बिना सर्जरी 3 दिन का बिल 1.70 लाख: BLK-Max Hospital की बिलिंग प्रणाली पर उठे सवाल

The CSR Journal Magazine

दिल्ली के युवक ने बिना सर्जरी 1.70 लाख का अस्पताल बिल देख किया उठाया सवाल

बिना किसी सर्जरी के सिर्फ 3 दिन के इलाज का 1.70 लाख रुपये का भारी-भरकम बिल थमाए जाने के बाद दिल्ली के एक युवक ने निजी अस्पतालों की मनमानी और बिलिंग प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुई इस घटना ने निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में पारदर्शिता को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।

मुख्य घटनाक्रम और विवाद की वजह

यह मामला नई दिल्ली के करोल बाग स्थित बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल (BLK-Max Hospital) से जुड़ा है। दिल्ली के निवासी अभिषेक भटनागर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपने भाई के इलाज का पूरा विवरण और अस्पताल का अंतिम बिल साझा किया। मरीज को 11 अगस्त 2026 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 13 अगस्त 2026 को छुट्टी (डिस्चार्ज) दी गई। मात्र तीन दिनों के सामान्य इन-पेशेंट स्टे के लिए अस्पताल ने 1,70,809 रुपये का अंतिम बिल थमाया।

मरीज के परिवार का आरोप: “बीमा कंपनियों को फंसाने के लिए बनता है भारी बिल”

अभिषेक भटनागर द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर साझा की गई जानकारी के अनुसार, उनके भाई की अस्पताल में रहने के दौरान कोई सर्जरी या क्रिटिकल प्रोसीजर नहीं की गई थी। इलाज के नाम पर केवल बुनियादी नियमित जांच (इन्वेस्टिगेशन) और दवाएं दी गईं। अभिषेक ने सीधे तौर पर अस्पताल पर आरोप लगाते हुए कहा, “अस्पताल प्रबंधन ने जानबूझकर अत्यधिक शुल्क लगाए और बीमा (इंश्योरेंस) की मंजूरी हासिल करने के लिए बिल को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर पेश किया।” उन्होंने इसे आम जनता के साथ दिनदहाड़े होने वाली धोखाधड़ी बताते हुए न्याय की गुहार लगाई है और मामले को उच्च अधिकारियों तक ईमेल के माध्यम से भी पहुंचाया है।

बिलिंग के किन हिस्सों पर उठे सवाल?

मरीज के भाई ने अस्पताल द्वारा लगाए गए कई “अनावश्यक और अत्यधिक” शुल्कों को सार्वजनिक करते हुए पूछा कि जब कोई सर्जरी ही नहीं हुई, तो दवाइयों, रूम रेंट और जांच के नाम पर इतनी बड़ी रकम कैसे वसूली जा सकती है? सोशल मीडिया पर यूजर्स ने इस बिलिंग को “दिनदहाड़े डकैती” करार दिया है और सरकार से निजी अस्पतालों के शुल्कों पर एक ऊपरी सीमा (प्राइस कैप) तय करने की मांग की है।

अस्पताल प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष

विवाद के सोशल मीडिया पर तूल पकड़ने और चौतरफा आलोचनाओं के बाद बीएलके-मैक्स अस्पताल प्रबंधन ने इस मामले पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। अस्पताल के प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा है कि वे मरीज के परिवार द्वारा उठाए गए मुद्दों से पूरी तरह अवगत हैं और बिलिंग के प्रत्येक घटक (Component) की गहनता से आंतरिक जांच कर रहे हैं। प्रबंधन के अनुसार, अस्पताल में Clinical Protocols और Standard Tariff Structure का कड़ाई से पालन किया जाता है। किसी भी मरीज से दवाओं या जांच के लिए निर्धारित गाइडलाइंस से बाहर जाकर पैसे नहीं लिए जाते। अस्पताल ने पूर्व के कुछ मामलों का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि कई बार अनजाने में क्लैरिकल या बिलिंग त्रुटियां  हो जाती हैं, जिन्हें शिकायत मिलने पर तुरंत सुधार दिया जाता है। प्रबंधन ने मरीज के परिवार से सीधे संवाद स्थापित करने और मामले को आपसी संतुष्टि के साथ सुलझाने की बात कही है।

क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?

उपभोक्ता मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत में निजी अस्पतालों द्वारा इंश्योरेंस अप्रूवल के नाम पर बिल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की शिकायतें आम होती जा रही हैं। यदि अस्पताल प्रबंधन और पीड़ित परिवार के बीच सहमति नहीं बनती है, तो पीड़ित पक्ष राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) या राज्य चिकित्सा परिषद में शिकायत दर्ज करा सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि बीमा कंपनी को भी बिलिंग में विसंगति दिखाई देती है, तो वह भी अस्पताल के खिलाफ ‘थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर’ (TPA) के माध्यम से ऑडिट शुरू कर सकती है।

कानूनी और नीतिगत पहलू पर बढ़ती बहस

यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली के किसी नामी निजी अस्पताल पर इस तरह के मनमाने बिलिंग के आरोप लगे हैं। हाल ही में संसद और दिल्ली उच्च न्यायालय में भी निजी अस्पतालों के “रेवेन्यू मॉडल” को लेकर चिंता जताई जा चुकी है। राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने भी पूर्व में यह मांग उठाई थी कि मरीजों को “रेवेन्यू मॉडल” न समझा जाए और सभी राज्यों में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट (Clinical Establishments Act) को अनिवार्य रूप से लागू करके एक पारदर्शी बिलिंग प्रणाली बनाई जाए।

उपभोक्ता कोर्ट में आवाज उठाएं

दिल्ली सरकार की नीतियों के अनुसार, रियायती दरों पर सरकारी जमीन पाने वाले बड़े निजी अस्पतालों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए निःशुल्क इलाज का प्रावधान करना होता है, लेकिन मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए इस तरह के अचानक आने वाले भारी-भरकम मेडिकल बिल आज भी एक बड़ा आर्थिक संकट बने हुए हैं। उपभोक्ता फोरम के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मरीजों को लगता है कि उनसे किसी सेवा या दवा के लिए बाजार मूल्य से बहुत अधिक पैसे लिए गए हैं, तो वे चिकित्सा लापरवाही या अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ उपभोक्ता न्यायालय का रुख कर सकते हैं।

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