बेटियों ने निभाया बेटों का हर फर्ज पिता को दी मुखाग्नि, कराया मुंडन और पिंडदान, हनुमानगढ़ की घटना बनी मिसाल

The CSR Journal Magazine
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के रावतसर क्षेत्र में एक परिवार ने समाज के सामने नई मिसाल पेश की है। पटवारी सतपाल बिस्सू के निधन के बाद उनकी तीनों बेटियों ने बेटे की तरह सभी अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं। बड़ी बेटी ने पिता को मुखाग्नि दी, जबकि दूसरी बेटी ने हरिद्वार में मुंडन और पिंडदान की रस्म पूरी की। बेटियों के इस साहसिक और संवेदनशील कदम की पूरे क्षेत्र में सराहना हो रही है।

पिता के अंतिम संस्कार में बेटियां बनीं सबसे बड़ा सहारा

रावतसर तहसील में कार्यरत पटवारी सतपाल बिस्सू के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। परिवार में कोई पुत्र नहीं था, लेकिन उनकी तीनों बेटियों ने हिम्मत नहीं हारी। पिता के अंतिम संस्कार के समय बड़ी बेटी सनाया बिस्सू आगे आई और उन्होंने मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई की परंपरा निभाई। इस दौरान परिवार और समाज के लोगों ने भी बेटियों के निर्णय का समर्थन किया। यह दृश्य कई लोगों के लिए भावुक और प्रेरणादायक रहा।

मुंडन और पिंडदान कर निभाया धार्मिक कर्तव्य

सिर्फ मुखाग्नि तक ही नहीं, बेटियों ने अंतिम संस्कार से जुड़ी अन्य धार्मिक रस्मों को भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया। दूसरी बेटी समारा बिस्सू हरिद्वार पहुंचीं और वहां पर मुंडन संस्कार कराया। इसके साथ ही उन्होंने पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को भी संपन्न किया। आमतौर पर ये रस्में बेटों द्वारा निभाई जाती हैं, लेकिन बेटियों ने यह साबित कर दिया कि कर्तव्य निभाने के लिए लिंग नहीं, बल्कि भावनाएं और जिम्मेदारी मायने रखती हैं।

पिता के लिए पहले भी कर चुकी हैं बड़ा त्याग

बड़ी बेटी सनाया बिस्सू का अपने पिता के प्रति समर्पण पहले भी देखने को मिल चुका है। जब सतपाल बिस्सू गंभीर रूप से बीमार थे, तब उनकी जान बचाने के लिए सनाया ने अपना लीवर दान किया था। हालांकि तमाम प्रयासों के बावजूद पिता को बचाया नहीं जा सका, लेकिन बेटी के इस त्याग ने पिता-पुत्री के रिश्ते की गहराई को उजागर किया। अब पिता के निधन के बाद अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाकर उन्होंने एक बार फिर अपने कर्तव्य और प्रेम का परिचय दिया है।

समाज में बदलती सोच का प्रतीक बनीं बेटियां

सतपाल बिस्सू की बेटियों का यह कदम पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इसे नारी सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बताया है। लोगों का कहना है कि आज की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियां निभाने में सक्षम हैं और सामाजिक रूढ़ियों को पीछे छोड़ रही हैं। यह घटना न केवल परिवार के साहस को दर्शाती है, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति बदलती सकारात्मक सोच का भी प्रतीक बनकर सामने आई है। बेटियों ने साबित कर दिया कि वे केवल परिवार की शान ही नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में उसका मजबूत आधार भी बन सकती हैं।

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