पहलगाम हमला: एक साल बाद भी जिंदा है खौफ… बैसरन घाटी की गोलियों की गूंज से उबर नहीं पाए पीड़ित परिवार
जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियों में बसा पहलगाम आज भी उस काली दोपहर की चीखों से सिहर उठता है, जब 22 अप्रैल 2025 को बैसरन घाटी में आतंकवादियों ने निर्दोष पर्यटकों के खून से धरती को लाल कर दिया था। आज इस कायराना हमले को पूरा एक साल बीत चुका है, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए समय जैसे उसी पल ठहर गया है। उस दिन के दर्दनाक दृश्य आज भी प्रभावित परिवारों के मन में ताजा हैं। यह हमला केवल एक घटना नहीं, बल्कि कई जिंदगियों का मंजर बदल देने वाला एक दिल दहला देने वाला किस्सा है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उस दिन की यादें उनके दिलों में जख्मों की तरह गड़ी हुई हैं।
यादों का अंतहीन सिलसिला
पहलगाम हमले के एक साल बाद भी पीड़ित परिवारों के घरों में सन्नाटा पसरा है। कानपुर के शुभम द्विवेदी हों या हरियाणा के विनय नरवाल, इनके परिवारों के लिए हर गुजरता दिन उस भयानक मंजर की याद दिलाता है। परिजनों का कहना है कि सरकार ने मदद के वादे तो किए, लेकिन अपनों को खोने का जो शून्य पैदा हुआ है, उसे कोई भी मुआवजा नहीं भर सकता। कई विधवाएं आज भी सम्मानजनक रोजगार और बच्चों के भविष्य को लेकर संघर्ष कर रही हैं।
सुखद यात्रा का बुरा अंत
आत्मीयता और सुंदरता के ऐतिहासिक पर्यटन स्थल पहलगाम का नाम सुनते ही लोगों की रूह कांप उठती है। पर्यटक जब वहां जाने के लिए तैयार होते हैं तो उन्हें सुकून और खुशनुमा पल बिताने की उम्मीद होती है। लेकिन 22 अप्रैल 2022 को हुए हमले ने कई परिवारों को तोड़कर रख दिया। उस दिन जो पर्यटक वहां मौजूद थे, उनकी यात्रा खुशी के पल्स से दुख की तस्वीरों में बदल गई।
चंद्रमौली की दर्दभरी दास्तान
68 वर्षीय चंद्रमौली, जो विशाखापत्तनम के एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी हैं, ने अपनी पत्नी नागमणी के साथ उस खूबसूरत जगह की यात्रा की थी। यात्रा का हर पल उनके लिए यादगार था, लेकिन एक पल ने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। जब फायरिंग शुरू हुई, तो चंद्रमौली ने अपनी पत्नी से अलग होकर जान बचाने की कोशिश की। उनकी गुहार और दरख्वास्तें भी आतंकवादियों के दिल को नहीं पसीजा पाईं।
आत्मा पर लगा घाव
इस भयानक घटना के चश्मदीद गवाह बने उनके साथी और पत्नी आज भी उस दिन को याद कर कांप उठते हैं। चंद्रमौली का पार्थिव शरीर अगले दिन विशाखापत्तनम पहुंचा। दोस्तों और परिवारोंमें शोक की लहर दौड़ गई। हमले का असर केवल मारे गए लोगों के परिवारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे जुड़े हर व्यक्ति की ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ा।
सरकार की कार्रवाई, लेकिन दिल का दर्द कम नहीं
हमले के बाद भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। लेकिन इन सरकारी कार्रवाईयों से प्रभावित परिवारों के जख्म कम नहीं हुए। एक साल बीत जाने के बाद भी, ये परिवार मानसिक आघात और पीड़ा से जूझ रहे हैं। इस हमले ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में सामान्य स्थिति के दावों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। हमले के जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘ऑपरेशन महादेव’ जैसे कड़े सैन्य कदम उठाए, जिसमें सुरक्षा बलों ने हमले के मास्टरमाइंड और अन्य आतंकियों को मार गिराने का दावा किया। हालांकि, रणनीतिक मोर्चे पर सिंधु जल संधि के निलंबन जैसे कड़े फैसलों ने दोनों देशों के बीच तनाव को चरम पर पहुँचा दिया था।
पर्यटन और घाटी का वर्तमान
आज पहलगाम की बैसरन घाटी में लिद्दर नदी के किनारे एक काला संगमरमर का स्मारक उन 26 निर्दोष जिंदगियों की याद दिलाता है। हालांकि घाटी में पर्यटकों की चहल-पहल फिर से शुरू हो गई है, लेकिन सुरक्षा का घेरा अब पहले से कहीं अधिक सख्त है। स्थानीय लोग और पर्यटक इस बात से सहमत हैं कि डर के साये में जीना आतंकवादियों की जीत होगी, इसलिए वे घाटी के आतिथ्य और सौंदर्य पर भरोसा जताते हुए वापस लौट रहे हैं।
भविष्य पर चिंता
आतंकवाद के चलते निर्दोष लोगों का शिकार होना जारी है। कई लोग अब भी पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस के शिकार हैं। अचानक तेज आवाज सुनते ही घबरा जाना, उस खौफनाक दिन के दृश्य बार-बार याद आना उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है। बैसरन घाटी, जो कभी सुकून का प्रतीक थी, अब डर और दर्द की याद बन चुकी है। यह हमला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि कब तक निर्दोष लोग आतंक का शिकार बनते रहेंगे।
केवल श्रद्धांजलि ही काफी नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बरसी पर मृतकों को याद करते हुए स्पष्ट किया कि भारत आतंकवाद के आगे कभी नहीं झुकेगा। लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर हमारी जिम्मेदारी केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असली न्याय तभी होगा जब पीड़ित परिवारों का पुनर्वास हो और वादे के अनुसार नौकरी और वित्तीय सहायता समय पर मिले। भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए खुफिया तंत्र को और अधिक मजबूत बनाया जाए। सीमा पार से पनप रहे आतंक के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त किया जाए। पहलगाम के पीड़ितों का दर्द हमें याद दिलाता है कि शांति की कीमत बहुत भारी होती है और इस शांति को बनाए रखने के लिए अटूट संकल्प की आवश्यकता है।
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