जगन्नाथ धाम की अनूठी परंपरा: 365 दिन बाद जमीन से निकला खास फुलुरी तेल

The CSR Journal Magazine
आषाढ़ कृष्ण पक्ष की पंचमी (रविवार) को ओडिशा के पुरी स्थित बड़ा ओड़िया मठ में एक गुप्त स्थान से मिट्टी का घड़ा निकाला गया। यह घड़ा 365 दिन से जमीन के नीचे रखा गया था, जिसमें विशेष औषधीय तेल ‘फुलुरी तेल’ था। इस परंपरा के तहत दैतापति सेवक इसे भगवान जगन्नाथ के श्रीमंदिर लेकर पहुंचे और श्रद्धा से भगवान के शरीर पर इसकी मालिश की गई। यह मान्यता है कि इससे महाप्रभु का दर्द कम होगा और बुखार धीरे-धीरे ठीक होगा, ताकि वे रथयात्रा से पहले नेत्रोत्सव के लिए तैयार हो सकें। रथयात्रा में अब केवल 10 दिन बाकी हैं और मंदिर की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

भक्ति यात्रा का विशेष महत्व

फुलुरी तेल निकालने की प्रक्रिया से पहले जब दैतापति सेवक इसे मंदिर लाते हैं तो यह एक भक्ति यात्रा का हिस्सा बन जाती है। इसके साथ ही पूजारी भी अन्य औषधियों का उपयोग करते हैं, जैसे कैथा गोंद और खड़ी। इस पूरे प्रक्रिया का उद्देश्य भगवान की सेहत को बेहतर बनाना है ताकि रथयात्रा की महक और भव्यता बनी रहे।

अनवसर काल का पवित्र समय

इस दौरान भगवान के विग्रहों को ‘अनवसर पाना’ नाम का भोग अर्पित किया जाता है। यह एक पवित्र पेय है, जिसमें दूध, ताजी मलाई, मिश्री और कपूर का मिश्रण होता है। इसे 15 दिनों तक तैयार किया जाता है और भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है। वासुदेव सिंघारी के मुताबिक, इस विशेष काल में देवता सादे सफेद कपड़े पहनते हैं और पूजा में केवल सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं। इस दौरान मंदिर में घंटियां नहीं बजाई जाती हैं।

विशेष औषधीय तेल की तैयारी

फुलुरी तेल खास परंपरा के तहत तैयार किया जाता है, जिसमें तिल, केतकी, चमेली, बकुल, चंपा, कपूर और चंदन चूर्ण शामिल होते हैं। इस तेल को मिट्टी के पात्र में भरकर सील किया जाता है और यह बडाग्राही हलधर दास महापात्र की देखरेख में तैयार होता है। हर साल इसे रथयात्रा के समय गुंदिचा मंदिर पहुंचने पर हेरा पंचमी के दिन गुप्त स्थान पर मिट्टी में दबा दिया जाता है। 365 दिन बाद इसे निकालने पर इसके औषधीय गुण और अधिक विकसित माने जाते हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

फुलुरी तेल का धार्मिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह भगवान जगन्नाथ के दारु विग्रहों को नमी, कीट और घुन से बचाने में सहायक होता है। इस तरह की परंपराएं जगन्नाथ धाम की सांस्कृतिक धरोहर को और भी मजबूत बनाती हैं। यह न केवल धार्मिक मान्यताओं को मजबूती देती हैं, बल्कि भक्तों में भी नई उमंग और श्रद्धा का संचार करती हैं।

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