शिवसेना (UBT) और TMC के बागी सांसदों को स्पीकर की हरी झंडी; मानसून सत्र से पहले विपक्ष को झटका

The CSR Journal Magazine

संसद में राजनीतिक उलटफेर: शिंदे गुट में शामिल 6 सांसदों को मिली मान्यता, TMC के बागियों को मिला अलग ब्लॉक

संसद के मॉनसून सत्र से ठीक पहले देश की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए शिवसेना (UBT) के 6 बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही, तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत करने वाले 20 सांसदों को भी संसद के भीतर एक अलग ब्लॉक के रूप में बैठने की अनुमति मिल गई है। इन फैसलों के बाद विपक्षी खेमे को करारा झटका लगा है, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की स्थिति संसद में और मजबूत हो गई है।

लोकसभा अध्यक्ष का बड़ा फैसला

शनिवार को लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी आदेश के बाद यह साफ हो गया कि सदन के भीतर अब विपक्षी दलों का गणित पूरी तरह बदल चुका है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पिछले काफी दिनों से लंबित चल रहे इन दोनों मामलों पर कानूनी विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करने के बाद अंतिम मुहर लगा दी। स्पीकर के फैसले के अनुसार, शिवसेना (UBT) से टूटकर आए छह सांसदों का आवेदन स्वीकार कर लिया गया है, जिसके तहत अब वे आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना का हिस्सा माने जाएंगे। वहीं दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी TMC से बगावत करने वाले 20 सांसदों को भी सदन की कार्यवाही के दौरान अलग बैठने की व्यवस्था को मंजूरी मिल गई है।

शिवसेना (UBT) को महाराष्ट्र में ‘छक्का’ मार झटका

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के लिए यह निर्णय किसी बड़े राजनीतिक वज्रपात से कम नहीं है। गौरतलब है कि 22 जून को शिवसेना (UBT) के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया था। इन सांसदों ने मुंबई में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शिंदे गुट में शामिल होने का एलान किया था।

शिंदे गुट में शामिल होने वाले 6 सांसद

ओमराजे निंबालकर (धाराशिव)
संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर-पूर्व)
संजय जाधव (परभणी)
संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम)
नागेश पाटिल अष्टिकर (हिंगोली)
भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी)

शिंदे खेमे में बढ़ी सांसदों की संख्या

इस विलय को मान्यता मिलने के बाद अब निचले सदन (लोकसभा) में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई है। मुख्यमंत्री शिंदे ने इस कदम का स्वागत करते हुए विपक्षी खेमे पर तंज कसा और कहा, “साल 2022 में जब हमने पार्टी और धनुष-बाण बचाने के लिए विद्रोह किया था, तब हमारे पास 40 विधायक थे। इस बार लोकसभा में हमारे शेरों ने सीधे छक्का लगाया है।”

दलबदल विरोधी कानून का गणित

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत किसी भी दल के सांसदों या विधायकों को अपनी सदस्यता बचाए रखने के लिए कुल संख्या के कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत के साथ अलग होना अनिवार्य है। उद्धव गुट के पास कुल 9 सांसद थे, जिनमें से 6 सांसद अलग हुए। गणितीय रूप से 9 का दो-तिहाई ठीक 6 होता है। यही वजह रही कि कानूनी रूप से इन सांसदों की सदस्यता पर आंच नहीं आई और लोकसभा अध्यक्ष ने दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत इनके विलय को हरी झंडी दे दी। हालाँकि, शिवसेना (UBT) के संसदीय दल के नेता अरविंद सावंत ने इन सांसदों को कानूनी नोटिस भेजकर दलील दी थी कि मूल राजनीतिक दल का विलय नहीं हुआ है, इसलिए सिर्फ सांसदों का विलय अवैध है। लेकिन स्पीकर सचिवालय ने तकनीकी पहलुओं को सही पाते हुए बागी सांसदों के पक्ष में फैसला सुनाया।

बंगाल से दिल्ली तक हिली TMC; 20 सांसद अलग ब्लॉक में

महाराष्ट्र के अलावा दूसरा सबसे बड़ा घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को चुनौती देते हुए पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने बीती 15 जून को बगावत कर दी थी। इन सभी बागी सांसदों ने ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नाम के राजनीतिक दल के साथ हाथ मिला लिया था। लोकसभा में TMC के कुल 28 सांसद थे, जिनमें से 20 सांसदों का अलग होना दो-तिहाई से कहीं अधिक है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मॉनसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में NCPI के नेता सुदीप बंदोपाध्याय और अन्य बागी सांसदों को आमंत्रित किया है। इसके अलावा, डॉक्टर काकोली घोष दस्तिदार को संसदीय रिकॉर्ड में NCPI का मुख्य सचेतक (Chief Whip) भी स्वीकार कर लिया गया है।

अभिषेक बनर्जी की बागियों को चुनौती

इस बड़ी टूट पर प्रतिक्रिया देते हुए टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने बागियों को खुली चुनौती दी है। उन्होंने कोलकाता में कहा, “अगर बागी सांसदों को मुझसे कोई निजी परेशानी थी, तो वे ममता बनर्जी के पास वापस लौट आएं। अगर वे वापस आते हैं, तो मैं एक घंटे के भीतर अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा।”

आगामी मॉनसून सत्र पर प्रभाव

स्पीकर ओम बिरला के इस ऐतिहासिक कदम के बाद आगामी संसद सत्र काफी हंगामेदार रहने के आसार हैं। जहां एक तरफ विपक्ष (INDIA गठबंधन) इस फैसले को ‘संविधान और लोकतंत्र की हत्या’ बताकर सदन के भीतर और बाहर पुरजोर विरोध करने की रणनीति बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों का मनोबल काफी ऊंचा है। टीएमसी और शिवसेना (UBT) के इन बागी धड़ों के समर्थन से लोकसभा के भीतर NDA को फ्लोर मैनेजमेंट और किसी भी महत्वपूर्ण बिल को पास कराने में भारी बढ़त हासिल हो जाएगी।

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