Uttar Pradesh One District One Cuisine: गजब है उत्तर प्रदेश: बंगाल में मछली चलेगी लेकिन यूपी में योगी को नॉनवेज से है परहेज?

The CSR Journal Magazine
Uttar Pradesh One District One Cuisine: उत्तर प्रदेश की एक जिले एक पकवान योजना का उद्देश्य देश के विभिन्न खानपान संस्कृति को बढ़ावा देना है। लेकिन इस योजना से लखनऊ का मशहूर टुंडे कबाब, गलावटी कबाब, अवधी बिरयानी और निहारी बाहर रह गया है। इतिहास के पन्नों में दर्ज इन व्यंजनों को, जो कि परंपरागत नॉन-वेज फूड का हिस्सा हैं, इस सूची में नहीं शामिल किया गया।

रामपुर का मटन कोरमा और बरेली का मटन व्यंजन भी छूटे

लखनऊ के अलावा, रामपुर के मशहूर रामपुरी मटन कोरमा और सीख कबाब को भी इस लिस्ट में जगह नहीं मिली है। बरेली के लोकप्रिय मटन व्यंजन, जो अपनी ख़ासियत के लिए जाने जाते हैं, वे भी इस योजनामें नहीं दिखाई दिए। इसके अलावा वाराणसी और प्रयागराज में नॉन-वेज स्ट्रीट फूड और मसालेदार करी के लिए पूरे देश में पहचान है। फिर भी, उनके प्रसिद्ध व्यंजन भी लिस्ट से गायब हैं।

क्या सिर्फ शाकाहारी व्यंजन ही होंगे प्राथमिकता में?

यह स्थिति एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि क्या यूपी की यह योजना शाकाहारी व्यंजनों को ही तरजीह दे रही है। अगर ऐसा ही जारी रहा, तो नॉन-वेज की समृद्ध संस्कृति को नुकसान पहुंचेगा। जबकि बाहरी दुनिया में भारतीय नॉन-वेज फूड की एक अलग पहचान है।

खानपान के लिए सही पहचान की जरूरत

खानपान का सही प्रचार और पहचान ही इसे विश्व स्तर पर स्थापित कर सकती है। लेकिन यदि केवल शाकाहारी पकवानों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, तो यह विविधता का सही प्रतिनिधित्व नहीं होगा। टुंडे कबाब और अवधी बिरयानी जैसे नॉन-वेज व्यंजन निश्चित रूप से पहचान के हकदार हैं।

Uttar Pradesh One District One Cuisine: फूडलवर्स के लिए एक चिंतन

दिल्ली, मुंबई, और बेंगलुरू जैसे शहरों में नॉन-वेज फूड का बहुत बड़ा बाजार है। ऐसे में अगर यूपी की योजना में लखनऊ के प्रसिद्ध व्यंजन नहीं हैं, तो यह फूडलवर्स के लिए विचारणीय है। क्या इनमें प्रसिद्ध व्यंजन शामिल नहीं होने से, यूपी की संस्कृति पर कोई असर पड़ेगा? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है जो सभी के मन में उठता है।

खानपान के विविधपन का संरक्षण

भारतीय खानपान में विभिन्नता है और इसकी गहराई को समझना बेहद ज़रूरी है। यूपी में नॉन-वेज के लिए इतना समृद्ध इतिहास है कि इसे नजरअंदाज करना कठिन है। अब देखने वाली बात होगी कि आगे इस योजना में परिवर्तन किए जाते हैं या नहीं। टुंडे कबाब और अन्य मशहूर व्यंजन अभी भी सभी के दिलों में बसते हैं, और उम्मीद है कि उन्हें सही पहचान मिलेगी।

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