गॉर्डन रामसे भी हुए दीवाने: झारखंड की ‘लाल चींटी की चटनी’ और अनोखे ट्राइबल व्यंजन

The CSR Journal Magazine

गॉर्डन रामसे ने झारखंड की ‘लाल चींटी की चटनी’ को बताया अद्भुत, जानें यहां के खास ट्राइबल व्यंजन

विश्व प्रसिद्ध सेलिब्रिटी शेफ गॉर्डन रामसे ने भारत के आदिवासी अंचलों की पारंपरिक ‘लाल चींटी की चटनी’ का स्वाद चखकर इसे अद्भुत और लाजवाब बताया है। झारखंड पर्यटन विभाग (Jharkhand Tourism) द्वारा साझा किए गए एक वीडियो के बाद यह पारंपरिक व्यंजन वैश्विक स्तर पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है। झारखंड में इसे स्थानीय रूप से ‘डेम्टा चटनी’ कहा जाता है, जो अपने तीखे, खट्टे और चटपटे स्वाद के लिए जानी जाती है। यह चटनी न केवल प्रोटीन, आयरन और विटामिन से भरपूर है बल्कि इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है।

आदिवासी चटनी ने मचाया धमाल

टेलीविजन के बड़े फूड शोज़ अक्सर भव्य होटलों और महंगे रेस्टोरेंट में विदेशी व्यंजनों के चक्कर में घूमते हैं। लेकिन झारखंड की ‘लाल चींटी की चटनी’ ने विश्व स्तरीय शेफ गॉर्डन रामसे का दिल जीत लिया है। इस चटनी ने न केवल अपने अनोखे टेस्ट के लिए प्रशंसा बटोरी, बल्कि झारखंड की अदिवासी संस्कृति को भी एक नई पहचान दी। झारखंड के आदिवासी समुदाय के पास सिर्फ ‘लाल चींटी की चटनी’ ही नहीं, बल्कि कई और अद्भुत व्यंजन भी हैं।

ग्लोबल सुपरफूड-लाल चींटी की चटनी

झारखंड की लाल चींटी की चटनी (जिसे स्थानीय रूप से ‘डेम्टा चटनी’ या ‘कुरकुट’ कहा जाता है) केवल एक पारंपरिक व्यंजन नहीं है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति की पहचान और सेहत का एक बेहतरीन ‘ग्लोबल सुपरफूड’ बन चुका है। जंगलों के ऊंचे साल और महुआ के पेड़ों से इन लाल बुनकर चींटियों (Red Weaver Ants) को इकट्ठा करना बेहद कठिन और जोखिम भरा काम होता है। हाल ही में, झारखंड पर्यटन (Jharkhand Tourism) द्वारा जारी एक वीडियो में मशहूर ब्रिटिश शेफ गॉर्डन रामसे ने भी इस तीखी-खट्टी चटनी को बेहद लाजवाब और ‘चींटी का कैवियार’ (Ant Caviar) बताया है।

स्वाद और मेकिंग का अनोखा तरीका

ग्रामीण लोग पेड़ों पर पत्तों से बने चींटियों के घोंसलों (पोतोम) को सावधानी से बांस की टोकरियों में गिराते हैं। इनमें चींटियों के साथ-साथ उनके सफेद अंडे भी होते हैं। इस चटनी में खटास के लिए टमाटर या इमली नहीं डाली जाती। चींटियों के डंक में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले फॉर्मिक एसिड (Formic Acid) की वजह से इसमें तीखा, नींबू या कच्चे आम जैसा प्राकृतिक खट्टा स्वाद आता है।

पारंपरिक रेसिपी

चींटियों और अंडों को साफ करके ओखली-मूसल में पीसा जाता है। फिर इसमें लहसुन, अदरक, हरी मिर्च, नमक और सरसों तेल मिलाकर एक महीन पेस्ट तैयार किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे पत्तों में लपेटकर (पोटोम) आग पर सेका भी जाता है।

सेहत के लिए ‘जादुई’ फायदे (Health Benefits)

यह चटनी प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, जिंक, और विटामिन B-12 से भरपूर होती है, जो कुपोषण से लड़ने में मददगार है। इसमें उच्च मात्रा में फोलिक एसिड और आयरन होता है, जो शरीर में खून की कमी (एनीमिया) को तेजी से दूर करता है। पारंपरिक मान्यताओं और वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, यह चटनी सर्दी, खांसी, फ्लू और मौसमी बुखार (मलेरिया, टाइफाइड) से शरीर की रक्षा करती है। चींटियों के अम्लीय गुण पेट के हाजमे को दुरुस्त रखते हैं और पूरे डाइजेस्टिव सिस्टम को नेचुरल तरीके से क्लीन करते हैं।

GI Tag- जीआई टैग

पूर्वी भारत के आदिवासी क्षेत्रों की इस अनोखी जैव-विविधता और खानपान शैली को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए इस लाल चींटी की चटनी (मईूरभंज की काई चटनी रूप में) को जीआई टैग (GI Tag) भी मिल चुका है।)

झारखंड का पारंपरिक धुस्का (Dhuska)

यह झारखंड का सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्ट्रीट फूड है। इसे चावल और चने की दाल के घोल (बैटर) से तैयार करके तेल में डीप-फ्राई किया जाता है। यह बाहर से क्रिस्पी और अंदर से बेहद नरम होता है, जिसे आमतौर पर आलू-चने की सब्जी के साथ परोसा जाता है।

रुगड़ा करी (Rugra Curry)

रुगड़ा एक प्रकार का स्थानीय मशरूम (फंगस) है जो मानसून के मौसम में मुख्य रूप से साल (सखुआ) के पेड़ों के नीचे मिट्टी में उगता है। यह प्रोटीन से भरपूर होता है और इसका स्वाद काफी हद तक मटन जैसा लगता है, जिसे स्थानीय लोग बड़े चाव से मसालेदार करी के रूप में पकाते हैं।

चिलका रोटी (Chilka Roti)

यह चावल के आटे और उड़द की दाल के घोल से बनने वाली झारखंड की पारंपरिक रोटी है, जो दिखने में दक्षिण भारतीय डोसे जैसी होती है। यह बेहद हल्की और सुपाच्य होती है, जिसे आदिवासी घरों में नाश्ते या विशेष त्योहारों पर चटनी या सब्जी के साथ खाया जाता है।

हंडिया (Handia)

यह झारखंड के आदिवासी समुदायों का एक पारंपरिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण पेय पदार्थ है। इसे चावल को किण्वित (ferment) करके और कुछ चुनिंदा जंगली जड़ी-बूटियों (राणु टैबलेट) को मिलाकर मिट्टी के बर्तनों में तैयार किया जाता है। त्योहारों और मेहमानों के स्वागत में इसका विशेष महत्व है।

महुआ के व्यंजन और सुकटी (Mahua Delicacies)

महुआ के फूलों को सुखाकर और उबालकर कई तरह के पारंपरिक पकवान और मीठे व्यंजन बनाए जाते हैं। इसके साथ ही गर्मियों के लिए सुखाकर रखी गई मौसमी हरी सब्जियों (जिसे सुकटी कहा जाता है) की पारंपरिक भुजिया या सब्जी भी यहां के भोजन का एक मुख्य हिस्सा है।

झारखंडी दम आलू

यह आम दम आलू से काफी अलग होता है। इसे बनाने में स्थानीय सरसों तेल और पंचफोरन (पाँच मसालों का मिश्रण) का भारी इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय आदिवासी खानपान में आलू को छिलके सहित या बड़े टुकड़ों में काटकर गाढ़ी और तीखी ग्रेवी के साथ पकाया जाता है। इसे अक्सर धुस्का या चिलका रोटी के साथ परोसा जाता है।

झारखंडी मछली करी (Fish Curry)

झारखंड नदियों, तालाबों और बांधों का राज्य है, इसलिए यहाँ ताज़ी छोटी और बड़ी मछलियाँ बहुत पसंद की जाती हैं। यहाँ की पारंपरिक मछली करी में पीली सरसों का पेस्ट (सरसों मसाला), लहसुन और सूखी लाल मिर्च का मुख्य रूप से उपयोग होता है। खटास के लिए टमाटर की जगह अक्सर स्थानीय सूखे आम (अमचूर) या कुदरुम (Kudrum) के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसे एक अनूठा देसी स्वाद देता है।

डोकरा (Dokra / Dhokra)

पाक कला के संदर्भ में, डोकरा असल में चावल के आटे और दाल से बनने वाला एक पारंपरिक भाप में पका (Steamed) व्यंजन है। यह काफी हद तक गुजरात के ढोकला से मिलता-जुलता है, लेकिन इसे झारखंड के स्थानीय मसालों और हरी मिर्च के साथ बेहद कम तेल में तैयार किया जाता है। यह एक बहुत ही पौष्टिक और हल्का नाश्ता है। (नोट: डोकरा झारखंड और पश्चिम बंगाल की एक प्रसिद्ध मेटल कास्टिंग कला भी है।)

संतरे की चटनी

झारखंड के कुछ हिस्सों (विशेषकर शहरी और उप-शहरी इलाकों में जहाँ संतरे की पैदावार या उपलब्धता अच्छी होती है) में सर्दियों के मौसम में यह चटनी बनाई जाती है। इसमें संतरे के पल्प (गूदे) को गुड़ या चीनी, भुने हुए जीरे, सूखी लाल मिर्च और थोड़े से काले नमक के साथ पकाकर खट्टा-मीठा स्वाद (Tangy flavor) दिया जाता है। यह भोजन के साथ एक बेहतरीन पाचक का काम करती है।

गॉर्डन रामसे की हर जगह की खोज

गॉर्डन रामसे ने अपनी यात्रा के दौरान झारखंड की इन अनोखी चटनी और व्यंजनों का स्वाद लिया और इसे अपने सोशल मीडिया पर भी शेयर किया। यह झारखंड की आदिवासी भोजन संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में मदद कर रहा है।

सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक

झारखंड के ये अनोखे व्यंजन न सिर्फ स्वाद में लाजवाब हैं बल्कि यहां की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को भी दर्शाते हैं। इसलिए, अगली बार जब आप झारखंड जाएं, तो इन खास व्यंजनों का जरूर स्वाद लें।

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