बढ़ती महंगाई, आत्मनिर्भरता और महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर योजनाओं का बदलता स्वरूप

The CSR Journal Magazine

महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर योजनाओं में बढ़ोतरी की क्यों हो रही मांग?

महिलाओं के लिए नकद हस्तांतरण (Cash Transfer) योजनाओं की राशि में बढ़ोतरी की मांग मुख्य रूप से लगातार बढ़ती महंगाई, घरेलू खर्चों में बदलाव, और महिला सशक्तिकरण पर इसके सकारात्मक प्रभाव के कारण की जा रही है । वर्तमान में लगभग 15 से अधिक राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे हैं (जैसे- महाराष्ट्र की लाडकी बहिन योजना, मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना, और ओडिशा की सुभद्रा योजना), जहां लाभार्थियों को प्रतिमाह या सालाना सीधे बैंक खाते में आर्थिक सहायता मिलती है ।

महंगाई पर खुद को कैसे तैयार करे सरकार?

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें महिला कैश ट्रांसफर योजनाओं को अपडेट करने की सिफारिश की गई है। महंगाई लगातार बढ़ रही है और इससे सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाएं हो रही हैं। अगर सरकार हर महीने महिलाओं को एक निश्चित राशि भेज रही है, तो क्या वह रकम स्थायी होगी? परिषद का जवाब है- नहीं। उनका मानना है कि ये योजनाएं समय-समय पर महंगाई के अनुसार बढ़ाई जानी चाहिए। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी, साथ ही योजना का असली लाभ भी लंबे समय तक बना रहेगा।

सरकार की योजनाएं, महिलाओं का सामर्थ्य

EAC-PM की रिपोर्ट में कहा गया है कि मात्र पैसे भेजना ही काफी नहीं है। वास्तविक लाभ के लिए योजनाओं को और प्रभावी बनाना जरूरी है। महाराष्ट्र की ‘माझी लाडकी बहिन योजना‘ और ओडिशा की ‘सुभद्रा योजना’ का विश्लेषण किया गया। ये योजनाएं महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव लाने में सफल रही हैं। अब सवाल यह है कि क्या इससे पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार भी हुआ?

महंगाई की चुनौती

महंगाई के चलते महिलाओं को मिलने वाली राशि की वास्तविक कीमत कम हो जाती है। अगर किसी महिला को आज 1,500 रुपये मिल रहे हैं और पांच साल बाद भी वही राशि मिलती है, तो महंगाई बढ़ने के कारण उस धन की खरीदने की क्षमता प्रभावित होती है। इसलिए, EAC-PM का सुझाव है कि ऐसे फंड की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। तकनीकी उपायों से लाभार्थियों की पहचान को बेहतर बनाया जा सकता है, जिससे अधिक सहायता प्रदान की जा सके। इन योजनाओं की राशि में बढ़ोतरी और निरंतरता की मांग के पीछे कई प्रमुख कारण हैं।

महंगाई और क्रय शक्ति

बढ़ती महंगाई के कारण रोजमर्रा के सामान, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा का खर्च बढ़ गया है। ऐसे में 1000-1500 रुपये की मासिक सहायता राशि पर्याप्त नहीं रह जाती। आर्थिक सलाहकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई के अनुसार इस राशि को बढ़ाकर 2000-2500 रुपये या उससे अधिक किया जाना चाहिए।

आर्थिक आत्मनिर्भरता और बचत

अध्ययनों (जैसे EAC-PM की रिपोर्ट) से यह प्रमाणित हुआ है कि जब महिलाओं के हाथ में सीधे पैसे आते हैं, तो वे इसका उपयोग केवल दैनिक उपभोग में नहीं करतीं, बल्कि अपनी बचत (Savings) भी बढ़ाती हैं। महाराष्ट्र और ओडिशा के अध्ययनों में महिलाओं के बैंक बैलेंस में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

पारिवारिक प्राथमिकताओं में सुधार

महिलाएं इन पैसों का बड़ा हिस्सा अपने परिवार की भलाई के लिए खर्च करती हैं । नकद सहायता से उनके पोषण, बच्चों की शिक्षा (जैसे ATM-आधारित शैक्षिक खर्च), और स्वास्थ्य देखभाल (Medical Expenses) से जुड़े खर्चों में सकारात्मक बदलाव आया है।

निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

जब महिलाओं के अपने बैंक खातों में पैसे आते हैं, तो परिवार में उनकी स्थिति मजबूत होती है और घरेलू वित्तीय मामलों में उनकी निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।

डिजिटल साक्षरता और वित्तीय समावेशन

इन डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं ने महिलाओं को डिजिटल रूप से साक्षर बनाया है और यूपीआई (UPI) के माध्यम से वित्तीय तंत्र में उनकी भागीदारी बढ़ी है। इन कारणों से नकद अंतरण योजनाओं को केवल मुफ्त खैरात न मानकर, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कल्याण के लिए एक प्रभावी निवेश के रूप में देखा जा रहा है

कैसे बदलेंगे हालात?

महिलाओं को आर्थिक सहायता देने वाली योजनाओं की गहराई में जाकर समझने की जरूरत है। अध्ययन में पता चला है कि महाराष्ट्र में लाभार्थियों ने अपने बैंक खातों में बचत में 84% तक की वृद्धि दर्ज की है। ओडिशा की योजना में भी सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं, जहाँ महिलाओं ने प्राप्त राशि का उपयोग केवल घरेलू खर्चों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी किया।

सिर्फ पैसे नहीं, ‘कैश-प्लस’ मॉडल की आवश्यकता

EAC-PM का मानना है कि केवल नकद सहायता देना अब पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ महिलाओं को वित्तीय साक्षरता, कौशल विकास और सरकारी योजनाओं तक पहुंच जैसी सेवाएं भी मिलनी चाहिए। इस मॉडल को ‘कैश-प्लस’ कहा गया है, जिसमें महिलाएं डिजिटल भुगतान का अधिक प्रयोग कर रही हैं। इससे न केवल वे आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं, बल्कि उनके पूरे परिवार की वित्तीय स्थिति भी सुधर रही है।

कितनी महिलाओं को मिल रहा है लाभ?

भारत के 12 राज्यों में लगभग 12 करोड़ महिलाओं को बिना किसी शर्त के नकद सहायता मिल रही है। यह योजना दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में से एक बन चुकी है, हालाँकि इसके प्रभाव पर अध्ययन सीमित हैं। इसलिए इसे एक सामाजिक नीति का प्रयोग माना जा रहा है।

सरकार का खर्च क्या है?

महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए भारत के लगभग 15 राज्यों में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजनाएं चल रही हैं। इन जनहित योजनाओं पर हर साल करीब 2.46 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि इससे उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी खर्चों में मदद मिली है। इन योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

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