उद्धव गुट में सियासी हलचल, ठाकरे की ‘मातोश्री’ बैठक: डर, दलबदल कानून का खेल और ‘ऑपरेशन टाइगर’ की इनसाइड स्टोरी
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा ने हलचल मचा दी है। इस चर्चा के बीच ऐसा दावा किया जा रहा है कि उद्धव गुट के कुछ नेता और सांसद एकनाथ शिंदे के संपर्क में हैं। इस राजनीतिक गतिविधि से उद्धव ठाकरे ने रविवार को एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। इस बैठक को केवल संगठनात्मक समीक्षा के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी को दूर करने के लिए एक कदम माना जा रहा है।
मातोश्री पर बुलाई गई आपातकालीन बैठक
महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ एक बार फिर गहरे राजनीतिक संकट और सत्ता के शक्ति संतुलन को बदलने वाली रणनीति के रूप में उभरकर सामने आया है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे द्वारा 14 जून को ‘मातोश्री’ पर बुलाई गई आपातकालीन बैठक केवल एक संगठनात्मक समीक्षा नहीं है, बल्कि यह ठाकरे गुट के अस्तित्व और राजनीतिक साख को बचाने की एक बड़ी जद्दोजहद है। महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास गवाह रहा है कि यहाँ सत्ता के समीकरण रातों-रात बदलते हैं, लेकिन वर्तमान में चल रही ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चाओं ने संसदीय राजनीति के भीतर एक नए अध्याय की सुगबुगाहट तेज कर दी है।
‘ऑपरेशन टाइगर’ का स्वरूप और इसकी पृष्ठभूमि
राजनीतिक विश्लेषण के दृष्टिकोण से, ‘ऑपरेशन टाइगर’ दरअसल उद्धव ठाकरे गुट के लोकसभा सांसदों को तोड़कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल करने की एक सोची-समझी रणनीति है। वर्तमान में शिवसेना (UBT) के पास कुल 9 लोकसभा सांसद हैं। राजनीतिक गलियारों और खुफिया सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इनमें से 7 सांसद एकनाथ शिंदे और महायुति के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में हैं। इस पूरे ऑपरेशन की टाइमिंग और कानूनी गणित को समझना बेहद जरूरी है।
दलबदल कानून (Anti-Defection Law) का गणित
यदि 9 में से 7 सांसद एक साथ पाला बदलते हैं, तो यह कुल संख्या का दो-तिहाई (2/3) बहुमत होगा। इस स्थिति में इन सांसदों पर संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्यता की तलवार नहीं लटकेगी और उनकी संसद सदस्यता पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।
दिल्ली में गुप्त बैठक की थ्योरी: खबरों के अनुसार, 7 जून को नई दिल्ली में एक अत्यंत गोपनीय बैठक हुई थी। इस बैठक में उद्धव गुट के कुछ सांसदों की मौजूदगी और महायुति के बड़े नेताओं के साथ उनकी बातचीत की खबरें सामने आईं, जिसके बाद इस ऑपरेशन को अंतिम रूप देने की अटकलें तेज हो गईं।
कैबिनेट और पदों का प्रलोभन: चर्चा है कि पाला बदलने वाले सांसदों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने या राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका देने का आश्वासन दिया जा रहा है।
ठाकरे गुट में बेचैनी के कारण और ‘लॉयल्टी टेस्ट’
शिवसेना में 2022 में हुई ऐतिहासिक बगावत के बाद उद्धव ठाकरे के लिए यह दूसरा सबसे बड़ा झटका हो सकता है। यही कारण है कि ‘मातोश्री’ में बुलाई गई बैठक को राजनीतिक विश्लेषक एक ‘लॉयल्टी टेस्ट’ (वफादारी परीक्षा) के रूप में देख रहे हैं। उद्धव ठाकरे इस बैठक के जरिए यह आंकना चाहते हैं कि उनके कौन से साथी मजबूती से उनके साथ खड़े हैं और किनके पैर डगमगा रहे हैं। मुंबई के दो सांसदों को छोड़कर, मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र के कुछ सांसदों की निष्ठा पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। परभणी के सांसद संजय ‘बंडू’ जाधव, हिंगोली के नागेश पाटील आष्टीकर और नाशिक के राजाभाऊ वाजे जैसे नेताओं की हालिया गतिविधियों और महायुति नेताओं से मुलाकातों ने ठाकरे कैंप की रातों की नींद उड़ा दी है। हालांकि, इन नेताओं ने इन मुलाकातों को हमेशा प्रशासनिक और विकास कार्यों का हिस्सा बताया है, लेकिन राजनीति में ‘धुआं वहीं उठता है जहाँ आग लगी होती है’।
दावों और प्रतिदावों की राजनीति
इस पूरे मामले पर महायुति और महाविकास अघाड़ी (MVA) के बीच तीखी बयानबाजी जारी है। शिवसेना (UBT) के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत ने पार्टी में किसी भी तरह की टूट की खबरों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और यह बैठक आगामी संसद सत्र की रणनीति तय करने के लिए बुलाई गई है। राउत ने इस स्थिति को विरोधियों की “वैचारिक और नैतिक विकृति” करार दिया है।
महायुति का आक्रामक रुख
दूसरी तरफ, शिंदे गुट के नेता और केंद्रीय राज्यमंत्री प्रतापराव जाधव ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि “ऑपरेशन टाइगर अब अंतिम चरण में है और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे जिस दिन सही मुहूर्त तय करेंगे, यह ऑपरेशन पूरा हो जाएगा”। वहीं, गुलाबराव पाटिल जैसे मंत्रियों का कहना है कि उद्धव ठाकरे को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर उनके लोग लगातार उनका साथ क्यों छोड़ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ठाकरे गुट के ही वरिष्ठ नेता अंबादास दानवे ने माना है कि कुछ लोग निश्चित रूप से विपक्ष के संपर्क में हैं, जिसने राउत के दावों की हवा निकाल दी है।
राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति पर इसका प्रभाव
यदि ‘ऑपरेशन टाइगर’ सफल होता है, तो इसके दूरगामी परिणाम केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेंगे-
NDA की स्थिति मजबूत होगी: लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगियों (NDA) की संख्या बल में इजाफा होगा, जिससे केंद्र सरकार की स्थिरता और अधिक मजबूत होगी।
विपक्ष का मनोबल टूटेगा: आम आदमी पार्टी (AAP) और हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर दिखी आंतरिक कलह के बाद, शिवसेना (UBT) में होने वाली यह संभावित टूट राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के हौसलों को पस्त कर देगी।
आगामी स्थानीय निकाय और विधानसभा चुनाव: महाराष्ट्र में जल्द ही स्थानीय निकाय और विधान परिषद (MLC) के चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में सांसदों का पाला बदलना जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ देगा और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर देगा।
महाराष्ट्र राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ के मायने
‘ऑपरेशन टाइगर’ की यह गूंज दर्शाती है कि महाराष्ट्र की राजनीति में वैचारिक निष्ठाओं से ऊपर ‘सत्ता और संरक्षण’ की राजनीति हावी हो चुकी है। एकनाथ शिंदे खुद को बाल ठाकरे के विचारों का असली वारिस साबित करने के लिए उद्धव गुट को पूरी तरह अप्रासंगिक बना देना चाहते हैं। 14 जून की ‘मातोश्री’ की बैठक उद्धव ठाकरे के राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक होने वाली है, जहाँ उन्हें न सिर्फ अपने सांसदों को बचाना है, बल्कि अपनी राजनीतिक साख को भी जिंदा रखना है।
इस संभावित टूट का आगामी विधान सभा चुनावों पर असर
महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) की 17 सीटों के लिए 18 जून को होने वाले चुनावों से ठीक पहले ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सुगबुगाहट ने विपक्षी महाविकास अघाड़ी (MVA) के समीकरणों को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। हालांकि, लोकसभा सांसदों के टूटने का सीधा असर विधान परिषद के गणित पर नहीं पड़ता, लेकिन इसके मनोवैज्ञानिक, रणनीतिक और जमीनी प्रभाव बेहद गंभीर होने वाले हैं।
स्थानीय निकायों में जमीनी स्तर पर बिखराव
इस बार MLC की अधिकांश सीटें स्थानीय स्वशासन निकायों (Local Authorities Constituencies) के जरिए चुनी जा रही हैं।
नेताओं का पलायन: जब लोकसभा स्तर के बड़े नेता या सांसद पार्टी छोड़ते हैं, तो उनके साथ जिला परिषद सदस्य, नगरसेवक और स्थानीय नेता भी पाला बदलते हैं।
वोट बैंक का खिसकना: शिवसेना (UBT) के वोटर (जो स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि हैं) पाला बदलकर महायुति के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान कर सकते हैं, जिससे उद्धव गुट की जीत की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी।
‘क्रॉस वोटिंग’ और अंतरात्मा की आवाज का खतरा
MLC चुनावों में गुप्त मतदान (Secret Ballot) या वरीयता मतों का बड़ा खेल होता है।
विश्वास की कमी: ‘ऑपरेशन टाइगर’ के चलते ठाकरे गुट के भीतर अविश्वास का माहौल बन चुका है। ऐसे में चुनाव के दिन शिवसेना (UBT) या सहयोगी दलों के कुछ स्थानीय प्रतिनिधि महायुति के पक्ष में ‘क्रॉस वोटिंग’ कर सकते हैं।
दलबदल कानून का डर नहीं: स्थानीय निकाय चुनावों में व्हिप (Whip) का उल्लंघन करने पर सांसदों जैसी सख्त और तत्काल अयोग्यता का खतरा कम होता है, जिसका फायदा शिंदे गुट उठा सकता है।
महायुति को ‘वॉकओवर’ का फायदा
असुरक्षा और टूट के डर का असर सीटों के नामांकन पर दिखने भी लगा है-
उम्मीदवारों का पीछे हटना: नाशिक जैसी महत्वपूर्ण सीट पर, जो MVA समझौते के तहत शिवसेना (UBT) को मिली थी, पार्टी के दो बड़े दावेदारों (अनिल कदम और वसंत गीते) ने ऐन वक्त पर चुनाव लड़ने से पैर पीछे खींच लिए।
बिनविरोध जीत का सिलसिला: विपक्षी खेमे में मची इस खलबली के कारण 17 में से 6 सीटों पर महायुति के उम्मीदवार पहले ही बिनविरोध (Unopposed) चुने जा चुके हैं (जैसे रत्नागिरी में शिवसेना UBT के बाल माने के हटने से NCP के अनिकेत तटकरे की जीत तय हुई)। अब केवल 11 सीटों पर मुकाबला बचा है।
MVA गठबंधन के भीतर अविश्वास और सीट शेयरिंग पर असर
शिवसेना (UBT) में मची इस बेचैनी का असर उसके सहयोगियों (कांग्रेस और शरद पवार की NCP) के साथ रिश्तों पर भी पड़ रहा है-
सहयोगियों की चिंता: कांग्रेस और NCP-SP को डर है कि यदि वे शिवसेना (UBT) के उम्मीदवारों को जिताने के लिए अपने वोट ट्रांसफर करते हैं, और बाद में वह धड़ा ही टूट जाता है, तो उनके वोट बेकार चले जाएंगे।
रणनीतिक बदलाव: इस डर के कारण शरद पवार गुट (NCP-SP) और कांग्रेस अपने खुद के उम्मीदवारों को सुरक्षित करने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिससे MVA के भीतर आपसी समन्वय (Coordination) कमजोर हुआ है।
मनोवैज्ञानिक दबाव और कार्यकर्ताओं का मनोबल
उद्धव ठाकरे को अपनी पूरी ताकत और समय MLC चुनाव की रणनीति बनाने के बजाय अपने लोकसभा सांसदों को एकजुट रखने और ‘मातोश्री’ की बैठकें आयोजित करने में लगाना पड़ रहा है। चुनाव से ठीक पहले शीर्ष स्तर पर टूट की खबरों से जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है, जिसका सीधा असर पोलिंग के दिन वोटिंग मैनेजमेंट पर पड़ता है।
सत्ता की दौड़ में सभी दल सक्रिय
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेताओं की शिंदे खेमे से बातचीत के मुद्दे ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में हुए बदलावों के बाद से उद्धव ठाकरे की पार्टी को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद, लोकसभा चुनाव में प्राप्त बेहतर परिणाम ने उद्धव गुट को थोड़ी नई ऊर्जा दी है। ऐसी स्थिति में अगर सांसदों के असंतोष की खबरें सही होती हैं, तो नेतृत्व की परीक्षा नई दिशा में जा सकती है।
निकटवर्ती चुनावों की तैयारी
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। आगामी स्थानीय निकाय चुनाव और मुंबई महानगरपालिका चुनाव के मद्देनज़र सभी दल अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। किसी प्रभावशाली नेता का पाला बदलने का मतलब केवल संख्या नहीं, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी दे सकता है।
शिंदे खेमे की सक्रियता की आहट
एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना पहले ही मूल शिवसेना के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ चुकी है। ऐसे में यदि उद्धव गुट के और नेता शिंदे की तरफ बढ़ते हैं, तो इससे शिंदे की राजनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है। हालांकि, शिंदे ने पहले भी ऐसे दावों का खंडन किया है, लेकिन समय-समय पर सामने आने वाले चर्चा ने अटकलों को जिंदा रखा है।
उद्धव ठाकरे के सामने अस्तित्व की चुनौती
‘ऑपरेशन टाइगर’ की टाइमिंग ऐसी रखी गई है कि यह सीधे तौर पर 18 जून को होने वाले 11 सीटों के मतदान को प्रभावित करे। यदि उद्धव ठाकरे 14 जून की बैठक में अपने कुनबे को पूरी तरह सुरक्षित दिखाने में नाकाम रहते हैं, तो MLC चुनावों के परिणाम महायुति के पक्ष में एकतरफा (Clean Sweep) हो सकते हैं, जो आगे चलकर आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के लिए महायुति के लिए एक बड़ा बूस्टर साबित होगा।
राजनीतिक उठापटक का दौर जारी
महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ‘ऑपरेशन टाइगर’ महज एक राजनीतिक चर्चा है या इसके पीछे वास्तविक गतिविधियों का कोई आधार है। उद्धव ठाकरे की बैठक के बाद सामने आने वाले संकेत और अगले कुछ दिनों की गतिविधियों से इस सवाल का जवाब शायद साफ हो सकेगा। यह निश्चित है कि महाराष्ट्र की राजनीति में उठापटक का यह दौर अभी थमने वाला नहीं है।
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