सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अरावली की वैज्ञानिक परिभाषा तय करेगी ICFRE महानिदेशक की अगुवाई वाली कमेटी

The CSR Journal Magazine

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में होगा बदलाव? सुप्रीम कोर्ट ने गठित की एक्सपर्ट कमेटी

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तय करने के लिए पांच सदस्यीय हाई-लेवल एक्सपर्ट कमेटी (उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति) का गठन किया है। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण और अनियंत्रित खनन को रोकने के उद्देश्य से लिया गया है।

हाई-लेवल एक्सपर्ट कमेटी का गठन

अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक पांच सदस्यों की हाई-लेवल एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है। इसका मुख्य उद्देश्य अरावली के दायरे को स्पष्ट करना और अवैध खनन एवं पर्यावरण विनाश को रोकना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विशेषज्ञों की सलाह के बिना पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले नहीं होने चाहिए।

कमेटी का कार्यकाल और सुनवाई तिथि

सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी से रिपोर्ट तैयार करने के लिए 31 अगस्त की अंतिम तिथि निर्धारित की है। इस मामले में अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी। यह फैसला उस समय में आया है जब अरावली क्षेत्र के संरक्षण की आवश्यकता और बढ़ गई है।

कौन-कौन शामिल हैं एक्सपर्ट कमेटी में?

इस कमेटी के अध्यक्ष भारतीय सेंट्रल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICFRE) के महानिदेशक हैं। उनके अलावा चार अन्य विशेषज्ञ भी शामिल हैं: डॉ. सुभाष आशुतोष (पूर्व महानिदेशक, भारतीय वन सर्वेक्षण), डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा (पूर्व निदेशक, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण), बृज मोहन सिंह राठौर (पूर्व संयुक्त सचिव, पर्यावरण मंत्रालय), और प्रो. अशोक के. भटनागर (पूर्व विभागाध्यक्ष, दिल्ली यूनिवर्सिटी)। इसके अतिरिक्त, IIHS के प्रो. जगदीश कृष्णस्वामी और हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।

विवाद और 100 मीटर के मानक की जांच

इससे पहले पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर 20 नवंबर 2025 को एक परिभाषा स्वीकार की गई थी, जिसके तहत स्थानीय भूमि से केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची भू-आकृतियों को ही अरावली माना जा रहा था। इस परिभाषा के कारण राजस्थान की 12,081 अरावली पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही इस दायरे में आ रही थीं, जिससे बची हुई लगभग 90% पहाड़ियों पर से कानूनी सुरक्षा हटने और अवैध खनन बढ़ने का खतरा पैदा हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस पुरानी परिभाषा के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। अब यह नई कमेटी 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर गैप वाले मानदंडों की वैज्ञानिक और पारिस्थितिक वैधता का दोबारा निष्पक्ष आकलन करेगी।

परिभाषा की वर्तमान स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा परिभाषा का पुनः मूल्यांकन आवश्यक है, जिसमें अरावली पहाड़ियों को केवल 500 मीटर के दायरे तक सीमित किया गया है। कमेटी को यह जांचने का कार्य सौंपा गया है कि क्या यह परिभाषा संरक्षित क्षेत्रों को अत्यधिक संकुचित कर रही है, जिससे खनन की गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।

रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा नियमों में भी बदलाव पर विचार करने को कहा है। वर्तमान में, दो अरावली पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से अधिक की दूरी होने पर उस क्षेत्र को अरावली नहीं माना जाता। कोर्ट ने कमेटी को यह सुनिश्चित करने के लिए भी कहा है कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियों की ऊंचाई निर्धारित मानक को पूरा करती है।

संरक्षण के लिए नई दिशा

यह निर्णय अरावली क्षेत्र के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञ टीम अब वैज्ञानिक और भौगोलिक तरीके से अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा और सीमाओं की समीक्षा करेगी। इसके परिणाम स्वरूप, इस इकोसिस्टम को अवैध खनन और विनाशकारी गतिविधियों से बचाने की संभावनाएं बढ़ेंगी।

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