युवा शक्ति देश का जनसांख्यिकीय लाभांश, दिशाहीनता बनी बड़ी चुनौती: मोहन भागवत

The CSR Journal Magazine

युवाओं में है भारत का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’, भागवत का बड़ा बयान, सही दिशा से मिलेगा फायदा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि भारत की विशाल युवा आबादी देश का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (जनसांख्यिकीय लाभांश) है, जिसे अगर सही दिशा और उचित मार्गदर्शन न मिला तो वे समाज पर बोझ बन सकते हैं। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में छात्रों तथा ‘जेन-जी’ (Gen-Z) युवा पीढ़ी से संवाद करते हुए उन्होंने यह बात कही। संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि केवल युवाओं की संख्या अधिक होना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें सही तरीके से राष्ट्र निर्माण से जोड़ना और उनमें जिम्मेदारी का भाव जगाना अनिवार्य है।

युवा शक्ति देश का जनसांख्यिकीय लाभांश- मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने देश के युवाओं को राष्ट्र की सबसे बड़ी जनसांख्यिकीय ताकत (Demographic Dividend) बताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेताया कि भारत की नियति और भविष्य का खाका यही युवा पीढ़ी तय करने वाली है। नागपुर में छात्रों और युवा पीढ़ी (Gen-Z) के साथ आयोजित एक विशेष संवाद सत्र में भागवत ने कहा, “यदि देश अपनी इस युवा ऊर्जा का सही उपयोग करने में सफल रहता है, तो भारत को वैश्विक पटल पर ‘विश्वगुरु’ बनने से कोई नहीं रोक सकता।” संघ प्रमुख ने युवाओं के सामने मौजूद अवसरों और देश के प्रति उनके कर्तव्यों को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण साझा किया।

सही दिशा नहीं मिली तो समाज पर बोझ बन सकते हैं युवा

RSS प्रमुख ने युवा शक्ति के दोनों पहलुओं पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि युवाओं को यदि सही तरीके से तैयार, शिक्षित और मार्गदर्शित नहीं किया गया, तो देश की यह सबसे बड़ी ताकत भविष्य में एक गंभीर चुनौती या समाज पर बोझ बन सकती है। युवाओं में साहस और बड़े फैसले लेने की अद्भुत क्षमता होती है, भले ही उनके पास जीवन के थपेड़ों से मिला अनुभव न हो। इस ऊर्जा को सही और रचनात्मक दिशा में मोड़ना शासन, प्रशासन और समाज की साझी जिम्मेदारी है।

विकास के लिए भारत को बनाने होंगे अपने खुद के मानक

भागवत ने वैश्विक स्तर पर हो रही अंधी दौड़ पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप विकास और प्रगति के पैमाने खुद तय करने होंगे। उन्होंने युवाओं से कहा, “हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत की जमीनी हकीकत अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों से पूरी तरह अलग है।” कम आबादी या विशाल क्षेत्रफल वाले देशों के लिए केवल रोजगार और नौकरियों के बारे में सोचना पर्याप्त हो सकता है। लेकिन भारत जैसे विशाल आबादी और सीमित भौगोलिक क्षेत्र वाले देश को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए बिल्कुल अलग और मौलिक सोच अपनानी होगी। इसके लिए युवाओं को गहराई से अध्ययन करना होगा।

केवल पैसा कमाना भारत की सोच नहीं

भौतिकवाद पर प्रहार करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा विकास को केवल भौतिक और आर्थिक नजरिए से देखता है। इसके विपरीत, भारत की संस्कृति और सोच सिर्फ पैसा कमाने तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने अनौपचारिक अंदाज में कहा, “भारत में हम केवल धन संचय की बात नहीं करते; यहाँ तो लोग मजाक में यह भी कह देते हैं कि पैसा तो मुर्गी भी नहीं खाती। हमारी पहचान हमारी गरिमा, सम्मान और सर्वोच्च प्रतिष्ठा से है।”

उद्यमिता (Entrepreneurship) और श्रम को सम्मान देने की अपील

रोजगार के पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकलने का आह्वान करते हुए उन्होंने युवाओं से रिस्क (जोखिम) लेने और नए कारोबार (स्टार्टअप) शुरू करने की अपील की। उन्होंने कहा, “नौकरी का मतलब सिर्फ दफ्तर में बैठकर काम करना नहीं है।” युवाओं को शारीरिक श्रम और हाथों से किए जाने वाले कार्यों को सम्मान देना होगा। जब युवा मुश्किलों का हिम्मत से सामना करेंगे और अपनी उद्यमशीलता को बढ़ाएंगे, तभी देश आत्मनिर्भर बनेगा।

भविष्य की पीढ़ी के लिए सोचें युवा

सरसंघचालक ने युवाओं को दूरदर्शी बनने की सलाह देते हुए याद दिलाया कि आज के युवा भी अगले ३० वर्षों के बाद बुजुर्गों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। इसलिए, उन्हें केवल अपने तात्कालिक भविष्य या स्वार्थ के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों और पर्यावरण के संतुलन का भी ध्यान रखना चाहिए।

लोकतंत्र में विरोध और नागरिक जिम्मेदारी

हालिया वैश्विक और घरेलू घटनाक्रमों के संदर्भ में लोकतंत्र पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बहस, चर्चा और विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं। यदि जनता के हितों से जुड़े सवाल हैं, तो उन्हें पूरी मजबूती के साथ उठाया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा करते समय देश के संविधान, सार्वजनिक संपत्ति और अपनी नागरिक जिम्मेदारियों की मर्यादा को कभी नहीं भूलना चाहिए।

जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का महत्व

अर्थशास्त्र के मानकों के अनुसार, जब किसी देश की कामकाजी आबादी (15 से 64 वर्ष की आयु) कुल आश्रित आबादी (बच्चों और बुजुर्गों) से अधिक होती है, तो उसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है। वर्तमान में भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, जिसकी लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का यह लाभांश काल (Window) वर्ष 2018 से 2055 तक चलने का अनुमान है। भागवत का यह बयान इसी स्वर्णिम कालखंड का अधिकतम लाभ उठाने और युवाओं को कौशल विकास (Skill Development) तथा सही नैतिक मूल्य देने की आवश्यकता पर जोर देता है।

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