अर्श पर फर्श वाली पार्टी: मात्र 75 रुपये का फंड और देश की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी NCPI

The CSR Journal Magazine

75 रुपये वाली पार्टी का जलवा: एक गुमनाम दल NCPI बना संसद की पांचवीं सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत

सियासत के गलियारों में रातों-रात चमका यह सितारा नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का है, जो तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों के इसमें विलय की घोषणा के बाद देश की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर अग्रसर है। पार्टी के “75 रुपये वाले दल” कहलाने और इसके अचानक अर्श पर पहुंचने की पूरी कहानी कुछ ऐसी है।

अचानक चमक उठा एनसीपीआई का सितारा

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) की किस्मत अचानक बदल गई है। यह पार्टी अब सियासत के तल पर है और अपनी पहचान बनाने जा रही है। तीन साल पहले रजिस्टर्ड हुई एनसीपीआई ने हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों का समर्थन प्राप्त किया है। इस विलय ने पार्टी को तेजी से सुर्खियों में ला दिया है। बागी सांसदों के आने से एनसीपीआई आज देश की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बनने के करीब है।

20 बागी सांसदों के साथ नई ताकत

टीएमसी के बागी सांसदों का एनसीपीआई में विलय होने के बाद पार्टी ने अपने सोशल मीडिया पेज पर घोषणा की कि वह बंगाल में सबसे बड़ा गुट बन गई है। इस विलय के बाद, एनसीपीआई के पास अब TMC के करोड़ों रुपये का आर्थ‍िक संसाधन है, जो कि पहले किसी ने नहीं सोचा था। पार्टी की पहचान अब केवल 75 रुपये के खाते से नहीं बल्कि बागी सांसदों की शक्ति से हो रही है।

75 रुपये का क्या है पूरा गणित?

निर्वाचन आयोग (ECI) को सौंपी गई वित्तीय वर्ष 2022-23 की सालाना ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, इस पार्टी के पास क्लोजिंग बैलेंस के रूप में मात्र 75 रुपये नकद बचे थे। इस वित्तीय वर्ष में पार्टी को समर्थकों से कुल 1,13,075 रुपये का चंदा मिला था। पार्टी ने इस पूरी राशि को सांगठनिक कार्यों और 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 3 सीटों पर लड़ने (जिसमें 49,400 रुपये खर्च हुए) में उड़ा दिया, जिसके बाद खाता लगभग खाली हो गया था।

रातों-रात कैसे बनी देश की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी?

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचे घमासान के बाद 20 बागी लोकसभा सांसदों ने बगावत कर दी। संविधान की 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन लॉ) के तहत अयोग्यता से बचने के लिए मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का किसी अन्य दल में विलय जरूरी होता है। TMC के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों (जो कि दो-तिहाई से ज्यादा हैं) ने कानूनी कवच के लिए इस गुमनाम पार्टी को चुना।

लोकसभा में नया समीकरण

यदि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इस विलय को मंजूरी दे देते हैं, तो NCPI शून्य से सीधे 20 सांसदों वाली पार्टी बन जाएगी।इसके बाद यह संसद में भाजपा (240), कांग्रेस (99), सपा (37) और द्रमुक (22) के बाद देश की पांचवीं सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत और NDA का दूसरा सबसे बड़ा घटक दल बन जाएगी।

पार्टी की अध्यक्ष का क्या हुआ?

एनसीपीआई की पूर्व अध्यक्ष शेउली कुंडू ने हाल ही में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनके पति उत्तिया कुंडू ने इस पार्टी की स्थापना की थी। शेउली विकलांग हाई कोर्ट में वकील हैं। इस्तीफे के बाद, वे अब एनसीपीआई का हिस्सा नहीं हैं और इस पर उन्होंने पत्रकारों के सामने अपनी बात रखी है। उनके जाने के बाद पार्टी की दिशा में एक बड़ा संकट आ गया है।

क्या है NCPI का बैकग्राउंड?

इस पार्टी का रजिस्ट्रेशन जनवरी 2023 में भारत निर्वाचन आयोग के पास हुआ था। चुनाव आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, इसका पंजीकृत पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराइल में स्थित एक इमारत है। इस पार्टी को केंदु दंपति (उत्तीय और शिउली केंदु) चलाते हैं, जिन्होंने इस बड़े राजनीतिक उलटफेर और विलय में अहम भूमिका निभाई है। बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से मिलकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था मांगी है और केंद्र में भाजपा नीत एनडीए (NDA) सरकार को समर्थन देने का एलान किया है।

चुनावी प्रदर्शन की कहानी

एनसीपीआई ने 2023 में त्रिपुरा में अपना पहला चुनाव लड़ा। लेकिन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव आयोग के पास रजिस्टर्ड होने के बावजूद, इस पार्टी को लोगों में ज्यादा पहचान नहीं मिली। उनका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है, लेकिन पहले चुनाव में उन्हें काफी मुश्किलें आईं। एनसीपीआई ने अपने तीन उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन केवल 822 वोट ही मिल सके।

आर्थिक स्थिति की झलक

पार्टी की वित्तीय स्थिति भी दर्शाती है कि एनसीपीआई के खाते में बस 75 रुपये हैं। वित्त वर्ष 2022-23 में पार्टी की आमदनी और खर्च लगभग बराबर रहे। उन्हें डोनेशन के रूप में 1,13,075 रुपये मिले, लेकिन चुनावी खर्च के चलते सूखा पड़ा। तृणमूल कांग्रेस के चुनाव में सबसे अधिक पैसे खर्च हुए, जो अब एनसीपीआई के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

बागी गुट में शामिल नेता

टीएमसी के गुट के बागियों में प्रमुख नेता शामिल हैं, जैसे काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय। उनके विलय के कारण पार्टी को एक नई दिशा मिली है। अब ये सांसद अपने नए गुट के हिस्से के रूप में पहचान बनाने की कोश‍िश कर रहे हैं। इस बागी गुट में पश्चिम बंगाल के कई बड़े और अनुभवी चेहरे शामिल हैं-
काकोली घोष दस्तीदार: इस बागी गुट की मुख्य नेता हैं, जिन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को विलय पत्र सौंपा।
सुदीप बंद्योपाध्याय: कोलकाता उत्तर से वरिष्ठ सांसद और इस टूट के मुख्य रणनीतिकार।
शताब्दी रॉय: बीरभूम से मशहूर सांसद और वरिष्ठ अभिनेत्री।
सायोनी घोष: युवा नेता और सांसद (पार्लियामेंट में इस गुट का नेतृत्व करने की संभावना)।
यूसुफ पठान: पूर्व भारतीय क्रिकेटर और बहरामपुर से सांसद।दीपक अधिकारी (देव): प्रसिद्ध टॉलीवुड अभिनेता और घाटल से सांसद।
जून मालिया: अभिनेत्री और मेदिनीपुर से सांसद।
रचना बनर्जी: हुगली से नवनिर्वाचित सांसद और मशहूर टीवी एंकर।
माला रॉय: कोलकाता दक्षिण से वरिष्ठ सांसद।
अरूप चक्रवर्ती: बांकुड़ा से सांसद।
प्रसून बनर्जी: पूर्व फुटबॉलर और हावड़ा से सांसद।
जगदीश बर्मा बासुनिया: कूचबिहार से सांसद।
अन्य शामिल सांसद: डॉ. शर्मिला सरकार, बापी हलदर, असित कुमार मल, खलीलुर रहमान, अबू ताहिर खान, मिताली बाग, कलिपदा सोरेन और पार्थ भौमिक।

अब आगे का क्या होगा?

अब लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को निर्णय लेना है कि बागी सांसदों को अलग गुट के रूप में मान्यता दी जाए या नहीं। तृणमूल कांग्रेस ने अपील की है कि स्पीकर इस नए गुट को मान्यता न दें। स्पीकर के फैसले से तय होगा कि एनसीपीआई एक अनजान पार्टी बनी रहेगी, या फिर वह बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी बनकर उभरेगी।

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