संतों का सवाल: ‘सरकार का दखल क्यों? मस्जिद व गुरुद्वारा तो आज़ाद हैं

The CSR Journal Magazine
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्रस्तावित मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्ति को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। संत समिति ने स्पष्ट कहा है कि यदि मस्जिदों का संचालन वक्फ बोर्ड करता है और गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) करती है, तो हिंदू मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप क्यों? राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया है। संत समिति ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह मंदिर प्रशासन में नौकरशाही को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है, जोकि धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है।

संतों की धार्मिक स्वायत्तता की मांग

संत समिति ने सरकार से मांग की है कि चार लाख से अधिक हिंदू मंदिरों पर प्रशासनिक नियंत्रण समाप्त किया जाए। उनका कहना है कि जबकि अन्य धर्मों की संस्थाएं स्वतंत्रता से चल रही हैं, हिंदू मंदिरों के मामलों में ऐसा क्यों नहीं हो रहा? यह धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का प्रश्न है। आगे कहा गया कि प्रशासनिक सुधारों के नाम पर मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लाना उचित नहीं है।

विपरीत स्वार्त और व्यापक विरोध की तैयारी

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि अलग-अलग धर्मों की संस्थाओं के संचालन के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं होनी चाहिए। उन्होंने ये सवाल उठाया कि केवल हिंदू मंदिरों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। अगर सरकार ने अपनी नीतियों को लागू करने की कोशिश की, तो संत समाज इसका विरोध करेगा।

मंदिरों का प्रशासन भक्तों के हाथ में रहना चाहिए

स्वामी जितेंद्रानंद ने विस्तार में कहा कि देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों में पहले से ही विवाद सामने आए हैं, लेकिन इसका समाधान सरकारी नियंत्रण नहीं है। यदि किसी मंदिर में अनियमितता पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरे मंदिर के प्रशासन को सरकारी दायरे में लाना सही नहीं है।

संतों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से की अपील

राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास और अन्य संतों ने एक प्रस्ताव पारित कर मंदिर संचालन में नौकरशाही का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अयोध्या संतों और श्रद्धालुओं की है, इसलिए राम मंदिर का प्रबंधन भी संत परंपरा के अनुसार होना चाहिए। संतों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि ट्रस्ट का पुनर्गठन करें, लेकिन मंदिर को किसी भी तरह के सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा जाए।

11 जुलाई की बैठक के परिणामों की प्रतीक्षा

सूत्रों की मानें तो 11 जुलाई को प्रस्तावित ट्रस्ट की बैठक में महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय और ट्रस्ट के पुनर्गठन पर चर्चा होगी। इसी कारण संत समाज ने अपने विचार और आपत्तियां पहले से ही सार्वजनिक कर दी हैं। यह बैठक विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

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