उदयपुर में पन्नाधाय की जाति को लेकर छिड़ा विवाद: गुर्जर समाज बोले- धाय मां गुर्जर थीं

The CSR Journal Magazine
उदयपुर के मेवाड़ क्षेत्र में ‘पन्नाधाय’ की जाति को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। गुर्जर समाज ने पन्नाधाय को गुर्जर जाति का बताते हुए भारत सरकार की पुस्तक ‘भारत के नारी रत्न’ में दिए गए तथ्यों का खुलेआम विरोध किया है। इस पुस्तक में पन्नाधाय को ‘खीची राजपूत वंश की क्षत्राणी’ बताया गया है। गुर्जर समाज का कहना है कि इस किताब में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की गई है, जिससे उनकी वास्तविक पहचान को नुकसान पहुंचा है।

सरकार के प्रकाशन पर उठे सवाल

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा 2022 में प्रकाशित ‘भारत के नारी रत्न’ की चर्चा में पन्नाधाय के बारे में दिए गए तथ्य समाज के लिए शर्मिंदगी का कारण बने हैं। गुर्जर समाज सेवा समिति ने कलेक्टर के माध्यम से एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर इस मामले में सुधार की मांग की। समाज के अध्यक्ष नारायण लाल गुर्जर ने बताया कि इस पुस्तक के पन्ना नंबर-8 पर पन्नाधाय की पहचान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

प्रमाण और संदर्भ का आधार

गुर्जर समाज के प्रतिनिधियों ने पन्नाधाय की जाति से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों के साथ सबूत देने का दावा किया है। इस संदर्भ में उन्होंने राजसमंद, चित्तौड़गढ़, और उदयपुर में स्थित पन्नाधाय पैनोरमा और दीर्घाओं का हवाला दिया, जहां राजस्थान सरकार ने पन्नाधाय के बारे में प्रामाणिक तथ्य अंकित किए हैं। इसके साथ ही, उदयलाल धाभाई द्वारा लिखी गई ऐतिहासिक किताबें भी इस मामले में महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुति करती हैं।

विरोध की चेतावनी

गुर्जर समाज ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार और संबंधित प्रकाशन विभाग ने उचित दस्तावेजों के आधार पर इस किताब में संशोधन नहीं किया, तो उनका विरोध तेज किया जाएगा। विरोध में कई प्रमुख प्रतिनिधि शामिल रहे, जिसमें समाज के अध्यक्ष नारायण लाल गुर्जर, उपाध्यक्ष हरीश धायभाई, और कोषाध्यक्ष रामचंद्र धाभाई शामिल हैं।

कौन थीं पन्नाधाय?

पन्नाधाय भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम हैं। वह राणा सांगा के पुत्र राणा उदयसिंह की धाय मां थीं। चित्तौड़गढ़ के किले में रहने वाली पन्नाधाय ने राणा उदयसिंह को जिंदगी का दान देने के लिए बड़ी परवाह की। उन्होंने अपने पुत्र का बलिदान देकर राजवंश की रक्षा की, जब बनवीर नामक एक दासी का बेटा उदयसिंह की हत्या का प्रयास कर रहा था। पन्नाधाय ने अपने बेटे चंदन को राजकुमार का स्थान देकर चतुराई से संकट को टाला।

क्या होगा आगे?

गुर्जर समाज का यह कदम उस समय आया है, जब पन्नाधाय का बलिदान और त्याग को याद किया जा रहा है। उनके अदम्य साहस की कहानी न केवल गुर्जर समाज बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाएगी और क्या पन्नाधाय की पहचान को सच्चाई के अनुसार स्थापित किया जाएगा।

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