Supreme Court का बड़ा फैसला: गाली देना हमेशा अश्लीलता नहीं, अभद्र भाषा और अश्लीलता में है फर्क

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है जिसमें कहा गया है कि गाली देना हमेशा अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने यह टिप्पणी एक तमिलनाडु के मामले में सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी शब्द को तब तक अश्लील नहीं माना जाएगा जब तक वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला न हो।

जमीन विवाद में लिपटा मामला

इस मामले का संबंध एक जमीन विवाद से है जहाँ आरोपी मणि को अपनी मातृ गाली देने के लिए दोषी ठहराया गया था। आरोप के अनुसार, अगस्त 2017 में, मणि ने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। इसके बाद, उसने शिकायतकर्ता पर हमला भी किया जिससे उसकी नाक की हड्डी टूट गई।

निचली अदालत का फैसला

निचली अदालत ने मणि को अश्लीलता, गंभीर चोट और धमकी के लिए दोषी ठहराया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे अश्लीलता और आपराधिक धमकी के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता को गालियों से परेशानी हुई यह साबित नहीं हुआ। फिर भी, शिकायतकर्ता को गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में मणि की सजा बरकरार रही।

सजा में दी छूट

कोर्ट ने मणि की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसकी सजा को ‘कोर्ट उठने तक की कैद’ में बदल दिया। साथ ही, उसे दो महीने के भीतर 50,000 रुपए का जुर्माना भरने का निर्देश दिया। यह फैसला मणि की उम्र करीब 70 साल होने के कारण लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में अभद्रता की घटनाएं

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक वकील के द्वारा सीजेआई को अपशब्द कहने की घटना भी सामने आई। इस दौरान वकील ने हंगामा किया और फाइल फेंकी। हालांकि, सीजेआई उस समय कोर्ट रूम में मौजूद नहीं थे। घटना के बाद, सुरक्षा के द्वारा वकील को बाहर निकाल दिया गया और दिल्ली पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए ले गई।

ऐतिहासिक अभद्रता की घटनाएं

सुप्रीम कोर्ट में इसी तरह की घटनाएं पहले भी हुई हैं। 1999 में, एक वकील ने तत्कालीन CJI एएस आनंद पर जूता फेंका था, जिस पर कोर्ट ने चार महीने की जेल की सजा दी थी। 2025 में भी CJI बीआर गवई के कोर्ट रूम में इसी तरह की एक घटना घटी। इन घटनाओं ने कोर्ट की शांति को भंग किया है।

अन्य महत्वपूर्ण मामलों की बात करें

इसी प्रकार, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल से जेल में बंद एक हत्या के आरोपी को जमानत दी है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में अत्यधिक देरी ने उनकी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है। इस तरह के मामलों की सुनवाई में तेज़ी लाना अदालतों की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस बात को ध्यान में रखते हुए किया गया है कि गाली देना हर बार अपराध नहीं होता। यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है जो बताता है कि अभद्र भाषा का संदर्भ और उत्पत्ति भी मायने रखती है।

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