तीसरे कार्यकाल के तीसरे बजट में भी अल्पसंख्यक मंत्रालय उपेक्षा का शिकार
What did Muslims gets from Budget 2026: मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के तीसरे बजट में एक बार फिर मुस्लिम समुदाय को निराशा हाथ लगी है। Union Budget 2026-27 में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए कुल 3400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। पिछले साल यह बजट 3395.62 करोड़ रुपये था। यानी पूरे साल के लिए महज 4.38 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी। इतने बड़े देश और करोड़ों अल्पसंख्यक आबादी के लिए यह बढ़ोतरी ऊंट के मुंह में जीरे के समान मानी जा रही है।
सबका साथ के नारे पर उठे सवाल, दावा और हकीकत कुछ और
सरकार बार-बार “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देती है, लेकिन बजट के आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। महंगाई, शिक्षा और बेरोजगारी के इस दौर में अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट में नाममात्र की बढ़ोतरी यह दिखाती है कि मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में अल्पसंख्यक कल्याण कहीं पीछे छूट गया है। आलोचकों का कहना है कि सरकार मुस्लिम समुदाय के नाम पर तुष्टिकरण का आरोप तो लगाती है, लेकिन जब वास्तविक मदद की बारी आती है, तो हाथ खींच लेती है।
मुस्लिम के शिक्षा और रोजगार पर सीधा असर
अल्पसंख्यक मंत्रालय के तहत चलने वाली Scholarship Schemes, स्किल डेवलपमेंट और आर्थिक सशक्तिकरण की योजनाएं पहले से ही सीमित संसाधनों से जूझ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ 4 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी से न तो नई योजनाएं शुरू हो पाएंगी और न ही मौजूदा योजनाओं का दायरा बढ़ सकेगा। खासतौर पर अल्पसंख्यक छात्रों की शिक्षा और युवाओं के रोजगार से जुड़ी उम्मीदों को इस बजट ने झटका दिया है।
What did Muslims gets from Budget 2026: विपक्ष का हमला तेज
बजट आते ही विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि यह बजट साफ तौर पर अल्पसंख्यकों के प्रति सरकार की उदासीनता को दिखाता है। उनका आरोप है कि सरकार सिर्फ भाषणों में समावेशी विकास की बात करती है, जबकि बजट में अल्पसंख्यकों के लिए ठोस प्रतिबद्धता नजर नहीं आती।
What did Muslims gets from Budget 2026: राजनीतिक संदेश भी साफ
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक Budget 2026-27 India में अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट में मामूली बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि मोदी सरकार इस वर्ग को अपने मुख्य एजेंडे में शामिल करने के मूड में नहीं है। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा कारण बन सकता है। कुल मिलाकर, अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट में सिर्फ 4 करोड़ की बढ़ोतरी ने मोदी सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
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