कचरे से कमाई और संसाधन तक: भारत में कपड़ा अपशिष्ट को मिल रही नई जिंदगी

The CSR Journal Magazine

हर साल निकलता है 70.73 लाख टन कपड़ा कचरा, पुनर्चक्रण से बन सकता है बड़ा आर्थिक और पर्यावरणीय अवसर

कपड़े हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं, लेकिन पुराने कपड़ों, कटिंग से निकलने वाले कपड़े के टुकड़ों और उत्पादन के दौरान बची सामग्री का क्या होता है? यही सवाल अब भारत की कपड़ा अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया है। देश में हर वर्ष लगभग 70.73 लाख टन कपड़ा अपशिष्ट उत्पन्न होता है। कपड़ा मंत्रालय की ओर से जारी ‘मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, इसमें करीब 42 प्रतिशत कचरा उत्पादन प्रक्रिया से पहले यानी प्री-कंज्यूमर स्रोतों से और 58 प्रतिशत इस्तेमाल के बाद यानी पोस्ट-कंज्यूमर स्रोतों से आता है। यह आंकड़ा केवल कचरे की मात्रा नहीं बताता, बल्कि एक बड़े आर्थिक अवसर की ओर भी संकेत करता है। यदि पुराने कपड़ों, कपड़ा कटिंग, धागे और अन्य अपशिष्ट को सही तरीके से अलग कर पुनर्चक्रित किया जाए तो इन्हें दोबारा उपयोगी रेशों, धागों, कपड़ों, घरेलू उत्पादों और तकनीकी वस्त्रों में बदला जा सकता है। यानी जिसे आज कचरा समझकर फेंक दिया जाता है, वही कल उद्योग के लिए कच्चा माल बन सकता है।

70 फ़ीसदी हो रही Upcycling

कपड़ा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में उत्पन्न कुल कपड़ा अपशिष्ट का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पहले से ही पुनर्प्राप्त होकर पुनर्चक्रण, पुनः उपयोग, अपसाइक्लिंग या डाउनसाइक्लिंग जैसी धाराओं में जा रहा है। विशेष रूप से उत्पादन क्षेत्र में उत्पन्न प्री-कंज्यूमर अपशिष्ट की स्थिति बेहतर है। रिपोर्ट के अनुसार इसका 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पुनर्प्राप्त किया जा रहा है, जबकि कताई क्षेत्र में लगभग पूरा प्रक्रिया-अपशिष्ट उत्पादन प्रणाली में ही दोबारा शामिल कर लिया जाता है।

कपड़ा कचरा आखिर आता कहां से है?

कपड़ा अपशिष्ट को दो हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला है उत्पादन के दौरान निकलने वाला कचरा। कपड़ा कारखानों में कपड़े की कटिंग, धागे, रेशों और अन्य प्रक्रियाओं के दौरान बची सामग्री इसका हिस्सा होती है। चूंकि यह कचरा उसी औद्योगिक तंत्र के भीतर उपलब्ध होता है, इसलिए इसे एकत्र करना और पुनः उपयोग करना अपेक्षाकृत आसान होता है। दूसरा और अधिक चुनौतीपूर्ण हिस्सा है इस्तेमाल के बाद निकलने वाला कपड़ा कचरा। पुराने कपड़े, खराब या अनुपयोगी वस्त्र, फैशन के बदलते चलन के कारण छोड़े गए परिधान और घरेलू कपड़ा सामग्री इस श्रेणी में आती है। रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल कपड़ा अपशिष्ट में पोस्ट-कंज्यूमर हिस्सेदारी करीब 58 प्रतिशत है। यही वह क्षेत्र है जहां अलग-अलग प्रकार के कपड़ों को स्रोत पर अलग करना, संग्रह की व्यवस्था मजबूत करना और पुनर्चक्रण के लिए उपयुक्त तकनीक विकसित करना बेहद जरूरी हो जाता है।

‘रीसाइक्लिंग’ और ‘अपसाइक्लिंग’ में क्या अंतर?

कपड़ा अपशिष्ट के समाधान में दो शब्द तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं- रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग। रीसाइक्लिंग में पुराने या बेकार कपड़े को संसाधित करके उसके रेशों या अन्य उपयोगी सामग्री को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। इससे नए कच्चे माल की आवश्यकता कम हो सकती है। वहीं अपसाइक्लिंग में किसी पुराने या बेकार कपड़े को ऐसी नई वस्तु में बदला जाता है जिसकी उपयोगिता और मूल्य पहले से अधिक हो सकता है। पुराने कपड़ों से बैग, घरेलू सजावटी सामग्री, खिलौने, उपयोगी वस्तुएं या डिजाइनर उत्पाद बनाना इसका उदाहरण है। इसके अलावा रिपेयर यानी मरम्मत और री-यूज यानी पुनः उपयोग भी परिपत्र कपड़ा अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। किसी कपड़े को तुरंत फेंकने के बजाय उसकी मरम्मत करके उसका जीवन बढ़ाना भी कचरा कम करने का प्रभावी तरीका है।

‘टेक-मेक-डिस्पोज’ से ‘टेक-मेक-रीयूज’ की ओर बदलाव

पारंपरिक अर्थव्यवस्था में अक्सर उत्पादन, खरीद, इस्तेमाल और फिर फेंकने का एक सीधा चक्र चलता है। इसे रैखिक अर्थव्यवस्था कहा जा सकता है। लेकिन परिपत्र अर्थव्यवस्था का उद्देश्य इस व्यवस्था को बदलना है, ताकि इस्तेमाल की गई सामग्री अर्थव्यवस्था से बाहर जाने के बजाय दोबारा उत्पादन चक्र में लौट सके। कपड़ा मंत्रालय की पहले की रूपरेखा में भी इस बात पर जोर दिया गया था कि कपड़ा क्षेत्र को ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जिसमें सामग्री को लंबे समय तक अर्थव्यवस्था के भीतर रखा जाए और उसका अधिकतम मूल्य बरकरार रहे। इस दृष्टिकोण में किसी पुराने कपड़े का सफर कूड़ेदान तक पहुंचने के बजाय संग्रह केंद्र, छंटाई इकाई, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और फिर नए उत्पाद तक पहुंच सकता है।

अनौपचारिक क्षेत्र की भूमिका भी बेहद अहम

भारत में कपड़ा पुनर्चक्रण की कहानी केवल बड़े कारखानों तक सीमित नहीं है। कपड़ा संग्रह करने वाले श्रमिक, कबाड़ी, छंटाई करने वाले लोग, छोटे पुनर्चक्रण केंद्र और स्थानीय व्यवसाय इस पूरी श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कपड़ा मंत्रालय की रिपोर्ट में इस अनौपचारिक संग्रह और छंटाई तंत्र की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के पोस्ट-कंज्यूमर कपड़ा अपशिष्ट का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा लैंडफिल से बाहर रखा जा रहा है, जिसमें व्यापक संग्रह और छंटाई नेटवर्क की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए परिपत्र कपड़ा अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का मतलब केवल नई मशीनें लगाना नहीं है। इसमें उन लाखों लोगों को भी बेहतर प्रशिक्षण, सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियां, तकनीकी सहायता और औपचारिक आर्थिक व्यवस्था से जोड़ना शामिल है जो वर्षों से इस क्षेत्र को जमीन पर संचालित कर रहे हैं।

रोजगार के भी खुलेंगे नए रास्ते

कपड़ा अपशिष्ट को आर्थिक संसाधन में बदलने से पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। मंत्रालय के अनुसार भारत का कपड़ा पुनर्चक्रण बाजार 2030 तक 3.5 अरब अमेरिकी डॉलरतक पहुंचने का अनुमान है और इससे लगभग एक लाख हरित रोजगार पैदा होने की संभावना जताई गई है। इन रोजगारों में संग्रह, छंटाई, पुनर्चक्रण, मशीन संचालन, डिजाइन, अनुसंधान, अपसाइक्लिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, आपूर्ति श्रृंखला और नए टिकाऊ उत्पादों का निर्माण शामिल हो सकता है। विशेष रूप से छोटे उद्यमों, महिला स्वयं सहायता समूहों, कारीगरों, डिजाइनरों और युवाओं के लिए यह क्षेत्र नए कारोबार के अवसर पैदा कर सकता है।

तकनीक बदलेगी कपड़ा कचरे की तस्वीर

कपड़ा पुनर्चक्रण में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अलग-अलग प्रकार के रेशों को पहचानने, अलग करने और दोबारा उपयोग करने के लिए आधुनिक मशीनों और प्रसंस्करण तकनीकों की आवश्यकता होती है। यांत्रिक पुनर्चक्रण वर्तमान में प्रमुख रास्तों में से एक है, जबकि रासायनिक पुनर्चक्रण जैसी नई तकनीकों पर भी काम बढ़ रहा है। रासायनिक तकनीकों की मदद से कुछ मिश्रित या जटिल कपड़ा सामग्री से रेशों के स्तर पर उपयोगी सामग्री वापस प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। भविष्य में ऐसी तकनीकें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती हैं जिनसे पुराने कपड़ों को फिर से उच्च गुणवत्ता वाले नए कपड़ा उत्पादों में बदला जा सके। इसे ‘टेक्सटाइल-टू-टेक्सटाइल’ पुनर्चक्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

जुलाई 2026 में ‘Weave The Future 4.0’ ने बढ़ाया फोकस

कपड़ा अपशिष्ट और अपसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए कपड़ा मंत्रालय के विकास आयुक्त (हथकरघा) कार्यालय ने जुलाई 2026 में ‘वीव द फ्यूचर 4.0 – अपसाइक्लिंग एडिशन’ का आयोजन किया। दिल्ली हाट में आयोजित इस पहल में कारीगरों, बुनकरों, डिजाइनरों, पुनर्चक्रणकर्ताओं, नवाचारकर्ताओं, ब्रांडों और अन्य हितधारकों को एक मंच पर लाया गया। इसी पहल के तहत ‘व्हाट इज़ इट मेड ऑफ?’ नाम से राष्ट्रीय कपड़ा अपशिष्ट नवाचार चुनौती भी शुरू की गई। इसका उद्देश्य ऐसे व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समाधान तलाशना है जो कपड़ा कचरे को कम करने, पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और अपसाइक्लिंग को बढ़ावा दें। इसमें विद्यार्थी, कारीगर, बुनकर, डिजाइनर, शोधकर्ता, उद्यमी और आम नागरिक भी भाग ले सकते हैं। यह पहल इस बात का संकेत है कि कपड़ा अपशिष्ट को अब केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार और आर्थिक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।

चुनौती सिर्फ कचरा कम करने की नहीं

हालांकि भारत में कपड़ा अपशिष्ट का एक बड़ा हिस्सा पहले ही पुनर्प्राप्त हो रहा है, फिर भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती इस्तेमाल के बाद निकलने वाले कपड़ों की है। अलग-अलग प्रकार के रेशों, रंगों, मिश्रित कपड़ों और अन्य सामग्रियों को अलग करना कठिन हो सकता है।इसके अलावा उपभोक्ताओं के स्तर पर भी जागरूकता की आवश्यकता है। यदि घरों में पुराने कपड़ों को अन्य गीले और सूखे कचरे के साथ मिला दिया जाए तो उनकी पुनर्प्राप्ति कठिन हो जाती है। इसलिए स्रोत पर ही कपड़ा अपशिष्ट को अलग रखने की व्यवस्था मजबूत करना आवश्यक है। उद्योग के लिए भी चुनौती यह है कि पुनर्चक्रित रेशों की गुणवत्ता, लागत और उपलब्धता को लगातार बेहतर बनाया जाए ताकि वे नए कच्चे माल के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।

उपभोक्ता भी बन सकता है बदलाव का हिस्सा

परिपत्र कपड़ा अर्थव्यवस्था केवल सरकार या उद्योग की जिम्मेदारी नहीं है। इसकी शुरुआत घर से भी हो सकती है। कपड़े खरीदते समय आवश्यकता को प्राथमिकता देना, अच्छी गुणवत्ता वाले कपड़ों को लंबे समय तक इस्तेमाल करना, खराब कपड़ों की मरम्मत कराना, उपयोगी पुराने कपड़ों को जरूरतमंदों तक पहुंचाना और अनुपयोगी वस्त्रों को उचित संग्रह केंद्र तक पहुंचाना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हैं। फैशन की दुनिया में ‘कम खरीदें, बेहतर खरीदें और लंबे समय तक इस्तेमाल करें’ जैसी सोच कपड़ा कचरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

भारत के लिए बड़ा अवसर

भारत के पास विशाल कपड़ा उद्योग, पारंपरिक बुनाई-कौशल, कारीगरों का बड़ा नेटवर्क और पहले से मौजूद पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र है। ऐसे में कपड़ा अपशिष्ट को संसाधन में बदलना भारत के लिए केवल पर्यावरण संरक्षण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास का नया रास्ता भी बन सकता है। यदि कपड़ा उत्पादन केंद्रों के आसपास पुनर्चक्रण ढांचा विकसित किया जाए, संग्रह और छंटाई की व्यवस्था मजबूत की जाए, नई तकनीकों में निवेश बढ़ाया जाए और कारीगरों व छोटे उद्यमों को बाजार से जोड़ा जाए, तो देश एक मजबूत परिपत्र कपड़ा अर्थव्यवस्था विकसित कर सकता है।

कचरे से कमाई तक: हर धागे को मिले दूसरी जिंदगी

70.73 लाख टन कपड़ा अपशिष्ट का आंकड़ा निश्चित रूप से चुनौती है, लेकिन इसी आंकड़े में अवसर भी छिपा है। एक पुरानी साड़ी से नया बैग, कपड़े के टुकड़े से नया उत्पाद, औद्योगिक अपशिष्ट से नया रेशा और बेकार समझे गए कपड़े से नया रोजगार—यही उस बदलाव की तस्वीर है जिसमें कचरा समाप्त नहीं होता, बल्कि उसका मूल्य वापस अर्थव्यवस्था में लौटता है।
भारत की अगली कपड़ा क्रांति केवल अधिक कपड़े बनाने की नहीं, बल्कि कम बर्बादी के साथ अधिक मूल्य पैदा करने की क्रांति हो सकती है। जरूरत है कि सरकार, उद्योग, कारीगर, पुनर्चक्रण क्षेत्र और उपभोक्ता मिलकर इस सोच को आगे बढ़ाएं—कपड़ा फेंकना अंतिम विकल्प हो और हर संभव धागे को दूसरी जिंदगी देने की कोशिश पहला कदम।

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