3 साल में दवाएं 7% महंगी, नकली दवाओं के मामले भी नहीं थमे…आखिर दवा खाना क्यों हो गया है महंगा?

The CSR Journal Magazine
पिछले तीन वर्षों में दवाओं की कीमतों में औसतन 6.94% की बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किया गया है। एक तरफ जहां यह वृद्धि 10% की अधिकतम सीमा से कम है, वहीं, सामान्य जनता की जेब पर इसका असर लगातार बढ़ता जा रहा है। इलाज के दौरान दवाओं की कीमतें अस्पतालों में मिलने वाली फीस से भी ज्यादा हो जाती हैं, जिससे मरीजों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है।

नकली दवाओं का बढ़ा खतरा

दवाओं के महंगे होने के साथ-साथ नकली और घटिया दवाओं के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। साल 2025-26 में 3,295 दवा नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें 3,012 नमूने घटिया और 283 नमूने नकली निकले। इसका मतलब यह है कि रोजाना लगभग 9 दवा नमूने अस्वास्थ्यकर पाए जा रहे हैं। ऐसे मामलों पर प्रभावी कार्रवाई की दर बेहद सीमित दिखाई देती है, जिसके कारण आम जनता को असुरक्षित दवाएँ लेने की मजबूरी हो रही है।

सरकारी नियंत्रण का महत्व

दवाओं की कीमतें ड्रग्स ऑर्डर, 2013 के प्रावधानों के तहत नियंत्रित होती हैं। रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल के अनुसार, राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) दवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित करती है। हाल ही में 935 फॉर्मूलेशन की सीलिंग प्राइस लागू की गई है, जिससे औसतन 17% की कमी दर्ज की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस नियंत्रण का वास्तविक लाभ आम जनता को मिल रहा है?

जनऔषधि और अमृत फार्मेसियों का प्रभाव

जनऔषधि केंद्रों पर दवाएँ 50-80% तक सस्ती मिलती हैं, जिससे मरीजों के इलाज का खर्च कम होता है। अमृत फार्मेसियों में कैंसर और हृदय रोग की दवाओं पर औसतन 50% तक छूट मिलती है। इसके अलावा, सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाएँ मुफ्त उपलब्ध कराने का प्रावधान है। यह सुविधाएँ महंगाई के इस दौर में मरीजों के लिए एक आशा की किरण हैं।

दवा की श्रेणियाँ: शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड

शेड्यूल्ड दवाएँ वे होती हैं जो राष्ट्रीय सूची में शामिल हैं और जिनकी कीमतें सीधे NPPA द्वारा तय की जाती हैं। वहीं, नॉन-शेड्यूल्ड दवाएँ वे होती हैं जिनकी कीमत सरकार द्वारा सीधे नियंत्रित नहीं की जाती और कंपनियाँ अपनी मर्ज़ी से दाम तय करती हैं। यह समस्या मरीजों की जेब पर भारी पड़ती है, क्योंकि इन दवाओं की कीमतें आसानी से बढ़ाई जा सकती हैं।

ग्लोबल संकट का असर दवा कीमतों पर

मिडिल ईस्ट संकट और कच्चे माल की कमी ने दवा की लागत को प्रभावित किया है। कई रसायनों की कीमतों में 200-300% तक वृद्धि हुई है। इसके फलस्वरूप, कैंसर की दवाओं और बच्चों के टीकों की कीमतों में 50% तक का इजाफा देखने को मिला है। सरकारी आंकड़े इसे स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि भले ही दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए उपाय लागू हैं, परंतु वास्तविकता में घटिया और नकली दवाओं के मामलों के बढ़ने पर मॉनिटरिंग की कमी स्पष्ट है।

सस्ती एवं सुरक्षित दवाओं की चुनौती

जनऔषधि और अमृत फार्मेसी जैसी योजनाओं का दावा भले बड़ा हो, लेकिन बढ़ती कीमतें और दवा की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े यह दर्शाते हैं कि आम मरीज के लिए सस्ती और भरोसेमंद दवा हासिल करना अब भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। हमारे देश में दवा की कीमतों और गुणवत्ता की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है, जिसे पूरी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता।

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