भारत के कण-कण में इतिहास बसता है। ऐतिहासिक विरासत देश की खूबसूरती और उसकी प्रसिद्धि में चार चांद लगाते हैं। हावड़ा में एक ऐसा पेड़ है, जिसे देखने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं।
भारत ऐतिहासिक विरासत और अजब-गजब प्राकृतिक संपदाओं से भरा देश है। देश का हर कोना अपने आप में विशिष्ट और बेजोड़ है। देश के साथ ही विदेशी पर्यटकों और संशोधकों के लिए भारत हमेशा से एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण राष्ट्र रहा है। हावड़ा के शिबपुर में स्थित एक विशालकाय बरगद का पेड़ इसी लिस्ट में आता है। दरअसल, विशाल वट वृक्ष 255 साल पुराना है। साथ ही यह पेड़ 5 एकड़ जमीन पर फैला हुआ है। बरगद के इस पेड़ को कोलकाता का सबसे पुराना और बुजुर्ग नागरिक भी कहा जाता है।
255 साल पुराना विशाल बरगद का पेड़ हावड़ा के शिबपुर के आचार्य जगदीश चंद्र बोस इंडियन बोटेनिक गार्डन में है। पिछले 30 वर्षों में इस पेड़ का फैलाव दो एकड़ से भी ज्यादा जमीन पर हुआ है। बोटेनिकल गार्डन में इस पेड़ को देखने के लिए देश के साथ ही विदेशों से भी लोग आते हैं। पर्यटकों के बीच यह आकर्षण का मुख्य केंद्र है। विशाल बरगद के पेड़ में लगातार फैलाव के चलते बोटेनिकल गार्डन के अधिकारियों को इसकी बाउंड्री में वृद्धि करनी पड़ी है, ताकि इस ऐतिहासिक पेड़ को सुरक्षित रखा जा सके।
बूढ़े बरगद ने बनाया World Record
वर्ल्ड रिकॉर्ड सिर्फ इंसान ही नहीं, पेड़ भी बनाते हैं। 250 साल पुराना दुनिया का सबसे विशालकाय बरगद का पेड़ इसका उदाहरण है। Guiness Book Of World Records में शामिल इस पेड़ को द ग्रेट बनियन ट्री The Great Banyan Tree के नाम से भी जाना जाता है। 1787 में जब इसे कोलकाता द आचार्य जगदीश चंद्र बोस बॉटनिकल गार्डेन में बोटेनिकल गार्डेन में स्थापित किया गया, उस समय इसकी उम्र करीब 20 साल थी।
कब, कैसे, कितना बदला द ग्रेट बनियन ट्री
दुनिया का सबसे चौड़ा पेड़ 14,500 वर्ग मीटर में फैला है। दूर से देखने पर यह जंगल की तरह नज़र आता है। बरगद के पेड़ की शाखाओं से निकलने वाली जटाएं पानी की तलाश में जमीन में नीचे की ओर बढ़ती गईं और इस तरह यह जंगल में तब्दील होता गया। इस बरगद की 3,372 से अधिक जटाएं जड़ का रूप ले चुकी हैं। 1884 और 1925 में आए चक्रवाती तूफानों ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया था। इस दौरान कई शाखाओं में फफूंद लगने के कारण काट दी गई थीं। इसके बाद भी सबसे विशालकाय वृक्ष का रिकॉर्ड इसके नाम है।
जंगल जैसा स्वरूप होने के कारण यहां 87 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। जो पर्यटकों को खुशनुमा अहसास कराती हैं। इसकी सबसे ऊंची शाखा 24 मी. लंबी है। वर्तमान में जमीन तक पहुंचने वाली स्तंभ जड़ों की कुल संख्या 3,772 है। इसकी विशालता कारण गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में इसका नाम दर्ज है। इस विशाल बरगद के सम्मान में भारत सरकार ने साल 1987 में डाक टिकट जारी किया था और यह बरगद बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया का प्रतीक चिन्ह भी है। बरगद के इस पेड़ को वॉकिंग ट्री भी कहते हैं। इस गार्डेन के केयर टेकर और सीनियर बॉटेनिस्ट एमयू शरीफ के मुताबिक जहां पॉल्यूशन अधिक होता है, उस तरफ़ इसकी ग्रोथ नहीं होती है। यह पूर्व की ओर बढ़ रहा है। सुबह-सुबह सूर्य की ओर से आने वाली किरणों की तरफ इसकी ग्रोथ अधिक देखी गई है। एमयू शरीफ के अनुसार 1985 में इसे चारों ओर फेंसिंग की गई थी। कुछ सालों बाद इसकी ग्रोथ के डायरेक्शन के बारे में पता चला, जब इसकी शाखाएं पूर्व की ओर अधिक फैलीं। सीनियर बॉटेनिस्ट बसंत सिंह के अनुसार इसकी देखभाल के लिए करीब 13 ट्रेंड लोगों को नियुक्त किया गया है। जिसमें चार सीनियर बॉटेनिस्ट और अन्य ट्रेंड माली हैं। पूरी टीम के लिए बड़ा चैलेंज है इसे संभालना क्योंकि इसकी शाखाएं नीचे की ओर बढ़ रही हैं। इसकी ग्रोथ एक ओर अधिक हो रही है ऐसे में इसे संतुलित और सीधा रखना बड़ी चुनौती है।
5 बीघा जमीन में फैला, 500 साल पुराना बरगद का पेड़, अब UP की विरासतों में शामिल
उत्तर प्रदेश के बिजनौर में करीब 500 साल पुराना एक वट वृक्ष है जो कि 5 बीघा जमीन में फैला हुआ है, इस वृक्ष को अब विरासतों की डायरी में शामिल किया गया है। जिसके बाद इसके आस-पास एक कोरिडोर बनाकर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जाएगा।
बिजनौर के पांच सौ साल पुराने वृक्ष को उत्तर प्रदेश की विरासतों में दर्ज करके विशेष संरक्षित प्रजाति घोषित किया गया है। चांदपुर तहसील के धीवरपुरा गांव में एक एकड जमीन में फैले इस वट वृक्ष को देश के सबसे प्राचीन पेड़ों की श्रृंखला में शुमार किये जाने से बिजनौर वन विभाग इसे पर्यटन क्षेत्र के तौर पर विकसित करने में लग गया है। इस विशाल वट वृक्ष के दो सौ मीटर इलाके में विरासत वृक्ष पथ मार्ग का निर्माण कराने की योजना बनाई गई है।
शाखाओं के बीच से गुज़रती है सड़क
वट-वृक्ष की शाखाएं इतनी दूर तक फैली हुई है कि इनके बीच से होकर एक सड़क गुजरती है। आसपास के इलाके नव दंपत्ति इस वृक्ष के दर्शन करने और प्रसाद चढाने आते है। शादीशुदा जोड़े यहां लंबे और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद लेते हैं। स्थानीय निवासियों की मान्यता है कि यह वट वृक्ष करीब एक हजार साल पुराना है। चांदपुर वन रेंज के धीवरपुरा गांव में स्थित यह पेड़ बीस साल पहले तक दस बीघे जमीन में फैला हुआ था। लेकिन समय के साथ-साथ आसपास के किसानों ने इसकी शाखाओं और जटाओं को काट कर इसके फैलाव को कम कर दिया। अब यह पेड़ सिर्फ पांच बीघा जमीन में ही सिमट कर रह गया है।
पांच सौ साल पुराने विशाल वट वृक्ष की जटाओं से पौध निर्माण कर अलग-अलग स्थानों पर पौधारोपण किया जा रहा है। वृक्ष को देखने आने वाले पर्यटकों के लिए दो सौ मीटर रेडियस में विरासत वृक्ष पथ का निर्माण कराया जायेगा। उत्तर प्रदेश की विरासत डायरी में दर्ज होने के बाद इस विशालकाय वृक्ष को पर्यटन की दृष्टि से सुविधाजनक और सुव्यवस्थित बनाने की योजना बनाई गई है।