DINK लाइफस्टाइल: बढ़ती महंगाई के बीच नो किड्स का नया ट्रेंड

The CSR Journal Magazine

DINK लाइफस्टाइल- युवा दंपत्तियों की नई सोच, बच्चे नहीं, करियर पहली पसंद, क्यों बढ़ रहा युवाओं में नो किड्स का नया ट्रेंड

शहरीकरण, आसमान छूती महंगाई और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच भारत में युवा दंपत्तियों की सोच में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक रूप से शादी के बाद परिवार बढ़ाना जीवन का अगला स्वाभाविक चरण माना जाता थालेकिन आज की Gen Z और Millennials पीढ़ी माता-पिता बनने को एक ‘अनिवार्य नियम’ के बजाय एक ‘व्यावहारिक विकल्प’ के रूप में देख रही है। बढ़ती महंगाई के युग में बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य के भारी भरकम खर्चों ने युवाओं को करियर और वित्तीय स्थिरता को पहली प्राथमिकता बनाने पर मजबूर किया है। इसी सोच के साथ DINKs (Dual Income, No Kids – दोहरी आय, कोई बच्चा नहीं) का चलन महानगरों (जैसे मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली) में तेजी से बढ़ रहा है।

बच्‍चे नहीं, करियर की प्राथमिकता

देश के युवा दंपत्ति शादी के बाद बच्चे पैदा करने से कतराते नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई अहम कारण हैं। बढ़ती हुई जिम्मेदारियों और महंगाई ने परिवारों की सोच में बड़ा बदलाव ला दिया है। युवा अब एक या दो बच्चों से ज्यादा बच्चे नहीं चाहते।

आसमान छूती महंगाई और खर्च

आज के समय में एक बच्चे की अच्छी शिक्षा (स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक), चिकित्सा और अन्य ज़रूरतों पर भारी खर्च आता है। शिक्षा का स्तर इतना ऊंचा हो गया है कि बच्चे का पालन-पोषण करना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। महंगी ट्यूशन फीस और उच्च शिक्षा के खर्च ने युवा दंपत्तियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। वे यह सोचते हैं कि एक बच्चा ही बेहतर है, जिससे उसकी अच्छी शिक्षा दी जा सके।

महंगी लाइफस्टाइल

भारत में मध्यम वर्ग के लिए बच्चों की परवरिश का कुल खर्च करोड़ों में पहुँच सकता है। युवा नहीं चाहते कि पैसों की तंगी के कारण बच्चे के भविष्य से समझौता हो, इसलिए वे आर्थिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित होने के बाद ही यह कदम उठाना चाहते हैं।

करियर और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं

आज की पीढ़ी विशेषकर महिलाएं आत्मनिर्भर हैं। वे शादी के बाद अपने करियर, प्रमोशन और व्यक्तिगत लक्ष्यों (जैसे उच्च शिक्षा, स्टार्टअप या विदेश यात्रा) से समझौता नहीं करना चाहतीं।

मानसिक स्वतंत्रता और मानसिक स्वास्थ्य

आधुनिक दंपत्ति अपने मानसिक स्वास्थ्य और आपसी संबंधों को बहुत महत्व देते हैं। उनका मानना है कि बच्चों की देखभाल में लगने वाले शारीरिक और मानसिक श्रम के बजाय वे अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीने और दुनिया घूमने का विकल्प चुन सकते हैं।

‘पेट पैरेंटिंग’ का नया विकल्प

कई दंपत्ति जो संतान नहीं चाहते, वे ‘डींक्वाड’ (DINKWaD – Double Income No Kids With a Dog) जीवनशैली अपना रहे हैं। बच्चों की ज़िम्मेदारी के बजाय वे पालतू जानवरों (कुत्ते/बिल्ली) के साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं।

करियर में होने वाले नुकसान से बचाव

महिलाओं को अक्सर मातृत्व के बाद करियर में ब्रेक (Career penalty) लेना पड़ता है। इस ‘करियर लॉस’ से बचने के लिए भी कई दंपत्ति संतान सुख को टालने या त्यागने का निर्णय लेते हैं।

भ्रष्टाचार और नौकरी की अनिश्चितता

भ्रष्टाचार भी एक प्रमुख कारण है, जो युवा दंपत्तियों को बच्चों के मामले में सोचने पर मजबूर करता है। नौकरी की अनिश्चितता और बेकारी का डर भी दंपत्तियों की सोच को बदल रहा है। युवा अपनी करियर पर ध्यान देना प्राथमिकता मानते हैं, जिसके चलते परिवार बढ़ाने के विचार को टाल रहे हैं।

उच्च स्वास्थ्य सेवाएं

स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च में वृद्धि भी इस समस्या का एक और पहलू है। अच्छे स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करना अब पहले से कहीं महंगा हो गया है। युवा दंपत्तियों को लगता है कि बच्चों की स्वास्थ्य देखभाल में ज्यादा पैसे खर्च होंगे। साथ ही, बदलती जीवनशैली और काम के बढ़ते तनाव ने उनके फैसले को और भी जटिल बना दिया है।

समाज की बदलती सोच

समाज भी अब बच्चों की संख्या के प्रति ज्यादा उदार नहीं रह गया है। परिवार का आकार घटाने की सोच एक नयी परंपरा बनती जा रही है। युवा दंपत्ति केवल एक ही बच्चे के साथ परिवार का अस्तित्व बनाए रखने में सहज महसूस कर रहे हैं। वे यह मानते हैं कि इससे उनके परिवार और करियर पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।

नई पीढ़ी के विचार

नई पीढ़ी सोचती है कि जिम्मेदारियों और दबावों के बीच ही एक स्वस्थ और संतुलित जीवन जीना संभव है। सीमित संख्या में बच्चों से वे अपने करियर की संभावनाओं को बढ़ाने और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करने पर ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं। इससे उनके जीवन के सभी पहलुओं में संतुलन बना रहता है।

युवाओं की प्राथमिकता में बदलाव

अब युवाओं की प्राथमिकता केवल खुद की आर्थिक सुरक्षा और करियर की उन्नति है। वे मानते हैं कि पहले अपनी नौकरी और जिंदगी को स्थिर करना ज्यादा जरूरी है। बच्चे होने पर नई जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ जाएगा, इसलिए वे एक निर्धारित सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह एक बहुत ही व्यक्तिगत और साहसिक निर्णय है। एक तरफ यह दंपत्तियों को वित्तीय स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता देता है, तो दूसरी तरफ विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और वर्कफोर्स की कमी के रूप में इसके सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं।

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