Supreme Court की सख्त चेतावनी: Pocso Act का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पॉक्सो एक्ट के तहत झूठे मुकदमे दायर करने पर गहरी चिंता जताई है। कोर्ट का मानना है कि इस तरह के मामले न केवल निर्दोष लोगों को संकट में डालते हैं, बल्कि न्यायिक प्रणाली पर भी बोझ डालते हैं। विज़िटिंग जजों का पैनल इस बात पर विशेष ध्यान दे रहा है कि किस प्रकार से ये झूठे मुकदमे वैवाहिक विवादों में एक हथियार बनते जा रहे हैं।

कोर्ट की ताजा टिप्पणियाँ

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। कोर्ट ने पाया कि विवाह के मामलों में आरोप लगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। विशेष रूप से, पति और उनके परिवार के खिलाफ लगने वाले आरोपों की संख्या चिंताजनक है। कोर्ट ने दस से ज्यादा मामलों को निराधार और मनगढ़ंत मानते हुए खारिज कर दिया।

झूठे मामलों की असलियत

कोर्ट ने कहा कि कई बार ये आरोप सिर्फ आर्थिक लाभ या प्रतिकूल पक्ष को परेशान करने के लिए लगाए जाते हैं। एक विशेष मुकदमे में आरोप लगाया गया था कि पति और उसके देवर ने पत्नी की 14 साल की बेटी के खिलाफ यौन अपराध किया। कोर्ट ने इस तरह के दावों को भ्रामक और निराधार बताया। इस प्रकार के मामलों के बढ़ने से लोगों का विश्वास न्याय प्रणाली पर कमजोर होता है।

पॉक्सो कानून की समझ

पॉक्सो (POCSO) कानून, 2012 का मुख्य उद्देश्य बच्चों को सभी प्रकार के यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है। इसमें ऑनलाइन शोषण, अश्लीलता और गलत इरादों से बच्चों का शोषण शामिल है। कानून की धारा 12 के अंतर्गत बच्चों के प्रति अश्लील बातें करना, अश्लील सामग्री दिखाना तथा बार-बार संपर्क करना अपराध मानते हैं। इसके तहत कठोर सजा का प्रावधान है, जिसमें पहली बार अपराध करने पर कम से कम 5 साल की जेल और जुर्माना तय है।

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट की इस चेतावनी ने एक बार फिर से संकेत दिया है कि कानून का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने लोगों से अपील की है कि वे सच के साथ खड़े रहें और इस प्रकार के दुरुपयोग से बचें। कुछ मामलों में अदालत ने दिखाया है कि कैसे झूठे आरोप लोगों के लिए संकट का कारण बन सकते हैं। इस स्थिति में सुधार की दिशा में अदालत का यह कदम काफी महत्वपूर्ण है।

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