।

‘भतीजावाद’ और परिवारवाद पर नाराजगी

TMC के पुराने और जमीनी नेताओं में लंबे समय से ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर गहरा आक्रोश था। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, जिन्होंने लाठियां खाई थीं और पार्टी को सींचने में अपना जीवन लगा दिया था, का आरोप था कि ममता बनर्जी संगठन के अनुभवी चेहरों को दरकिनार कर सारा पावर स्ट्रक्चर (सत्ता की चाबी) अपने भतीजे को सौंप रही थीं। इस ‘भतीजावाद’ ने पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर दिया, जो अंततः इस बड़े विस्फोट का कारण बना।

विधानसभा चुनाव में करारी हार का झटका

जब तक तृणमूल कांग्रेस चुनाव जीत रही थी, तब तक असंतोष की आवाजें दबी रहीं। लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव में मिली करारी और अप्रत्याशित हार ने पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों को सतह पर ला दिया। हार के बाद नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा, जिसके बाद उन्होंने ममता के नेतृत्व को चुनौती देना ही एकमात्र विकल्प समझा।

अभिषेक बनर्जी पर कसता शिकंजा और कानूनी मुसीबतें

ममता बनर्जी की मुश्किलें केवल सांगठनिक बगावत तक सीमित नहीं हैं। उनके परिवार और उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार अभिषेक बनर्जी पर भी चौतरफा संकट मंडरा रहा है।

केंद्रीय एजेंसियों की छापेमारी और जांच की आंच

विभिन्न कथित घोटालों और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच की रफ्तार बेहद तेज हो गई है। अभिषेक बनर्जी के ठिकानों पर लगातार हो रही कानूनी कार्रवाइयों ने ममता बनर्जी को बैकफुट पर धकेल दिया है।

प्रशासनिक व राजनैतिक स्तर पर घटता रसूख

सत्ता बदलने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी बनर्जी परिवार का प्रभाव समाप्त हो गया है। हाल ही में अभिषेक बनर्जी को मिलने वाली वीआईपी सुरक्षा और सरकारी विशेषाधिकारों को भी वापस ले लिया गया, जो यह दर्शाता है कि अब राज्य प्रशासन पर भी ममता बनर्जी की पकड़ पूरी तरह ढीली हो चुकी है।

ममता बनर्जी के सामने आगे का रास्ता और चुनौतियां

मात्र 65 दिनों के भीतर इस तरह के बड़े राजनीतिक पतन से उबरना किसी भी राजनेता के लिए लगभग असंभव माना जाता है। वर्तमान में ममता बनर्जी के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं।
पार्टी के नाम और सिंबल की लड़ाई: अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद अब असली ‘तृणमूल कांग्रेस’ कौन है और पार्टी के चुनाव चिह्न पर किसका हक होगा, यह लड़ाई जल्द ही चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच सकती है।
बचे हुए कैडर को बचाना: विधायकों और सांसदों के जाने के बाद निचले स्तर के कार्यकर्ताओं (ग्राउंड कैडर) को अपने साथ जोड़े रखना ममता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि सत्ता जाने के बाद कार्यकर्ताओं का झुकाव भी बागी धड़े या नई सत्ताधारी पार्टी की तरफ बढ़ने लगता है।
गठबंधन की राजनीति में प्रासंगिकता: राष्ट्रीय स्तर पर कभी ‘विपक्ष का चेहरा’ बनने का सपना देखने वाली ममता बनर्जी की मोलभाव करने की शक्ति (Bargaining Power) अब खत्म हो चुकी है। संसद में संख्या बल कम होने के कारण राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी पूछ कम हो जाएगी।

भारतीय राजनीति का एक बड़ा सबक

ममता बनर्जी की सियासी दुनिया में आए इस भूचाल ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में जनता का जनादेश और पार्टी के भीतर आंतरिक तालमेल ही सबसे बड़ी पूंजी होती है। जब तक कोई नेता सांगठिनक रूप से मजबूत और जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह रहता है, तब तक उसका किला सुरक्षित रहता है। लेकिन जैसे ही अहंकार, परिवारवाद और आंतरिक असंतोष हावी होता है, तो बड़े से बड़ा साम्राज्य भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।

क्या बचा है ममता के पास?

हालांकि ममता बनर्जी के पास अभी भी 9 राज्यसभा सांसद, 8 लोकसभा सांसद और 10 विधायक हैं। संगठन में कोई बड़ी टूट नहीं हुई है और उनके समर्थक अब भी उनके साथ हैं। ममता बनर्जी के पास अभी भी एक मजबूत जनाधार है, लेकिन आने वाले समय में उन्हें अपनी सियासी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

ममता के राजनीतिक सफर का स्याह पन्ना

65 दिनों के भीतर मुख्यमंत्री पद खोने से लेकर पार्टी अध्यक्ष पद गंवाने और ₹440 करोड़ का फंड फ्रीज होने तक का यह सफर ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे अंधकारमय अध्याय है। क्या ‘बंगाल की बाघिन’ कही जाने वाली ममता बनर्जी इस राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़कर दोबारा वापसी कर पाएंगी या यह उनके लंबे राजनीतिक सफर का अंत है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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