वर्षा अशोक अगलावे बनीं GSI की चीफ, 176 साल के इतिहास में पहली बार किसी महिला को मिली कमान

The CSR Journal Magazine
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के 176 साल के इतिहास में पहली बार किसी महिला को इस प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त किया गया है। वर्षा अशोक अगलावे ने शुक्रवार को जीएसआई की 54वीं महानिदेशक के रूप में कार्यभार संभाला। वे असित साहा का स्थान लेने में सफल रहीं, जिन्होंने पिछले दो वर्षों तक इस पद को संभाला था। वर्षा अशोक अगलावे जीवाश्म विज्ञान (पैलियंटोलाजी) की विशेषज्ञता के साथ भूविज्ञान में तीन दशकों का अनुभव लेकर आई हैं।

जीएसआई में विशेष अनुभव

वर्षा ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय खान ब्यूरो (आइबीएम) में की और 1992 में जीएसआई से जुड़ीं। उनके इस सफर में न केवल तकनीकी ज्ञान, बल्कि प्रबंधन कौशल भी शामिल हैं। भूविज्ञान के क्षेत्र में उनकी गहरी समझ और अनुभव ने उन्हें इस उच्च पद तक पहुंचने में सहायता की है। वे महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बन गई हैं।

महत्वपूर्ण घटनाक्रम

वर्षा अगलावे की नियुक्ति न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी है। इससे महिला कार्यबल को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे और अधिक महिलाएं महत्वपूर्ण पदों पर स्थान पा सकेंगी। इस बदलाव से जीएसआई के कामकाज में भी नई दृष्टिकोण और नवाचार की संभावना बढ़ेगी।

सेवानिवृत्ति की खबरें

इसके अलावा, भारतीय वायुसेना (IAF) के एयर मार्शल एके भारती ने शुक्रवार को डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पद से रिटायरमेंट लिया। वे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डायरेक्टर जनरल एयर ऑपरेशंस के तौर पर कार्य कर चुके थे। रिटायरमेंट के बाद, उन्होंने नई दिल्ली में नेशनल वॉर मेमोरियल जाकर शहादत पाने वाले जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

सैन्य भूमि अदला-बदली

एक और महत्वपूर्ण खबर यह है कि जम्मू विश्वविद्यालय की 53 साल पुरानी भूमि अब खाली होगी। केंद्र सरकार ने इस भूमि के अदला-बदली के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। जम्मू विश्वविद्यालय के मुख्य परिसर से सटी 147 कनाल से अधिक जमीन पर अब सेना का कब्जा नहीं होगा। यह जमीन पिछले पांच दशकों से सेना के अधिनियम में थी।

भूमि संबंधी बदलाव का महत्व

इस प्रस्ताव के तहत, जम्मू-कश्मीर प्रशासन सेना को नगरोटा तहसील में 2,062 कनाल 17 मरला और जम्मू तहसील में 62 कनाल जमीन देगा। इसके बदले में सेना विश्वविद्यालय परिसर से adjacent अपनी जमीन को खाली करेगी। यह जमीन 1973 में तत्कालीन राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय को आवंटित की थी, लेकिन इसका एक हिस्सा हमेशा से सेना के कब्जे में रहा।

वर्षों से अनसुलझा मामला

जम्मू विश्वविद्यालय के प्रशासन और राज्य सरकार ने इस मुद्दे को वर्षों से उठाया है, और अब जाकर यह मंजूरी मिली है। यह बदलाव विश्वविद्यालय के विकास और विस्तार में सहायक होगा। इससे छात्रों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी और शैक्षणिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

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