क्या है सलवार उतारना, क्या यह रेप की कोशिश नहीं? न्यायपालिका में उलझन

The CSR Journal Magazine
पटना हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने ज्यादातर लोगों को हैरान कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि महिला की सलवार उतारने और छाती दबाने की कोशिश को ‘रेप की कोशिश’ नहीं माना जा सकता। इन फैसलों पर देशभर में चर्चा तेज हो गई है। क्या इस तरह की यौन हिंसा को हल्के में लिया जा रहा है? अदालतें बार-बार ऐसे मामलों में अलग-अलग दृष्टिकोण क्यों रख रही हैं?

कब होती है रेप की कोशिश? सवाल उठते हैं

पटना हाई कोर्ट के इस फैसले से सवाल उठता है कि रेप की कोशिश मानी कब जाएगी? क्या कपड़ों उतारने की कोशिश या यौन हिंसा की शुरुआत भी ‘अटेम्प्ट टू रेप’ के दायरे में नहीं आती? इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां न्यायपालिका के फैसले विवाद का कारण बने हैं। यह बहस फिर से समाज में गहराई से चर्चा का विषय बन गई है।

अदालती फैसलों में मिली-जुली बातें

2021 में ‘स्किन टू स्किन’ के विवाद ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने कहा था कि महिला का स्तन पकड़ना और पायजामे की डोरी तोड़ना रेप की कोशिश नहीं है। शुक्र है, सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस फैसले को पलटा और इसे रेप की कोशिश माना। अब पटना के मामले ने इस बहस को दोबारा जन्म दिया है।

क्या कहता है पटना हाई कोर्ट का हालिया मामला?

यह मामला 2008 में बिहार के एक फोटो स्टूडियो से संबंधित है। आरोप है कि उस स्टूडियो के मालिक ने युवती के साथ अनुचित व्यवहार किया। हाई कोर्ट ने इसे महिला की मर्यादा भंग का मामला माना और रेप की कोशिश के आरोप को खारिज कर दिया। यह निर्णय फिर से सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए तैयार है।

कानूनी दृष्टिकोण का अंतर

सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि रेप की कोशिश तय करने में आरोपी की मंशा और उसके कृत्य दोनों को देखना जरूरी है। हर मामले का फैसला उसकी खास परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा। यह काफी जटिल है और समझने में कठिनाई भी होती है।

क्या हैं पूर्वाग्रह वाली बातें?

पटना हाई कोर्ट का यह फैसला पहले के उन विवादित फैसलों से बार-बार तुलना में लाता है। हमेशा से यह सवाल उठता है कि न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर एक ही मामले में अलग-अलग फैसले क्यों होते हैं। यह वास्तव में कानून की स्थिति पर कई सवाल खड़े करता है।

रेप और रेप की कोशिश में क्या है अंतर?

खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेप की कोशिश में आरोपी की मंशा बहुत महत्वपूर्ण होती है। किसी भी यौन हमला को सीधे रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इस समझ के बिना, मामलों का निपटारा मुश्किल हो जाता है।

कानूनी दायरा और सजा

केस के तथ्यों के आधार पर रेप के लिए दंड और रेप की कोशिश के लिए दंड में भी अंतर होता है। मुख्य रूप से, धोखाधड़ी के मामले में IPC की धारा 376 के तहत सज़ा होती थी, जबकि अब BNS में धारा 64 और 62 (Attempt) के तहत मामलों की पंक्तिबद्धता होती है। हालांकि, सजा का निर्धारण हमेशा मामले की परिस्थिति और सबूतों के आधार पर किया जाता है।

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