क्या एक देश, एक चुनाव बनेगा आर्थिक और GDP समृद्धि का नया महामार्ग?

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क्या ‘एक देश, एक चुनाव’ से बदलेगी भारत की तस्वीर? जानें इससे कितनी बढ़ेगी देश की GDP

भारत में ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं। हाल ही में गोवा में एक महत्वपूर्ण मीटिंग हुई, जिसमें योजना के लागू होने से लेकर संभावित आर्थिक लाभों पर चर्चा की गई। इस मीटिंग में सांसद पी.पी. चौधरी सहित कई सदस्य शामिल हुए। इस प्रस्ताव से जुड़कर सरकार की कोशिश 2029 तक इसे लागू करने की है। लेकिन, अगर राजनीतिक सहमति बनती है, तो यह योजना पहले भी लागू हो सकती है।

चुनौतियाँ और सुझाव

मीटिंग के दौरान, एक साथ चुनाव कराने में आएगी चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा हुई। सांसद चौधरी ने कहा कि समिति इस समय इस मुद्दे पर नागरिक संगठनों और विशेषज्ञों से सुझाव जुटा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि जो समस्याएँ आती हैं, उनके समाधान के लिए राज्य सरकारों से भी सुझाव मांगे जा रहे हैं। इस प्रस्ताव का समर्थन 99 प्रतिशत नागरिक संगठनों ने किया है।

GDP में 1.5% से 1.6% तक की सीधी बढ़ोतरी

एक देश, एक चुनाव (ONOE) के लागू होने से भारत की जीडीपी विकास दर में लगभग 1.5% से 1.6% तक की सीधी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को करीब 7 लाख करोड़ रुपये का बड़ा वित्तीय लाभ मिलेगा। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक महा-उत्सव हैं। लेकिन इस महा-उत्सव की एक भारी आर्थिक कीमत भी है। देश में साल के बारह महीने किसी न किसी राज्य में विधानसभा, स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव चलते रहते हैं। इस निरंतर ‘चुनावी मोड’ (Constant Election Mode) के कारण देश की विकास पहिया अक्सर ठहर जाता है।

एक बड़ा  मैक्रोइकॉनॉमिक सुधार

इस पृष्ठभूमि में, केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़ाए जा रहे ‘एक देश, एक चुनाव’ (सिमलटेनियस इलेक्शंस) के प्रस्ताव को केवल एक राजनीतिक या प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े मैक्रोइकॉनॉमिक सुधार (Macroeconomic Reform) के रूप में देखा जा रहा है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति और वर्तमान संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्टों व आर्थिक विशेषज्ञों के आकलनों ने इसके आर्थिक फायदों की जो तस्वीर पेश की है, वह बेहद चौंकाने वाली और सकारात्मक है।

चुनावी खर्च का विशाल जाल और भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति

स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर (1952 से 1967 तक) में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे। लेकिन बाद के दशकों में सरकारों के समय से पहले गिरने और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह चक्र पूरी तरह टूट गया। आज स्थिति यह है कि भारत हर समय चुनावी मोड में रहता है।

चुनावी खर्च के आंकड़े

चुनावों पर होने वाला खर्च लगातार आसमान छू रहा है। वर्ष 1951-52 के पहले आम चुनाव में कुल सरकारी खर्च महज 10.5 करोड़ रुपये था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में यह सरकारी और अन्य अनुमानित खर्च बढ़कर 50,000 करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया। विभिन्न निजी थिंक-टैंक और सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 के आम चुनावों में राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और सरकारी मशीनरी का कुल मिलाकर वास्तविक खर्च 1.35 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। यदि इसमें हर साल होने वाले 4 से 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों, नगर पालिकाओं और पंचायतों के खर्चों को भी जोड़ दिया जाए, तो यह राशि देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा खा जाती है।

जीडीपी में 1.6% की वृद्धि: कैसे बदलेगा गणित?

संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पी. पी. चौधरी और प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य संजीव सान्याल सहित कई शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने जेपीसी के समक्ष स्पष्ट किया है कि यदि देश में लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ (100 दिनों के भीतर) करा लिए जाएं, तो इससे देश की वास्तविक जीडीपी (Real GDP) में सीधे 1.5% से 1.6% की वार्षिक वृद्धि देखी जा सकती है। इसे यदि हम वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार (लगभग 3.9 से 4 ट्रिलियन डॉलर) के संदर्भ में समझें, तो यह हर साल 4.5 लाख करोड़ से 7 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त आर्थिक ताकत पैदा करने जैसा है। यह वृद्धि निम्नलिखित मुख्य आर्थिक चैनलों के माध्यम से संभव होगी।

एक देश, एक चुनाव’ का इकोनॉमी मॉडल

बार-बार चुनाव बंद ➔ आचार संहिता से मुक्ति ➔ नीतिगत निरंतरता ➔ निजी निवेश में 5% बढ़ोतरी ➔ इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च ➔ GDP में 1.6% का उछाल

नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) का खात्मा

जब भी किसी राज्य में चुनाव की घोषणा होती है, वहां आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct – MCC) लागू हो जाती है। इसके कारण सरकारें न तो किसी नई कल्याणकारी योजना की घोषणा कर सकती हैं, न ही बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के टेंडर जारी कर सकती हैं। बार-बार आचार संहिता लगने से नीतिगत निर्णय अधर में लटके रहते हैं। एक साथ चुनाव होने से पांच साल में केवल एक बार आचार संहिता लगेगी, जिससे प्रशासनिक और विकास कार्य बिना किसी बाधा के लगातार चलते रहेंगे।

निजी निवेश और पूंजीगत व्यय में उछाल

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बार-बार होने वाले चुनावों और राजनीतिक अनिश्चितता के कारण निजी क्षेत्र अपने निवेश प्रस्तावों को टाल देता है। अध्ययनों से पता चलता है कि चुनावी वर्षों में देश के निजी निवेश (Private Investment) में लगभग 5% की गिरावट आती है। ‘एक देश, एक चुनाव’ से नीतिगत स्थिरता आएगी, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और निवेश-टू-जीडीपी अनुपात (Investment-to-GDP ratio) में 0.5% की बढ़ोतरी होगी। इसके अतिरिक्त, सरकारों का राजस्व खर्च (Revenue Expenditure) कम होगा और वे पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) यानी सड़कों, रेलवे, पोर्ट्स और उद्योगों पर अधिक पैसा खर्च कर सकेंगी।

मानव संसाधन का सही उपयोग

बार-बार होने वाले चुनावों में लाखों सरकारी शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और केंद्रीय सुरक्षा बलों को अपनी मूल ड्यूटी छोड़कर चुनाव ड्यूटी में तैनात होना पड़ता है। जेपीसी की बैठकों में विशेषज्ञों ने बताया कि इससे न केवल सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि आम नागरिकों को मिलने वाली प्रशासनिक सेवाएं भी ठप हो जाती हैं। जब चुनाव पांच साल में एक बार होंगे, तो यह जनशक्ति (Manpower) देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में अपना पूरा योगदान दे पाएगी।

महंगाई और काले धन पर लगाम

स्थानीय और राज्य स्तर के चुनावों में बड़े पैमाने पर नकदी (Cash) का प्रवाह होता है, जो अक्सर अनअकाउंटेड या ‘काले धन’ के रूप में बाजार में घूमता है। यह अचानक आया कैश फ्लो अल्पावधि के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई को बढ़ावा देता है। कोविंद समिति की रिपोर्ट के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने से मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता आएगी और चुनाव पूर्व अवधियों में महंगाई दर में करीब 1% तक की कमी देखी जा सकती है।

कार्यान्वयन की चुनौतियां और राह में खड़े रोड़े

यद्यपि ‘एक देश, एक चुनाव’ के आर्थिक लाभ बेहद लुभावने हैं, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इसे धरातल पर उतारना कोई आसान काम नहीं है। वर्तमान में संसद की संयुक्त समिति (JPC) इसके कानूनी, संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं को सुलझाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों (जैसे गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र) का दौरा कर हितधारकों से राय ले रही है। इसके क्रियान्वयन में मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन चुनौतियां सामने आ रही हैं।

संवैधानिक संशोधन की जटिलता

‘एक देश, एक चुनाव’ को लागू करने के लिए संविधान के कई अनुच्छेदों (जैसे अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356) में संशोधन करना होगा। चूँकि ये संविधान संशोधन विधेयक हैं, इसलिए सरकार को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से भी इसे मंजूरी दिलानी होगी, जो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ी चुनौती है।

विशाल बुनियादी ढांचा और EVM की जरूरत

चुनाव आयोग के अनुमानों के मुताबिक, यदि वर्ष 2029 तक पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने हैं, तो इसके लिए बड़े पैमाने पर नए बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी। लगभग 26 लाख अतिरिक्त बैलेट यूनिट, 17 लाख कंट्रोल यूनिट और इतनी ही वीवीपैट (VVPAT) मशीनों की जरूरत होगी। इन मशीनों को सुरक्षित रखने के लिए देश भर में कम से कम 800 नए आधुनिक वेयरहाउस (गोदाम) बनाने होंगे। शुरुआती स्तर पर चुनाव आयोग को इन उपकरणों की खरीद के लिए करीब 8,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त बजट की दरकार होगी। साथ ही, देशव्यापी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती में 50% तक की बढ़ोतरी करनी होगी, जिसके लिए लगभग 7 लाख जवानों की जरूरत पड़ सकती है।

संघीय ढांचे और क्षेत्रीय दलों की चिंताएं

विपक्षी दलों और कई क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने से देश का संघीय ढांचा (Federal Structure) कमजोर हो सकता है। उनका डर है कि राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में राज्यों के स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे दब जाएंगे, जिससे मतदाताओं के निर्णय पर असर पड़ सकता है और राष्ट्रीय दलों को एकतरफा फायदा मिल सकता है।

विकसित भारत @2047 का प्रवेश द्वार

भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी हुई है। देश ने वर्ष 2047 तक एक ‘विकसित राष्ट्र’ (Viksit Bharat) बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को अपनी जीडीपी विकास दर को लगातार उच्च स्तर पर बनाए रखना होगा।

अंतहीन चुनावी चक्र

अंतहीन चुनावी चक्र और हर कुछ महीनों में शासन व्यवस्था का ठप हो जाना एक विकासशील देश के लिए अब और अधिक वहन करने योग्य नहीं है। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर यदि ‘एक देश, एक चुनाव’ पर एक व्यापक राष्ट्रीय सहमति (National Consensus) बनती है, तो यह न केवल देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुव्यवस्थित करेगा, बल्कि जीडीपी में 1.6% की अतिरिक्त ग्रोथ देकर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है।

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