पासपोर्ट केवल यात्रा दस्तावेज, नागरिकता का प्रमाण नहीं: सरकार के रुख पर शशि थरूर ने उठाए सवाल

The CSR Journal Magazine

शशि थरूर का सरकार पर हमला: पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण माना जाए

जून 2026 में विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा पासपोर्ट सेवा दिवस पर जारी एक बयान के बाद भारत में पासपोर्ट और नागरिकता के प्रमाण को लेकर एक बड़ी राजनीतिक व कानूनी बहस छिड़ गई है। सरकार के इस रुख पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे एक “बेतुका कानूनी विरोधाभास” करार दिया है।

सरकार का बयान: पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केंद्र सरकार के हालिया रुख पर कड़ी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि सरकार का यह कहना कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, एक बेतुका कानूनी विरोधाभास है। थरूर ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि इस फैसले से जनता में भ्रम फैल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि पासपोर्ट को हमेशा सबसे विश्वसनीय सरकारी पहचान दस्तावेज माना गया है। अगर पासपोर्ट से नागरिकता साबित नहीं होती, तो फिर और कौन सा दस्तावेज है जो इसे साबित कर सकेगा।

पार्लियामेंट का मामला: पासपोर्ट और आधार कार्ड की भूमिका

विदेश मंत्रालय द्वारा 24 जून को जारी आदेश में कहा गया कि पासपोर्ट केवल यात्रा दस्तावेज है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि आधार कार्ड केवल पहचान का दस्तावेज है, नागरिकता का नहीं। थरूर ने सुझाव दिया कि सरकार पासपोर्ट और आधार कार्ड को नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानें। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को गैर-भारतीय निवासियों के लिए अलग आधार कार्ड जारी करना चाहिए, ताकि सामान्य आधार कार्ड और वैध भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का माना जा सके।

केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय का पक्ष

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। सरकार ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 का हवाला दिया। यह धारा केंद्र सरकार को असाधारण परिस्थितियों और व्यापक जनहित में गैर-नागरिकों (विदेशी नागरिकों) को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने की शक्ति देती है। इसी कानूनी प्रावधान के कारण पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

नीति में कोई बदलाव नहीं

सरकार के आधिकारिक सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया नियम नहीं है। पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार द्वारा इस संबंध में कोई नीतिगत बदलाव नहीं किया गया है, बल्कि यह 1967 से चली आ रही कानूनी स्थिति है। अधिकारियों ने 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के एक फैसले सहित कई न्यायिक आदेशों का हवाला दिया, जिनमें स्पष्ट कहा गया है कि आधार कार्ड, वोटर आईडी या पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण नहीं हैं।

शशि थरूर की आपत्ति और तर्क

शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए पूछा कि यदि बेहद कड़े पुलिस वेरिफिकेशन और दस्तावेजी जांच के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट भी नागरिकता साबित नहीं कर सकता, तो फिर देश का आम नागरिक अपनी नागरिकता कैसे साबित करेगा? थरूर का मानना है कि मतदाता सूची संशोधन और नागरिकता सत्यापन के इस दौर में सरकार के ऐसे बयानों से जनता के बीच भारी भ्रम और असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है।

शशि थरूर का ‘दोहरी नीति’ वाला समाधान

इस कानूनी विवाद को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए शशि थरूर ने सरकार को कानून में संशोधन करने का सुझाव दिया है। सरकार को पासपोर्ट अधिनियम और नागरिकता नियमों में बदलाव करके पासपोर्ट और आधार कार्ड दोनों को नागरिकता का वैध व निर्णायक प्रमाण मानना चाहिए, बशर्ते उन्हें सरकार द्वारा रद्द न किया गया हो।

गैर-नागरिकों के लिए ‘लाल पट्टी’ वाला आधार

चूंकि वर्तमान में भारत में 182 दिनों से अधिक समय तक रहने वाला कोई भी विदेशी नागरिक आधार कार्ड के लिए पात्र है, इसलिए थरूर ने सुझाव दिया कि UIDAI को भारत में रहने वाले गैर-नागरिकों के लिए एक अलग दिखने वाला आधार कार्ड जारी करना चाहिए (उदाहरण के लिए, जिसके ऊपर एक लाल रंग की तिरछी पट्टी हो)। इस दोहरी नीति से सामान्य आधार कार्ड और पासपोर्ट को सीधे तौर पर नागरिकता का प्रमाण माना जा सकेगा, जिससे आम नागरिकों को सरकारी दफ्तरों और नौकरशाही की मनमानी चुनौतियों से मुक्ति मिलेगी।

प्रशासन में सुधार: नागरिकता के मुद्दे पर स्पष्टता

थरूर का कहना है कि इस कदम से SIR की जगह NRC में होने वाले विवादों में कमी आएगी और प्रशासनिक काम आसान हो जाएगा। इससे नागरिकों को अपनी पहचान और नागरिकता के मामलों में कानूनी स्पष्टता मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को चाहिए कि वह ऐसे दस्तावेजों को नागरिकता के प्रमाण के रूप में मान्यता दे, जब तक कि उन्हें रद्द ना किया जाए।

पासपोर्ट सेवाओं का विस्तार: संख्या में वृद्धि

मंत्रालय ने यह भी बताया कि पिछले एक दशक में पासपोर्ट सेवा केंद्रों की संख्या 77 से बढ़कर 545 हो गई है। 2025 से शुरू हुए चिप आधारित ई-पासपोर्ट की 1.47 करोड़ प्रतियां जारी की जा चुकी हैं। आवेदन निपटाने का औसत समय घटकर 5-6 दिन रह गया है। 2019 में 16 देशों के मुकाबले अब भारतीयों को 27 देश वीजा-फ्री प्रवेश देते हैं।

पासपोर्ट की फीस में बढ़ोतरी: नई दरें लागू

1 जुलाई से पासपोर्ट बनवाना महंगा होगा। केंद्र सरकार ने पासपोर्ट की फीस बढ़ाने का निर्णय लिया है। 36 पेज वाले सामान्य पासपोर्ट की फीस 1,500 रुपए से बढ़कर 2,500 रुपए हो जाएगी, जबकि तत्काल पासपोर्ट की फीस 5,000 रुपए होगी, जो पहले 3,500 रुपए थी। 60 पेज वाले पासपोर्ट की भी फीस बढ़ाई गई है। सामान्य फीस 2,000 से बढ़कर 3,500 रुपए और तत्काल फीस 4,000 से बढ़कर 6,000 रुपए हो जाएगी। यह बढ़ोतरी पासपोर्ट रूल्स, 1980 में संशोधन के बाद की गई है।

सरकार का रुख: पासपोर्ट संदर्भ में क्या कहा गया

विदेश मंत्रालय द्वारा यह भी कहा गया कि भारत कोई ऐसा दस्तावेज जारी नहीं करता है जो सभी नागरिकों के लिए नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जाए। नागरिकता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे कैसे हासिल किया गया और नागरिकता कानून के तहत कौन से रिकॉर्ड मौजूद हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट केवल अंतरराष्ट्रीय यात्रा की सुविधा के लिए जारी किया जाता है।

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