उदयनिधि स्टालिन का बयान: मंदिर जाने में नहीं, सोच में भेदभाव के खिलाफ

The CSR Journal Magazine
तमिलनाडु के पूर्व डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने हाल ही में अपने विवादित बयान पर सफाई दी है। उनका कहना है कि उनकी बातों को गलत समझा गया है। उदयनिधि ने स्पष्ट किया कि वे लोगों के मंदिर जाने के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने की बात कर रहे हैं। उन्होंने 12 मई को विधानसभा में कहा था कि “सनातन धर्म को खत्म किया जाना चाहिए,” क्योंकि यह समाज में बंटवारा करता है।

आलोचना का सामना करते हुए

सोशल मीडिया पर सफाई देते हुए उदयनिधि ने कहा कि उन्हें आलोचना से डर नहीं लगता। तमिलनाडु विधानसभा में उनके बयान के बाद उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने लिखा, “जब मैंने कहा कि लोगों को बांटने वाली सोच को खत्म होना चाहिए, कुछ लोग मेरी आलोचना कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि उनके विचार पेरियार, अंबेडकर और करुणानिधि की विचारधारा से जुड़े हैं।

सनातन का सन्दर्भ और विवाद

उदयनिधि ने पहले भी सनातन धर्म की तुलना मच्छर, डेंगू और कोरोना से की थी। उनका कहना है कि ये सभी ऐसी समस्याएं हैं जिनका विरोध ही नहीं, बल्कि समाधान भी जरूरी है। इस पर उनकी आलोचना हुई थी, लेकिन वह अपने बयान पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि यह केवल हिंदू धर्म के प्रति उनका रुख नहीं है, बल्कि वे सनातन प्रथा के खिलाफ हैं।

DMK का आदर्श और सामाजिक बदलाव

उदयनिधि ने कहा कि तमिलनाडु में पिछले 100 सालों से सनातन धर्म का विरोध होता आया है और वे अगले 200 सालों तक भी इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि DMK की स्थापना उसी सिद्धांतों पर हुई थी, जो सामाजिक बुराइयों का विरोध करते हैं।

न्यायालय की टिप्पणियां

इस विवाद के बीच मद्रास हाईकोर्ट ने उदयनिधि की बातें “हेट स्पीच” के दायरे में आते हुए कहा। कोर्ट ने बताया कि ऐसे शब्दों का कोई अर्थ केवल विरोध नहीं, बल्कि मानने वालों के अस्तित्व पर सवाल उठाना भी है। उदयनिधि के बयान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें फटकार लगाई थी, यह कहते हुए कि उन्हें अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करना चाहिए।

संस्कृत पर भी उठाई बातें

उदयनिधि स्टालिन ने संस्कृत भाषा को लेकर भी विवादित टिप्पणियां की हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत एक मरी हुई भाषा है और इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले फंड पर सवाल उठाए। उन्होंने तमिल डेवलपमेंट के लिए केवल 150 करोड़ रुपए की तुलना में संस्कृत को मिलने वाले 2400 करोड़ रुपए का भी जिक्र किया।

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