हर साल ₹14 लाख करोड़ की ‘जंग’! कैसे Corrosion भारत की अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और विकास को पहुंचा रहा है भारी नुकसान
भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा नुकसान केवल प्राकृतिक आपदाओं, महंगाई या वैश्विक आर्थिक संकट से ही नहीं होता, बल्कि एक ऐसी समस्या भी है जो धीरे-धीरे देश के बुनियादी ढांचे को अंदर से खोखला कर रही है। यह समस्या है जंग (Corrosion)। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत को हर वर्ष जंग के कारण लगभग ₹14 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, जो देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4.3 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जंग से बचाव के लिए वैज्ञानिक और क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति नहीं अपनाई गई तो आने वाले वर्षों में इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन और सार्वजनिक सुरक्षा पर और अधिक गंभीर हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार जंग केवल लोहे या स्टील के खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलों, रेलवे ट्रैक, बिजली के टावरों, बंदरगाहों, तेल एवं गैस पाइपलाइन, फैक्ट्रियों, वाहनों और इमारतों जैसी महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों की उम्र को कम कर देती है। इसके कारण रखरखाव की लागत बढ़ती है, परियोजनाएं महंगी होती हैं और कई बार दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
क्या है जंग (Corrosion)?
जंग एक प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें धातु हवा, नमी, पानी, नमक या अन्य रासायनिक पदार्थों के संपर्क में आने पर धीरे-धीरे खराब होने लगती है। सबसे सामान्य उदाहरण लोहे पर लगने वाली लाल-भूरी जंग है। हालांकि केवल लोहा ही नहीं, बल्कि एल्यूमिनियम, तांबा और अन्य धातुएं भी अलग-अलग प्रकार के क्षरण का शिकार होती हैं। भारत जैसे देश में, जहां समुद्री तट, रेगिस्तान, अत्यधिक आर्द्र क्षेत्र, भारी वर्षा वाले इलाके और औद्योगिक प्रदूषण वाले शहर मौजूद हैं, वहां जंग की समस्या और भी जटिल हो जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु अलग होने के बावजूद निर्माण सामग्री और सुरक्षा मानकों में अक्सर एक जैसी पद्धति अपनाई जाती है।
भारत में क्यों बढ़ रही है समस्या?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से विकसित हो रहा है। हजारों किलोमीटर एक्सप्रेसवे, नए रेलवे कॉरिडोर, मेट्रो परियोजनाएं, बंदरगाह, एयरपोर्ट और बिजली नेटवर्क बनाए जा रहे हैं। लेकिन इन परियोजनाओं में हर क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सामग्री और कोटिंग तकनीक का पर्याप्त उपयोग नहीं किया जाता। समुद्री क्षेत्रों में नमकयुक्त हवा धातुओं को तेजी से नुकसान पहुंचाती है, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक धातुओं के क्षरण की गति बढ़ा देते हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लगातार नमी भी जंग का बड़ा कारण बनती है।
विकसित देशों से क्या सीख सकता है भारत?
अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देशों में निर्माण कार्य से पहले क्षेत्र की जलवायु का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर को मौसम और पर्यावरणीय परिस्थितियों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। समुद्री क्षेत्रों में विशेष एंटी-कोरोजन स्टील, उच्च गुणवत्ता वाली कोटिंग, गैल्वनाइज्ड धातु और नियमित निरीक्षण अनिवार्य किए जाते हैं। इसके विपरीत भारत में अभी भी अधिकांश परियोजनाओं में समान डिजाइन और समान सुरक्षा मानकों का उपयोग किया जाता है, जिससे कई संरचनाएं अपेक्षा से पहले खराब होने लगती हैं।
किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर?
विशेषज्ञों के अनुसार जंग का सबसे अधिक प्रभाव बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन सेक्टर पर पड़ता है। बिजली के टावर, ट्रांसमिशन लाइनें, सब-स्टेशन और अन्य उपकरण लगातार मौसम के संपर्क में रहते हैं। जंग लगने से बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है और रखरखाव का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
इसके बाद टेलीकॉम सेक्टर प्रभावित होता है। मोबाइल टावर, फाइबर नेटवर्क और संचार उपकरणों की धातु संरचनाएं भी क्षरण का शिकार होती हैं।
रेलवे क्षेत्र में ट्रैक, पुल, सिग्नलिंग उपकरण और कोचों के धातु हिस्सों की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है। समय पर रखरखाव नहीं होने पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
ऑटोमोबाइल उद्योग में वाहन के चेसिस, बॉडी और अन्य धातु भागों पर जंग आने से सुरक्षा और वाहन की उम्र दोनों प्रभावित होती हैं।
इसी प्रकार बंदरगाह, तेल एवं गैस उद्योग, रासायनिक उद्योग और शहरी बुनियादी ढांचे पर भी इसका व्यापक असर पड़ता है।
केवल आर्थिक नहीं, सुरक्षा का भी सवाल
जंग केवल रखरखाव का खर्च नहीं बढ़ाती, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। यदि किसी पुल, फ्लाईओवर, बिजली टावर या औद्योगिक संयंत्र में समय रहते जंग की पहचान नहीं की जाए, तो संरचना कमजोर हो सकती है। दुनिया के कई देशों में पुलों और औद्योगिक इकाइयों में हुई दुर्घटनाओं के पीछे धातु का क्षरण एक प्रमुख कारण माना गया है। भारत में भी समय-समय पर पुलों, जल पाइपलाइनों और औद्योगिक संरचनाओं में क्षरण की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसलिए विशेषज्ञ इसे केवल इंजीनियरिंग नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का विषय भी मानते हैं।
बढ़ती रखरखाव लागत
जब किसी संरचना पर जंग लगती है तो उसे बार-बार पेंट करना, मरम्मत करना या पूरी संरचना बदलना पड़ सकता है। इससे सरकारी परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है। कई बार किसी पुल या सड़क को मरम्मत के लिए बंद करना पड़ता है, जिससे यातायात प्रभावित होता है और उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। यदि निर्माण के समय ही बेहतर सामग्री और आधुनिक सुरक्षा तकनीक अपनाई जाए तो शुरुआती लागत थोड़ी अधिक हो सकती है, लेकिन लंबे समय में कुल खर्च काफी कम हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा रहा चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती आर्द्रता, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, अत्यधिक वर्षा और तापमान में बदलाव भी जंग की समस्या को और गंभीर बना सकते हैं। समुद्री तटीय शहरों जैसे मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और विशाखापट्टनम में यह जोखिम पहले से अधिक है।
क्या हैं समाधान?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत को राष्ट्रीय स्तर पर Corrosion Management Policy की आवश्यकता है। इसके तहत विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए अलग-अलग निर्माण मानक बनाए जा सकते हैं। निर्माण में एंटी-कोरोजन कोटिंग, गैल्वनाइज्ड स्टील, स्टेनलेस स्टील और आधुनिक मिश्रधातुओं का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली, ड्रोन निरीक्षण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से शुरुआती चरण में ही जंग का पता लगाया जा सकता है। सार्वजनिक परियोजनाओं में Life Cycle Cost Analysis को भी अनिवार्य बनाया जाना चाहिए ताकि केवल शुरुआती लागत नहीं, बल्कि पूरी संरचना के जीवनकाल का खर्च ध्यान में रखा जा सके।
उद्योग और सरकार की भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि निजी उद्योगों को भी अपने संयंत्रों में नियमित निरीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और आधुनिक संरक्षण तकनीकों को अपनाना होगा। इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों को जंग नियंत्रण के लिए विशेष प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में समन्वित प्रयास किए जाते हैं तो न केवल हजारों करोड़ रुपये की बचत हो सकती है, बल्कि सार्वजनिक संपत्तियों की उम्र भी कई वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है।
भविष्य की चुनौती
भारत अगले दो दशकों में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इसके लिए मजबूत और टिकाऊ बुनियादी ढांचा अत्यंत आवश्यक है। यदि जंग जैसी “अदृश्य समस्या” पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो यह विकास परियोजनाओं की लागत बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक प्रगति की रफ्तार को भी प्रभावित कर सकती है।
अदृश्य दुश्मन ‘जंग’ से जूझ रहा भारत, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता खतरा
जंग को अक्सर एक सामान्य तकनीकी समस्या समझा जाता है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। यह देश के पुलों, रेलवे, बिजली नेटवर्क, उद्योगों और सार्वजनिक परिसंपत्तियों को धीरे-धीरे कमजोर करती है, जिससे हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक योजना, क्षेत्र-विशिष्ट निर्माण मानक, आधुनिक सामग्री, नियमित निरीक्षण और समय पर रखरखाव के माध्यम से इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि भारत को टिकाऊ बुनियादी ढांचा और तेज आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है, तो जंग से लड़ाई को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।
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