फतवा, निर्वासन और वापसी: 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में गरजेंगी तसलीमा नसरीन

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निर्वासन के दो दशक बाद ‘सांस्कृतिक घर’ लौट रही हैं तसलीमा नसरीन, ‘लज्जा’ से ‘लौटने’ तक का सफर

बांग्लादेश से निर्वासित और पूरी दुनिया में कट्टरपंथ के खिलाफ एक सशक्त आवाज बन चुकीं प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन लगभग 20 साल लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखने जा रही हैं। आगामी 1 अगस्त 2026 को वह कोलकाता के हृदय स्थल में स्थित रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक विशेष कट्टरता-विरोधी साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में शिरकत करेंगी। पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन के बाद तसलीमा की यह वापसी न केवल एक भावुक घर-वापसी है, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मोड़ भी है।

निर्वासन का लंबा सफर और कोलकाता से पुराना नाता

वर्ष 1962 में बांग्लादेश में जन्मीं और पेशे से चिकित्सक रहीं तसलीमा नसरीन ने 1990 के दशक की शुरुआत में महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और धार्मिक रूढ़िवादिता के खिलाफ प्रखरता से लिखना शुरू किया। 1993 में प्रकाशित उनके चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ ने वैश्विक स्तर पर सुर्खियां बटोरीं। इस उपन्यास में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू परिवारों पर हुए अत्याचारों और हिंसा का सजीव चित्रण किया गया था। इस किताब के आने के बाद बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामी संगठन भड़क उठे और उनके खिलाफ कई फतवे जारी किए गए, जिसमें उनकी जान लेने तक की धमकियां शामिल थीं। जान के खतरे को देखते हुए तसलीमा को 1994 में अपना मातृदेश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा।

एक दशक के निर्वासन के बाद भारत का रुख

यूरोप और अमेरिका में करीब एक दशक निर्वासन में बिताने के बाद, बंगाली भाषा और संस्कृति के प्रति अपने गहरे मोह के कारण उन्होंने भारत का रुख किया। वर्ष 2004 में केंद्र सरकार से रेजिडेंस परमिट मिलने के बाद वह कोलकाता में बस गईं। वह अक्सर कहती थीं कि बांग्लादेश से निकाले जाने के बाद कोलकाता ही उनका एकमात्र और वास्तविक ‘दूसरा घर’ है, क्योंकि यहाँ की आबो-हवा, भाषा और संस्कृति उनकी अपनी है।

साल 2007 का काला नवंबर: जब छोड़ना पड़ा था शहर

कोलकाता में रहते हुए तसलीमा नसरीन बंगाली समाचार पत्रों में नियमित कॉलम लिखती थीं और शांतिपूर्ण जीवन जी रही थीं। लेकिन यह शांति लंबी नहीं चली। उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द्विखंडित’ (Split: A Life) के कुछ अंशों को लेकर कोलकाता के कुछ चरमपंथी और कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। नवंबर 2007 में यह विरोध प्रदर्शन अचानक बेहद हिंसक हो उठा। कोलकाता की सड़कों पर बड़े पैमाने पर दंगे, आगजनी और तोड़फोड़ हुई, जिसके कारण तत्कालीन प्रशासन को शहर के कुछ हिस्सों में सेना तक तैनात करनी पड़ी थी।

वामपंथी सरकार ने किया नजरबंद

उस समय पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा (सीपीएम) सरकार सत्ता में थी। वोट बैंक के कथित राजनीतिक दबाव और कानून-व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देते हुए वामपंथी सरकार ने तसलीमा नसरीन को रातों-रात कोलकाता छोड़ने का आदेश दे दिया। उन्हें सुरक्षा के बहाने पहले जयपुर और फिर दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ वे कई महीनों तक नजरबंद जैसी स्थितियों में रहीं। इसके बाद से ही सुरक्षा कारणों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते तसलीमा कभी कोलकाता नहीं लौट पाईं।

ममता शासन में भी जारी रहा ‘अघोषित प्रतिबंध’

वर्ष 2011 में जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थकों को उम्मीद थी कि शायद अब तसलीमा की कोलकाता वापसी का रास्ता साफ होगा। लेकिन तृणमूल सरकार के 15 वर्षों के कार्यकाल के दौरान भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। तसलीमा नसरीन ने कई बार आरोप लगाया कि ममता सरकार ने भी तुष्टिकरण की राजनीति के चलते कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए। यहाँ तक कि राज्य के एक थिएटर फेस्टिवल से उनके नाटक ‘लज्जा’ के मंचन को भी कथित तौर पर जबरन रोक दिया गया था। सुरक्षा एजेंसियों का बार-बार यह तर्क देना कि उनकी मौजूदगी से शहर का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है, वास्तव में एक अघोषित प्रतिबंध की तरह काम कर रहा था। इस कारण वह चाहकर भी दो दशकों तक दिल्ली से कोलकाता की दूरी तय नहीं कर सकीं।

इस बार कोलकाता आने की क्या है मुख्य वजह?

तसलीमा नसरीन ने स्वयं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर “20 साल बाद एक स्वतंत्र बंगाल में वापसी” लिखकर इस बात की पुष्टि की है। इस बार उनके आगमन का मुख्य उद्देश्य एक साहित्यिक और सांस्कृतिक विमर्श में भाग लेना है। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का आयोजन मुख्य रूप से ‘सेक्युलर मिशन’ और ‘ह्यूमन राइट्स एंड बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन’ (HRBFF) द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। यह आयोजन कट्टरपंथ और धार्मिक रूढ़िवादिता के खिलाफ ‘मुक्त चिंतन’ और ‘स्वतंत्र विचारों’ को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

निर्वासन के अनुभवों को साझा करना

तसलीमा इस कार्यक्रम में अपनी कविताएं पढ़ेंगी। विशेष रूप से वह अपने कविता संग्रह ‘बंदिनी’ से कविता पाठ करेंगी, जिसे उन्होंने दिल्ली में नजरबंदी के दिनों में लिखा था और जिसकी मुख्य संवेदना कोलकाता शहर के इर्द-गिर्द बुनी गई है। वह मंच से अपने निर्वासन के कठिन दिनों और 2007 में किन परिस्थितियों में उन्हें जबरन कोलकाता से बाहर निकाला गया था, उन कड़वे अनुभवों को भी जनता के सामने रखेंगी।

सत्ता परिवर्तन और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की भूमिका

इस पूरी घर-वापसी के पीछे पश्चिम बंगाल का बदला हुआ राजनीतिक परिदृश्य सबसे बड़ा कारक है। राज्य में भाजपा की सरकार बनने और शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद आयोजकों ने जून के अंत में सरकार से संपर्क किया था। ‘सेक्युलर मिशन’ के पदाधिकारी ओसमान गनी मल्लिक के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तुरंत इस प्रस्ताव का स्वागत किया और तसलीमा नसरीन को राज्य सरकार की ओर से पूर्ण और अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराने का आश्वासन दिया। आयोजकों का कहना है कि जहां पिछली वामपंथी और तृणमूल सरकारें धार्मिक कट्टरपंथियों के दबाव में झुकी रहीं, वहीं वर्तमान सरकार ने कानून-व्यवस्था और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करते हुए यह निर्भीक कदम उठाया है। 1 अगस्त के कार्यक्रम में खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी उपस्थित रहने वाले हैं।

बंगाल की राजनीति में उबाल और तीखी बयानबाजी

तसलीमा नसरीन की वापसी की खबर ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक और सांस्कृतिक गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है। भाजपा और विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई है। राज्य की मंत्री और भाजपा नेता अग्निमित्रा पॉल ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत करते हुए कहा, “पिछली सरकारों ने केवल वोट बैंक की राजनीति की और जब तसलीमा ने अपनी किताबों में कड़वा सच लिखा, तो उन्हें सुरक्षा देने के बजाय शहर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में तसलीमा का कोलकाता आना पूरे बंगाल और उन महिलाओं के लिए गर्व व खुशी की बात है जो स्वतंत्र विचारों का समर्थन करती हैं।” वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी सवाल उठाया कि आखिर इतने वर्षों तक एक लेखिका की आवाज को क्यों दबाया गया, जबकि उन्होंने केवल पड़ोस में रहने वाले हिंदुओं के दर्द को बयां किया था।

विपक्ष का आरोप: ‘विफलताओं से ध्यान भटकाने का हथकंडा’

दूसरी तरफ, विपक्ष इस कदम को पूरी तरह राजनीतिक चश्मे से देख रहा है। तृणमूल कांग्रेस के विधायक अखरुज्जमान ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि तसलीमा नसरीन ने हमेशा एक विशेष समुदाय और शरिया के खिलाफ बातें की हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित करने का प्रयास कर रही है। वहीं इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “भाजपा सरकार ने चुनाव के समय अन्नपूर्णा योजना, सस्ती बिजली और मुफ्त राशन देने के जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने में वह पूरी तरह नाकाम रही है। अब अपनी इन विफलताओं से जनता का ध्यान भटकाने के लिए वे जानबूझकर तसलीमा नसरीन को कोलकाता ला रहे हैं ताकि अल्पसंख्यक विरोधी एजेंडे को हवा दी जा सके।

“वाम मोर्चे की प्रतिक्रिया: ‘यह केंद्र का विषय है’

इस पूरे विवाद पर जब सीपीएम के वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि किसी विदेशी नागरिक या निर्वासित व्यक्ति को भारत में कहाँ रखना है, यह निर्णय पूरी तरह से केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के अधीन होता है। उन्होंने कहा कि चूंकि अब राज्य और केंद्र दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, इसलिए इस प्रकार का समन्वय देखने को मिल रहा है, इसमें राज्य का कोई स्वतंत्र राजनीतिक चमत्कार नहीं है।

क्या कोलकाता स्वीकार कर पाएगा अपनी पुरानी बेटी को?

तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी केवल एक लेखिका का दौरा नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र सोच (मुक्त चिंता) और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच के पुराने द्वंद्व की परीक्षा भी है। इतिहास गवाह है कि कोलकाता को भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है, जहाँ कला, साहित्य और विचारों की भिन्नता का हमेशा सम्मान किया गया है। ऐसे में 20 साल बाद जब तसलीमा 1 अगस्त को रवींद्र सदन के मंच पर खड़ी होंगी, तो देश-दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी होंगी कि क्या कोलकाता का प्रबुद्ध समाज अपनी इस निर्वासित बेटी को वही पुराना प्यार और सुरक्षा दे पाएगा, जिसकी वह दो दशकों से हकदार थीं। सरकार के लिए भी यह यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराना एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती होगी। बहरहाल, तसलीमा के इस कदम ने बंगाल की धरती पर वैचारिक स्वतंत्रता की एक नई और लंबी बहस की नींव जरूर रख दी है।

लेखन की विवादास्पद दुनिया

तसलीमा नसरीन की लेखनी हमेशा से विवादों का केंद्र रही है। उनके लेखन का मुख्य फोकस महिलाओं के अधिकारों, पितृसत्तात्मक मानदंडों, और लैंगिक समानता पर है। उनके सबसे चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ ने उन्हें इंटरनेशनल पहचान दिलाई थी, जिसमें सामाजिक असमानताओं का बेबाक तरीके से चित्रण किया गया था।

40 से अधिक किताबों की लेखिका

तसलीमा ने बांग्ला भाषा में 40 से अधिक किताबें लिखी हैं, जिसमें कविताएं, उपन्यास, और उनकी आत्मकथा के कई भाग शामिल हैं। उनका पहला आत्मकथा ‘मेयेबेला’ 1998 में प्रकाशित हुआ था। इस लेखिका ने विश्व की 30 से अधिक भाषाओं में अनुवादित रचनाएं प्रस्तुत की हैं। उनके लेखन ने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई है।

पश्चिम बंगाल का बदलता माहौल

पश्चिम बंगाल में हालात अब बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। सरकार की नई नीतियों के चलते तसलीमा जैसे लेखकों को एक बार फिर से स्थान मिल रहा है। इस बार तसलीमा के साथ होने वाले साहित्यिक कार्यक्रम से यह स्पष्ट होता है कि राज्य में विकास, सांस्कृतिक बहुलता और चर्चाओं के लिए एक नया वातावरण तैयार किया जा रहा है।

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