सिस्टम में छेद, छात्रों पर कड़ाई: NEET विवाद के बाद परीक्षा प्रणाली को बदलने की क्यों उठी मांग?

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अभूतपूर्व सुरक्षा के बीच संपन्न हुई NEET-UG 2026 पुनर्परीक्षा; 20 लाख से अधिक छात्र हुए शामिल, मगर कड़े नियमों और हादसों ने कइयों की उम्मीदों पर फेरा पानी

पेपर लीक और बड़े विवादों की छांव में देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा (Re-Exam) रविवार, 21 जून 2026 को देश और विदेश के 5,440 केंद्रों पर संपन्न हो गई। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के मुताबिक, इस परीक्षा में 20 लाख से अधिक (लगभग 22.79 लाख पंजीकृत) अभ्यर्थियों ने भाग लिया। मूल परीक्षा के रद्द होने के महज 37 दिनों के भीतर इस विशाल परीक्षा का दोबारा आयोजन प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जिसे NTA ने ‘टीम भारत’ का सामूहिक प्रयास कहा है। हालांकि, जहां एक तरफ सरकार और प्रशासन इस परीक्षा को “पूरी तरह सुरक्षित और निर्बाध” बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के अलग-अलग हिस्सों से आई जमीनी रिपोर्टें एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं। कड़ी सुरक्षा, सख्त ड्रेस कोड और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के चलते कई छात्र परीक्षा देने से वंचित रह गए, तो कहीं प्राकृतिक आपदाओं और स्थानीय हादसों ने छात्रों के साल भर की मेहनत पर पानी फेर दिया।

अभूतपूर्व सुरक्षा के बीच परीक्षा

NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने बताया कि परीक्षा को पूरी तरह निष्पक्ष बनाने के लिए एक व्यापक प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया था। इस परीक्षा को सुचारू रूप से चलाने के लिए देश भर में 7 लाख से अधिक अधिकारियों, पुलिस कर्मियों और पर्यवेक्षकों (Observers) को तैनात किया गया था।

सुरक्षा का चक्रव्यूह

वर्चुअल निगरानी: देश भर के 95,000 से अधिक परीक्षा कक्षों में 1,38,560 सीसीटीवी कैमरे लाइव फीड दे रहे थे।
इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा: ब्लूटूथ या किसी अन्य डिवाइस से नकल रोकने के लिए केंद्रों पर 51,311 सिग्नल जैमर्स लगाए गए थे।
बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण: सभी छात्रों का आधार-आधारित बायोमेट्रिक और फेशियल ऑथेंटिकेशन अनिवार्य किया गया था।
अंतरराष्ट्रीय केंद्र: भारत के 551 शहरों के अलावा विदेशी छात्रों के लिए 14 अंतरराष्ट्रीय केंद्रों पर भी परीक्षा आयोजित की गई।

‘कड़े नियम’ और ‘बदकिस्मती’: क्यों छूटी कई छात्रों की परीक्षा?

सुरक्षा के ये कड़े इंतजाम कई योग्य छात्रों के लिए मानसिक और व्यावहारिक तौर पर मुसीबत बन गए। देश के अलग-अलग परीक्षा केंद्रों से ऐसी कई घटनाएं सामने आईं जहां छात्र केंद्र तक पहुंचे तो सही, लेकिन परीक्षा कक्ष में नहीं बैठ सके।

महज 2 मिनट की देरी और टूट गए सपने

भोपाल के एक परीक्षा केंद्र पर एक अभ्यर्थी अपने चाचा आमिर कादरी के साथ बाइक से आ रहा था। रास्ते में एक मामूली दुर्घटना (एक्सीडेंट) हो गई। अस्पताल में प्राथमिक उपचार कराने के बाद जब वे केंद्र पर पहुंचे, तो गेट बंद हो चुका था। आमिर कादरी ने मीडिया को बताया, “हम दुर्घटना के कारण केवल दो मिनट लेट हुए थे। छात्र के हाथ पर पट्टी बंधी थी, हमने अधिकारियों के सामने मिन्नतें कीं, लेकिन उन्होंने नियमों का हवाला देकर अंदर जाने से मना कर दिया। परीक्षा शुरू हो चुकी थी और प्रशासन टस से मस नहीं हुआ।”

मुंबई में परिवहन की मार और लोकल की सुस्ती

मुंबई और उसके उपनगरीय इलाकों में परीक्षा के दिन ही Brihanmumbai Electric Supply and Transport (BEST) के कर्मचारियों की अचानक हुई आंशिक हड़ताल और सेंट्रल व वेस्टर्न रेलवे लाइनों पर ट्रेनों की कछुआ चाल ने सैकड़ों छात्रों को संकट में डाल दिया। हालांकि राज्य सरकार ने कुछ विशेष बसें चलाने का दावा किया था, लेकिन ट्रैफिक जाम और सीमित साधनों के कारण नवी मुंबई और ठाणे के कई छात्र दोपहर 1:30 बजे की अंतिम प्रवेश समय-सीमा (Cut-off Time) से चूक गए और रोते हुए केंद्रों के बाहर खड़े रहे।

कोलकाता में मूसलाधार बारिश और जलभराव

कोलकाता और दक्षिण 24 परगना के कई हिस्सों में रविवार सुबह से ही भारी बारिश शुरू हो गई। देखते ही देखते सड़कों पर घुटनों तक पानी भर गया, जिससे यातायात ठप हो गया। जो छात्र सामान्य दिनों में 30 मिनट में केंद्र पहुंच सकते थे, उन्हें परीक्षा केंद्र पहुंचने में तीन से चार घंटे लग गए। कई छात्र भीगे कपड़ों और बिना एडमिट कार्ड (जो पानी में गल गए थे) के पहुंचे, जिन्हें तकनीकी रूप से प्रवेश मिलने में भारी मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

ड्रेस कोड और धार्मिक पहचान पर विवाद

राजस्थान के अजमेर में बेआवर से आई एक छात्रा कुलसुम बानो को परीक्षा केंद्र पर एंट्री को लेकर सुरक्षाकर्मियों से तीखी बहस का सामना करना पड़ा। कुलसुम बुर्का और दुपट्टा पहनकर आई थीं। उन्होंने दावा किया, “मैंने 3 मई को हुई मूल परीक्षा में भी यही पहनावा पहना था, तब कोई दिक्कत नहीं हुई थी। लेकिन आज पहले दुपट्टा और फिर बुर्का उतारने का दबाव बनाया गया।” हालांकि, बाद में NTA के हस्तक्षेप और सघन तलाशी के बाद छात्रा को परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई, लेकिन इस हंगामे के कारण छात्र का कीमती समय और मानसिक संतुलन प्रभावित हुआ।

मानसिक तनाव और कठिन प्रश्न पत्र की दोहरी चुनौती

पहली बार परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा के इस पूरे घटनाक्रम ने छात्रों को गहरे मानसिक तनाव में धकेल दिया था। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने परीक्षा से पहले छात्रों से “बिना किसी डर और चिंता के” परीक्षा देने की अपील की थी, लेकिन धरातल पर छात्र काफी घबराए हुए थे।छात्रों की प्रतिक्रिया के अनुसार, इस बार का प्रश्न पत्र रद्द हो चुकी पहली परीक्षा की तुलना में अधिक कठिन और पेचीदा था।

विषय-वार विश्लेषण: छात्रों की जुबानी

भौतिक विज्ञान (Physics): छात्रों ने फिजिक्स के सेक्शन को सबसे कठिन और समय लेने वाला (Lengthy) बताया। न्यूमेरिकल सवाल काफी लंबे थे, जिसने छात्रों का काफी समय खराब किया।
रसायन विज्ञान (Chemistry): केमिस्ट्री का पेपर मिला-जुला (Moderate) था। आर्गेनिक केमिस्ट्री के कुछ सवालों ने छात्रों को जरूर उलझाया, लेकिन यह स्कोरिंग था।
जीव विज्ञान (Biology): बॉटनी और जूलॉजी के सवाल पूरी तरह NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित थे और तुलनात्मक रूप से आसान थे, जिससे छात्रों को कुछ राहत मिली। कठिन प्रश्न पत्र को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल का ओवरऑल कट-ऑफ (Cut-off) पिछली बार की तुलना में थोड़ा नीचे जा सकता है।

मानवीय दृष्टिकोण: प्रशासन की सकारात्मक पहल

इन तमाम दिक्कतों और सख्तियों के बीच कुछ जगहों पर मानवीय संवेदनाओं की मिसाल भी देखने को मिली। NTA ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इस बार 10,000 से अधिक दिव्यांग (PwD) उम्मीदवारों और 81 ऐसे छात्रों के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी जो गंभीर बीमारियों या हालिया हादसों से पीड़ित थे। पश्चिम बंगाल के एक केंद्र पर परीक्षा देने पहुंची छात्रा सृष्टि दुबे का एक सप्ताह पहले ही बड़ा एक्सीडेंट हुआ था। वह चलने की स्थिति में नहीं थीं। परीक्षा केंद्र के अधिकारियों ने मानवीय आधार पर उनके लिए ग्राउंड फ्लोर पर एक अलग कमरे की व्यवस्था की, एक एम्बुलेंस और मेडिकल टीम को तैनात रखा और उन्हें व्हीलचेयर के माध्यम से परीक्षा कक्ष तक पहुंचाया।

आगे क्या? परिणाम और भविष्य की राह

NTA प्रमुख ने साफ किया है कि चूंकि परीक्षा रिकॉर्ड 37 दिनों के भीतर दोबारा आयोजित की गई है, इसलिए इसके परिणामों को तैयार करने की प्रक्रिया भी युद्ध स्तर पर चल रही है। एजेंसी का लक्ष्य है कि बिना किसी और देरी के अतिशीघ्र आधिकारिक उत्तर कुंजी (Answer Key) और परिणाम (Results) घोषित कर दिए जाएं ताकि मेडिकल काउंसलिंग की प्रक्रिया समय पर शुरू हो सके।

बिहार में गिरफ़्तारी

परीक्षा के दौरान बिहार में एक बड़े सॉल्वर गैंग का पर्दाफाश किया गया है। इसमें 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें सात सॉल्वर भी शामिल हैं। इस गैंग से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सूचना मिली है कि असली अभ्यर्थियों की जगह दूसरों को परीक्षा दिलाने के लिए लाखों रुपये का सौदा किया गया था। यह रैकेट एक छात्र द्वारा चलाया जा रहा था जो खुद गैंग में शामिल था। बिहार में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 9 फर्जी परीक्षार्थियों (Impersonators) को गिरफ्तार किया है, जो दूसरे छात्रों की जगह परीक्षा देने बैठे थे। इससे स्पष्ट होता है कि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत तो थी, लेकिन शिक्षा माफिया अब भी सेंध लगाने की ताक में थे।

बड़ी परीक्षा, बड़ी तादाद

एनटीए के द्वारा पुनर्परीक्षा में देशभर के 5,440 केंद्रों और विदेश के 14 केंद्रों पर 20 लाख से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया। यह परीक्षा हिंदी और अंग्रेजी के अलावा कुल 13 भाषाओं में आयोजित की गई, जो भारतीयता की भावना को दर्शाती है। पेपर लीक के मामले के बाद यह परीक्षा आयोजित की गई। पिछले साल की तुलना में छात्रों की संख्या में कमी आई है, लेकिन सुरक्षा इंतजामों में कोई कमी नहीं आई। पीएम नरेंद्र मोदी भी इस परीक्षा की निगरानी कर रहे थे।

सुरक्षा के रक्षकों की मेहनत

पुनर्परीक्षा के दौरान सुरक्षा की दृष्टि से 7 लाख से अधिक अधिकारी, पुलिस और पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए थे। 37 दिनों के भीतर परीक्षा की तैयारियां पूरी की गईं। 51,311 जैमर लगाए गए ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न हो सके। एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने इस बात की पुष्टि की कि सभी सुरक्षा कदमों का उद्देश्य परीक्षा की पवित्रता बनाए रखना था।

PM मोदी की खास प्राथमिकता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा में जाने वाले छात्रों को किसी प्रकार की असुविधा से बचाने के लिए हवाई अड्डे पर कुछ देर रुके रहे। परीक्षा के प्रश्नपत्र की कठिनाई स्तर को लेकर छात्रों के बीच चर्चा जारी है कि इस बार के प्रश्न अधिक चुनौतीपूर्ण रहे हैं।

सुरक्षा का चक्रव्यूह या छात्रों की मुसीबत? 

NEET परीक्षा की शुचिता, पेपर लीक विवाद, और हाल ही में कड़े नियमों के कारण छात्रों के परीक्षा से वंचित होने की घटनाओं ने देश की पूरी परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षाविदों, कानूनी विशेषज्ञों और अभिभावकों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या मौजूदा नियमों में बड़े बदलाव का समय आ गया है।

मानवीय दृष्टिकोण का अभाव

‘जीरो टॉलरेंस’ और कड़े सुरक्षा नियमों के नाम पर दुर्घटना, गंभीर बीमारी या भारी बारिश-बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण महज 2-5 मिनट देरी से पहुंचने वाले छात्रों को सीधे बाहर कर दिया जाता है। सवाल यह है कि क्या एक छात्र के पूरे साल की मेहनत से बड़ा “2 मिनट का नियम” हो सकता है?

केंद्र-स्तरीय असमानता

अलग-अलग परीक्षा केंद्रों पर नियमों की व्याख्या अलग तरह से की जाती है। कहीं धार्मिक पोशाक, कड़े या हिजाब को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जाता है, जिससे छात्र परीक्षा से ठीक पहले गहरे मानसिक तनाव (Mental Trauma) में आ जाते हैं।

शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना

जूते-चप्पल उतरवाना, कपड़ों की फुल-स्लीव्स काटना, या चश्मे की सघन जांच के नाम पर छात्रों को अपराधियों जैसा महसूस कराया जाता है। परीक्षा से ठीक पहले इस तरह का माहौल उनकी तार्किक क्षमता और प्रदर्शन को प्रभावित करता है।

सुरक्षा के बाद भी लीक

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सुरक्षा के नाम पर छात्रों को इतनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, तब भी परीक्षा प्रणाली के भीतर (सिस्टम के अंदर) बैठे लोग पेपर लीक करने में कामयाब कैसे हो जाते हैं? यानी कड़ाई केवल मासूम छात्रों पर क्यों, असली गुनहगारों पर क्यों नहीं?

क्या बदलाव और सुधार समय की मांग हैं?

विशेषज्ञों और शिक्षा सुधारकों का मानना है कि परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के साथ-साथ इसे छात्र-अनुकूल (Student-Friendly) बनाना बेहद जरूरी है। इसके लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए जा सकते हैं।

डिजिटल और हाइब्रिड परीक्षा मॉडल

पेन-पेपर (OMR) आधारित परीक्षा के बजाय, NEET को भी JEE (Main) की तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) या हाइब्रिड मॉडल में बदला जाना चाहिए। इससे पेपर के भौतिक परिवहन (Physical Transport) की जरूरत खत्म होगी, जिससे रास्ते में या प्रिंटिंग प्रेस से पेपर लीक होने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

परीक्षा के बहु-चरण (Multiple Attempts)

साल में केवल एक बार परीक्षा होने के कारण छात्रों पर “करो या मरो” का अत्यधिक मानसिक दबाव होता है। यदि किसी दुर्घटना के कारण परीक्षा छूट जाए, तो पूरा साल बर्बाद हो जाता है। NEET को साल में दो बार आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि छात्रों के पास एक बैकअप विकल्प उपलब्ध हो।

‘ग्रेस टाइम’ और आपातकालीन नियमों में ढील

परीक्षा केंद्रों को असाधारण परिस्थितियों (जैसे- सड़क दुर्घटना, भारी बारिश, या सार्वजनिक परिवहन की विफलता) में 10 से 15 मिनट का ‘ग्रेस टाइम’ देने का अधिकार होना चाहिए। देरी से आने वाले छात्रों की सघन सुरक्षा जांच के लिए एक अलग ‘फास्ट-ट्रैक’ काउंटर होना चाहिए, न कि उनके लिए सीधे गेट बंद कर दिया जाए।

मानकीकृत ड्रेस कोड और संवेदनशीलता

नियमों में स्पष्टता होनी चाहिए ताकि परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षाकर्मी अपनी मर्जी से कोई नियम न थोप सकें। सुरक्षा और चेकिंग स्टाफ को परीक्षा से पहले संवेदनशीलता और व्यवहारिक ट्रेनिंग (Sensitization Training) दी जानी चाहिए ताकि वे छात्रों के साथ अपराधियों जैसा बर्ताव न करें।

कड़ी सुरक्षा के बीच परीक्षा संपन्न हुई

दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई छात्रों ने परीक्षा में भाग लिया। सुरक्षा व्यवस्थाएं चाक चौबंद थीं, जिससे परीक्षा सुचारू तरीके से संपन्न हुई। छात्रों का मानना है कि इस बार कट-ऑफ कम रहने की गुंजाइश है, क्योंकि पेपर ज्यादा कठिन था। NEET-UG 2026 की यह पुनर्परीक्षा भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए एक कड़ा सबक है। जहां एक तरफ ‘टीम भारत’ ने इतने बड़े स्तर पर सुरक्षित परीक्षा कराकर अपनी प्रशासनिक क्षमता को साबित किया है, वहीं दूसरी तरफ कड़े नियमों की वेदी पर कुछ छात्रों के सपनों की बलि चढ़ जाना यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी व्यवस्था में मानवीय दृष्टिकोण के लिए थोड़ी और जगह नहीं होनी चाहिए?

क्या प्रशासनिक कठोरता NEET उम्मीदवारों के भविष्य से बड़ी है?

नियमों का उद्देश्य परीक्षा की निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि छात्रों के लिए बाधाएं खड़ी करना। यदि सुरक्षा व्यवस्था केवल छात्रों को परेशान करने तक सीमित रह जाए और असली शिक्षा माफिया बेखौफ रहें, तो वह व्यवस्था त्रुटिपूर्ण है। समय की मांग है कि सरकार और NTA नियमों को तकनीकी रूप से सख्त लेकिन मानवीय रूप से लचीला बनाएं, ताकि भविष्य में किसी भी योग्य छात्र का डॉक्टर बनने का सपना प्रशासनिक कठोरता की वेदी पर न चढ़े।

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