उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम में हलचल मचा दी है। अमरोहा के रहने वाले चिकित्साधिकारी डॉ. पीतम सिंह पर सरकार ने एक करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाने का आदेश दिया है। आरोप है कि उन्होंने नीट पीजी की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान नहीं दिया और ड्यूटी से लगातार गैरहाजिर रहे।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
डॉ. पीतम सिंह ने वर्ष 2010 में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में अपनी सेवा शुरू की थी। उस समय वे रायबरेली के ऊंचाहार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात थे। साल 2017 में उन्होंने नीट पीजी के लिए आवेदन किया और नियमों के तहत एक करोड़ रुपये का बांड भरा। इसके बाद उन्हें लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में माइक्रोबायोलॉजी में एमडी कोर्स के लिए चयन मिला।
पीजी कोर्स पूरा करने के बाद सितंबर 2020 में उन्होंने विभाग में योगदान की औपचारिक जानकारी दी। इसी दौरान उनका ट्रांसफर गाजियाबाद के एमएमजी अस्पताल में कर दिया गया। लेकिन जांच में सामने आया कि उन्होंने वहां कभी कार्यभार संभाला ही नहीं और अनधिकृत रूप से ड्यूटी से गैरहाजिर रहे।
विभाग ने क्यों लिया सख्त फैसला?
इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महानिदेशक (प्रशिक्षण) डॉ. रंजना खरे ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने आदेश जारी कर डॉ. पीतम सिंह से बांड के तहत निर्धारित एक करोड़ रुपये की राशि सरकारी खजाने में जमा कराने के निर्देश दिए। साथ ही अमरोहा के डीएम और सीएमओ को इस आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।
क्या कहते हैं नियम?
राज्य सरकार के नियमों के अनुसार, जो चिकित्साधिकारी नीट पीजी के तहत चयनित होते हैं, उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद कम से कम 10 साल तक सरकारी सेवा देना अनिवार्य होता है। यदि कोई डॉक्टर इस अनुबंध का उल्लंघन करता है, तो उसे एक करोड़ रुपये तक की राशि बतौर जुर्माना जमा करनी होती है।
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