मैरिटल रेप और अप्राकृतिक संबंध: उच्च अदालतों के फैसलों में विरोधाभास

The CSR Journal Magazine

चार हाईकोर्ट के चार फैसले, अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा- पत्नी के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध क्या अपराध है?

पति-पत्नी के बीच अप्राकृतिक यौन संबंधों को लेकर भारतीय अदालतों में मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। हाल ही में चार अलग-अलग हाईकोर्ट के फैसले ने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है। इस विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करने जा रहा है। पति-पत्नी के बीच अप्राकृतिक यौन संबंधों (धारा 377) और वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) के कानूनी अपवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट अब एक बड़े और महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर अंतिम सुनवाई करने जा रहा है। विभिन्न उच्च न्यायालयों (हाई कोर्ट्स) के फैसलों में बढ़ते मतभेदों के कारण यह कानूनी विवाद और अधिक जटिल हो गया है, जिसे सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने कदम उठाया है।

पुराना विवाद, नया मोड़

भारत में लंबे समय से विवाह और पति-पत्नी के बीच सहमति से किए गए यौन संबंधों पर बहस चल रही है। IPC के तहत धारा 375 में रेप की परिभाषा दी गई है, जिसमें एक अपवाद भी शामिल है कि यदि पत्नी की उम्र तय सीमा से अधिक है, तो पति द्वारा बनाए गए यौन संबंध को रेप नहीं माना जाएगा।

उच्च न्यायालयों के बीच मतभेद

भारतीय अदालतों में इस बात को लेकर विरोधाभास है कि क्या बलात्कार कानून के तहत पति को मिलने वाली वैवाहिक छूट (मैरिटल रेप एक्सेप्शन), उसे पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के आरोपों से भी बचाती है या नहीं। मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे कई हाई कोर्ट्स ने हालिया फैसलों में माना है कि विवाह के दायरे में पति-पत्नी के बीच बने शारीरिक संबंधों को धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) के तहत केस के योग्य नहीं माना जा सकता।

सहमति के बिना संबंध बनाना बलात्कार नहीं

अदालतों का तर्क है कि 2013 के संशोधन के बाद जब बलात्कार (धारा 375) की परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया, तो उसमें सभी तरह के यौन कृत्य शामिल हो गए। चूंकि कानून में पत्नी की सहमति के बिना भी शारीरिक संबंध को वैवाहिक अपवाद के तहत बलात्कार नहीं माना गया है, इसलिए उसी कृत्य के लिए पति पर धारा 377 के तहत मुकदमा चलाना कानूनन सही नहीं है।

विपरीत दृष्टिकोण

इसके उलट, इलाहाबाद हाई कोर्ट जैसे कुछ न्यायिक संदर्भों में पहले यह भी माना गया था कि यदि कृत्य पत्नी की इच्छा के विरुद्ध और अप्राकृतिक है, तो वह धारा 377 के तहत आ सकता है। वहीं कर्नाटक हाई कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार की छूट को प्रतिगामी मानते हुए पति के खिलाफ क्रूर यौन अपराधों में इस सुरक्षा को सीमित करने की कोशिश की थी।

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 377 में बदलाव करते हुए सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। हालाँकि, बिना सहमति वाले या जबरन बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंधों पर धारा 377 लागू रहती है। लेकिन, अब इन तीन विभिन्न हाईकोर्ट के चार फैसलों ने कानूनी स्थिति को अस्पष्ट कर दिया है।

इलाहाबाद और पंजाब में अलग राय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह के भीतर बिना सहमति बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंधों को कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। दूसरी ओर, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पति-पत्नी के साथ उसकी इच्छा के खिलाफ अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं, तो इसे आईपीसी की धारा 498A के तहत “क्रूरता” माना जा सकता है।

सुप्रीम सुनवाई की तारीख

इन चार हाईकोर्ट के फैसलों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। एवं अदालत ने इस मामले पर 9 सितंबर को सुनवाई करने की सहमति दी है। यह सुनवाई महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े कानूनों की नई व्याख्या कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने उठने वाली चुनौतियाँ

अब सुप्रीम कोर्ट को तय करना होगा कि क्या विवाह के भीतर पत्नी की इच्छा के खिलाफ बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध माना जा सकता है। इसके साथ ही, उन्हें यह भी देखना होगा कि क्या धारा 375 में दिए गए वैवाहिक अपवाद की व्याख्या पहले जैसी रहेगी या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल

अदालत मुख्य रूप से इस बात की समीक्षा कर रही है कि क्या बलात्कार कानून में दी गई वैवाहिक छूट पति को पत्नी के साथ हर तरह के गंभीर यौन आघातों से भी पूरी तरह कवच प्रदान करती है? हाल ही में रेड डॉट फाउंडेशन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में मांग की गई है कि भले ही मैरिटल रेप का अपवाद लागू रहे, लेकिन यदि पति द्वारा जबरन किए गए अप्राकृतिक या हिंसक यौन कृत्य के कारण पत्नी को गंभीर शारीरिक चोट (Grievous Hurt) आती है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे इस कानूनी छूट का संरक्षण बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए।

देशभर में प्रभावी होगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट का आदेश देशभर में इन मामलों में चल रही पुलिस की जांच, ट्रायल कोर्ट की सुनवाई और वैवाहिक अधिकारों की कानूनी व्याख्या पर प्रभाव डालेगा। यदि सर्वोच्च अदालत स्पष्ट दिशा-निर्देश देती है, तो विवाह के बाद पति द्वारा पत्नी के साथ बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंधों पर अलग-अलग हाईकोर्ट में चल रही विरोधाभासी आदेश रुक जाएंगे।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos