ग्राहम स्टेंस हत्याकांड: 26 साल बाद मुख्य आरोपी दारा सिंह की रिहाई की सुगबुगाहट

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क्या 15 अगस्त को रिहा होगा तीन ईसाइयों को जिंदा जलाने वाला दारा सिंह? सुप्रीम कोर्ट का ओडिशा सरकार को निर्देश

भारत के आपराधिक इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जो कानून व्यवस्था के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं पर भी गहरा घाव छोड़ जाती हैं। साल 1999 का ‘ग्राहम स्टेंस हत्याकांड’ एक ऐसा ही काला पन्ना है, जिसकी गूंज आज 27 साल बाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत और मुख्यधारा की मीडिया में सुनाई दे रही है। ओडिशा की क्योंझर जेल में पिछले 26 वर्षों से बिना पैरोल के बंद इस मामले के मुख्य दोषी दारा सिंह उर्फ रवींद्र कुमार पाल की समय पूर्व रिहाई का रास्ता साफ होता दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का सजा माफी याचिका पर अंतिम निर्णय का आदेश

देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने ओडिशा सरकार को निर्देश दिया है कि वह आगामी 15 अगस्त तक दारा सिंह की रिमिशन (सजा माफी) याचिका पर विचार कर अपनी प्रक्रिया पूरी करे। यह आदेश आते ही 90 के दशक का वह खौफनाक मंजर, धार्मिक कट्टरता की बहस और न्याय की चौखट पर बीते ढाई दशक के घटनाक्रम एक बार फिर देश के सामने जीवंत हो उठे हैं। आइए इस पूरे मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर 22 जनवरी 1999 की रात को मनोहरपुर गांव में क्या हुआ था, दारा सिंह कौन है, अदालत ने उसे क्या सजा सुनाई थी और आज उसकी रिहाई को लेकर क्या कानूनी पेंच हैं।

वह खौफनाक रात: जब जल उठी थी मनोहरपुर में नफ़रत की आग

तारीख थी 22 जनवरी 1999। ओडिशा के क्योंझर जिले का सुदूर आदिवासी इलाका मनोहरपुर कड़ाके की ठंड की चपेट में था। इस गांव में ऑस्ट्रेलियाई मूल के ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टूट स्टेंस (58 वर्ष) अपने दो मासूम बेटों फिलिप (10 वर्ष) और टिमोथी (6 वर्ष) के साथ एक वार्षिक ईसाई उत्सव (कैंप) में शामिल होने आए थे। ग्राहम स्टेंस साल 1965 से भारत में रह रहे थे और मयूरभंज लेप्रोसी होम (कुष्ठ रोग आश्रम) में कुष्ठ रोगियों की सेवा और उनकी चिकित्सा के काम में जुटे थे। उस ठंडी रात को स्टेंस अपने दोनों बच्चों के साथ अपनी विंटेज विलीस स्टेशन वैगन गाड़ी (गाड़ी संख्या: ORM 1251) के भीतर सो रहे थे। आधी रात के बाद, लगभग 12:30 बजे, लाठियों, कुल्हाड़ियों और मशालों से लैस 50-60 लोगों की एक उग्र भीड़ ने उस गाड़ी को घेर लिया। इस भीड़ का नेतृत्व कर रहा था दारा सिंह।

तीन मासूमों को जिंदा भून दिया

भीड़ ने ‘बजरंग बली की जय’ और ‘दारा सिंह जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए गाड़ी के टायरों की हवा निकाल दी और उस पर पेट्रोल व पुआल डालकर आग लगा दी। चश्मदीदों और CBI की चार्जशीट के मुताबिक, जब आग की लपटें आसमान छूने लगीं, तो ग्राहम स्टेंस ने अपने बच्चों को बचाने के लिए गाड़ी से बाहर निकलने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन बाहर खड़ी हिंसक भीड़ ने लाठियों और डंडों के जोर पर उन्हें वापस जलती हुई गाड़ी के भीतर धकेल दिया। कुछ ही मिनटों में वह गाड़ी लोहे के पिंजरे और धधकती भट्टी में तब्दील हो गई। पिता और उसके दो मासूम बच्चे जिंदा जलकर खाक हो गए। अगली सुबह जब पुलिस पहुंची, तो गाड़ी के मलबे से तीन कंकाल एक-दूसरे से लिपटे हुए मिले, मानो पिता आखिरी सांस तक अपने मासूम बच्चों को अपनी बांहों में समेटकर आग की लपटों से बचाने की कोशिश कर रहा था।

कौन है दारा सिंह?

इस बर्बर हत्याकांड का मुख्य सूत्रधार था दारा सिंह, जिसका असली नाम रवींद्र कुमार पाल है। उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के ककोर गांव का रहने वाला दारा सिंह 90 के दशक की शुरुआत में ओडिशा के मयूरभंज और क्योंझर इलाके में आकर बस गया था। वह खुद को एक गौरक्षक और हिंदू हितों का रक्षक बताता था। दारा सिंह और उसके समर्थकों का मानना था कि ग्राहम स्टेंस कुष्ठ रोगियों की सेवा की आड़ में स्थानीय गरीब आदिवासियों का बड़े पैमाने पर जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे थे। इसी कथित गुस्से और धार्मिक उन्माद के तहत दारा सिंह ने स्थानीय युवाओं को लामबंद किया और इस खौफनाक साजिश को अंजाम दिया।

एक साल बाद चढ़ा पुलिस के हत्थे

स्टेंस हत्याकांड के बाद दारा सिंह पूरे देश में ‘मोस्ट वांटेड’ बन गया। पुलिस और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को चकमा देने के लिए वह करीब एक साल तक मयूरभंज के जंगलों में छिपता रहा। आखिरकार, जनवरी 2000 में ओडिशा पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर उसे क्योंझर के जंगलों से गिरफ्तार किया।

कानूनी लड़ाई: निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों की हत्या के मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित किया था, जिसके कारण तत्कालीन केंद्र सरकार ने मामले की जांच CBI को सौंपी। कानून की चौखट पर यह मामला कई पड़ावों से गुजरा। सितंबर 2003 में भुवनेश्वर की विशेष CBI अदालत ने दारा सिंह को इस जघन्य अपराध के लिए दोषी ठहराते हुए मौत की सजा (फांसी) सुनाई। अदालत ने इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामला माना। दारा सिंह के अलावा 12 अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी गई।

ओडिशा हाई कोर्ट का रुख (2005)

दारा सिंह ने फांसी की सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की। मई 2005 में ओडिशा हाई कोर्ट ने दारा सिंह की मौत की सजा को उम्रकैद (Life Imprisonment) में तब्दील कर दिया। हाई कोर्ट का मानना था कि भले ही यह अपराध क्रूर था, लेकिन यह साबित नहीं किया जा सकता कि यह केवल धार्मिक कट्टरता के कारण सुनियोजित था या तात्कालिक आक्रोश का परिणाम था। साथ ही, कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में 11 अन्य सह-आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि एक अन्य आरोपी महेंद्र हेम्ब्रम की उम्रकैद बरकरार रखी।

सुप्रीम कोर्ट की मुहर (2011)

जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. सतशिवम और जस्टिस बी.एस. चौहान की पीठ ने ओडिशा हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और दारा सिंह की उम्रकैद की सजा पर अंतिम मुहर लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी सभ्य समाज में वैचारिक या धार्मिक मतभेदों को सुलझाने के लिए हिंसा और हत्या का सहारा नहीं लिया जा सकता।

26 साल बाद रिहाई की जमीन कैसे तैयार हुई?

भारतीय कानून व्यवस्था के तहत उम्रकैद का मतलब ताउम्र जेल होता है, लेकिन राज्य सरकारों के पास यह अधिकार होता है कि यदि कोई कैदी जेल में एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 14 या 20 वर्ष) पूरी कर लेता है और उसका आचरण अच्छा रहता है, तो ‘सजा समीक्षा बोर्ड’ (Sentence Review Board) की सिफारिश पर उसकी समय पूर्व रिहाई (Remission) की जा सकती है। दारा सिंह जनवरी 2000 से लगातार जेल में बंद है। उसने अपनी सजा के 26 साल पूरे कर लिए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी अवधि के दौरान उसे एक बार भी पैरोल या फर्लो पर जेल से बाहर जाने का मौका नहीं मिला।

उम्र का वास्ता देकर दायर की याचिका

दारा सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर गुहार लगाई थी कि वह अपनी जवानी के 26 साल सलाखों के पीछे काट चुका है, अब वह बुजुर्ग (60 वर्ष से अधिक) हो चुका है और जेल के भीतर उसका आचरण पूरी तरह सुधारात्मक रहा है। उसने यह कृत्य ‘जवानी के जोश और गुमराह होने’ के कारण किया था, जिसका उसे गहरा पछतावा है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ओडिशा सरकार के गृह विभाग और सजा समीक्षा बोर्ड को सख्त लहजे में कहा कि जब कानून के तहत कैदियों के सुधार और रिहाई का प्रावधान है, तो इस मामले को लटका कर क्यों रखा गया है? अदालत ने ओडिशा सरकार को निर्देश दिया कि आगामी 15 अगस्त तक दारा सिंह की रिमिशन प्रक्रिया को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जाए, ताकि यदि वह पात्र पाया जाता है, तो कानून के दायरे में उसे रिहा किया जा सके।

समाज को झकझोरने वाली प्रतिक्रियाएं: न्याय बनाम माफी की बहस

दारा सिंह की संभावित रिहाई की खबरों ने देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बार फिर पुरानी बहसों को जिंदा कर दिया है। इस मामले पर समाज दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है।

मानवाधिकार और कानून के पैरोकार

कानूनी विशेषज्ञों का एक वर्ग सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का समर्थन कर रहा है। उनका तर्क है कि भारतीय न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत ‘दंडात्मक’ होने के साथ-साथ ‘सुधारात्मक’ (Reformative Justice) भी है। यदि कोई अपराधी 26 साल जेल में बिता चुका है और जेल प्रशासन उसके अच्छे आचरण की तस्दीक करता है, तो उसे समाज की मुख्यधारा में लौटने का एक मौका मिलना चाहिए।

मानवाधिकार संगठन और ईसाई समुदाय

दूसरी ओर, कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक संगठनों ने इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि तीन लोगों (जिनमें दो मासूम बच्चे शामिल थे) को जिंदा जलाने वाले व्यक्ति को समय पूर्व छोड़ना समाज में एक गलत नजीर पेश कर सकता है। इससे धार्मिक नफ़रत फैलाने वाले तत्वों के हौसले बुलंद हो सकते हैं।

ग्लेडिस स्टेंस का वह संदेश, जिसने जीत था भारत का दिल

इस पूरे रक्तरंजित इतिहास के बीच यदि कुछ सबसे अनुकरणीय और महान था, तो वह था ग्राहम स्टेंस की पत्नी ग्लेडिस स्टेंस का व्यवहार। अपने पति और दो मासूम पिताओं की इस बर्बर हत्या के बाद भी ग्लेडिस स्टेंस ने भारत नहीं छोड़ा। उन्होंने न केवल भारत में रहकर कुष्ठ रोगियों की सेवा जारी रखी, बल्कि साल 2000 में एक बयान जारी कर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। ग्लेडिस स्टेंस ने कहा था, “मैंने हत्यारों को माफ कर दिया है। मेरे मन में उनके प्रति कोई कड़वाहट या नफ़रत की भावना नहीं है। नफ़रत को नफ़रत से नहीं, बल्कि केवल प्यार से ही जीता जा सकता है।” उनके इस सर्वोच्च मानवीय गरिमा वाले कदम के लिए भारत सरकार ने साल 2005 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा था। ग्लेडिस स्टेंस का वह बयान आज भी धार्मिक विद्वेष के खिलाफ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार माना जाता है।

क्या दारा सिंह को मिलेगी आजादी?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब गेंद ओडिशा की राज्य सरकार के पाले में है। सरकार को दारा सिंह के जेल रिकॉर्ड, स्थानीय पुलिस की रिपोर्ट और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर 15 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट और फैसला कोर्ट के समक्ष रखना होगा। दारा सिंह का जेल से बाहर आना या न आना पूरी तरह से कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत तय होगा, लेकिन इस मामले ने एक बार फिर भारत को यह याद दिला दिया है कि धार्मिक कट्टरता और उन्माद की परिणति कितनी भयावह हो सकती है। मनोहरपुर की वह जलती हुई गाड़ी आज भी देश के विवेक से यह सवाल पूछती है कि क्या हम एक ऐसा समाज बना पा रहे हैं, जहाँ नफ़रत की मशालों के लिए कोई जगह न हो? 15 अगस्त के ऐतिहासिक दिन पर जब देश आजादी का जश्न मना रहा होगा, तब कानून की किताबों में दारा सिंह की किस्मत का एक नया अध्याय लिखा जा चुका होगा।

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