ज्ञान भारतम मिशन-तकनीक और परंपरा का संगम: AI के सहारे डिकोड होंगी करोड़ों दुर्लभ लिपियां

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भारत में 1.19 करोड़ पांडुलिपियों की खोज, ज्ञान भारतम मिशन का ऐतिहासिक सफलताः पांडुलिपियों का सर्वेक्षण

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ज्ञान भारतम मिशन के तहत राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में अब तक 1.19 करोड़ से अधिक प्राचीन पांडुलिपियों के रिकॉर्ड की ऐतिहासिक खोज की गई है। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखवत ने संसद में इस अभूतपूर्व सफलता की आधिकारिक पुष्टि की है। यह खोजी रिपोर्ट भारत के इस ऐतिहासिक डिजिटल और सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान की पूरी पड़ताल आपके सामने रखती है।

भारत का डिजिटल सांस्कृतिक पुनर्जागरण और ज्ञान भारतम मिशन

भारत ने अपनी खोई हुई प्राचीन बौद्धिक संपदा को वापस पाने की दिशा में इतिहास की सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए ज्ञान भारतम मिशन (Gyan Bharatam Mission) के अंतर्गत हुए व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में देश के कोने-कोने से 1.19 करोड़ (11.9 मिलियन) से अधिक प्राचीन पांडुलिपियों की खोज और प्रलेखन (Documentation) किया जा चुका है। यह आंकड़ा केवल कागजी नहीं है, बल्कि सदियों से मंदिरों, मठों, निजी पुस्तकालयों और सुदूर गांवों के घरों में धूल फांक रही भारत की अमूल्य ज्ञान परंपरा का जीता-जागता साक्ष्य है। सरकार द्वारा इस मिशन के लिए वर्ष 2025-2031 की अवधि हेतु ₹491.66 करोड़ का भारी-भरकम बजट स्वीकृत किया गया है, जिसके माध्यम से इन पांडुलिपियों को न केवल नष्ट होने से बचाया जा रहा है, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से अत्याधुनिक डिजिटल प्रारूप में ढाला जा रहा है।

मिशन की पृष्ठभूमि: बजट से लेकर धरातल तक का सफर

भारत में प्राचीन ज्ञान का भंडार बिखरा पड़ा था, लेकिन देश में कोई एक एकीकृत डेटाबेस नहीं था। इस समस्या को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने अपने केंद्रीय बजट में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (NMM) को पुनर्गठित करते हुए ‘ज्ञान भारतम मिशन’ के रूप में एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना घोषित की।स्थायी वित्त समिति (SFC) ने इस महा-अभियान को गति देने के लिए ₹491.66 करोड़ के फंड को मंजूरी दी। इसके तुरंत बाद, 16 मार्च 2026 को देशव्यापी ‘ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण’ का औपचारिक आगाज हुआ। मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत की ज्ञान परंपराओं को पुनर्जीवित करना और उन्हें ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के साथ जोड़ना है।

कैसे हुआ यह चमत्कार? 4-चरणों वाला खोजी ढांचा

करोड़ों की संख्या में बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ना कोई आसान काम नहीं था। संस्कृति मंत्रालय ने इसके लिए एक बेहद वैज्ञानिक और रणनीतिक चार-चरणों वाला पारदर्शी ढांचा (Four-Stage Framework) तैयार किया।
प्रथम चरण (पहचान और मैपिंग): डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के माध्यम से देश भर में पांडुलिपियों की मौजूदगी का पहला डिजिटल नक्शा (Manuscript Presence Map) तैयार किया गया।
द्वितीय चरण (भौतिक सत्यापन): विभिन्न राज्यों के विशेषज्ञों, भाषाविदों और सरकारी प्राधिकारियों की टीमों ने चिन्हित स्थानों पर जाकर पांडुलिपियों का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया।
तृतीय चरण (कैटलॉगिंग और मेटाडेटा): प्रत्येक पांडुलिपि की भाषा, लिपि, कालखंड, लेखक और विषय (जैसे- आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, गणित) के आधार पर विस्तृत विवरण तैयार किया गया।
चतुर्थ चरण (संरक्षण और उच्च-गुणवत्ता डिजिटलीकरण): अत्यंत संवेदनशील और जर्जर हो चुकी पांडुलिपियों को रासायनिक उपचार देकर सुरक्षित किया गया और फिर अत्याधुनिक स्कैनर्स से उनका डिजिटलीकरण किया गया।

भाषावार वर्गीकरण: संस्कृत का दबदबा, क्षेत्रीय भाषाओं की समृद्ध उपस्थिति

इस खोजी सर्वे के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे भारत की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक विरासत की गहराई को दर्शाते हैं।
संस्कृत: ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म की इस मूल भाषा की सबसे अधिक 11,66,743 पांडुलिपियों का रिकॉर्ड दर्ज हुआ है।
ओड़िया: ओडिशा की समृद्ध ताड़पत्र परंपरा की बदौलत 2,13,088 पांडुलिपियां खोजी गईं।
अन्य प्रमुख भाषाएं: हिंदी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तिब्बती, असमिया, तेलुगु, बंगाली के साथ-साथ फारसी और अरबी भाषाओं के भी लाखों ऐतिहासिक दस्तावेज सामने आए हैं।
क्षेत्रीय एवं जनजातीय लिपियां: लगभग 19,15,374 पांडुलिपियां ‘अन्य’ श्रेणियों में दर्ज हैं, जो भारत के सुदूर ग्रामीण और जनजातीय इलाकों की स्वदेशी ज्ञान परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।

तकनीक का अनूठा समागम: AI, OCR और LLSM का प्रयोग

इस मिशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पुरातन इतिहास को आधुनिकतम तकनीक से जोड़ा गया है। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, ज्ञान भारतम वेब पोर्टल (Gyan Bharatam Web Portal) को पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से लैस किया गया है।
लार्ज लैंग्वेज स्क्रिप्ट मॉडल (LLSM): प्राचीन और लुप्तप्राय लिपियों को समझने और उनका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद करने के लिए विशेष AI मॉडल विकसित किए गए हैं।
OCR और HTR तकनीक: हाथ से लिखी प्राचीन लिखावटों को पढ़ने के लिए हैंडरिटेन टेक्स्ट रिकग्निशन (HTR) और ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) का प्रयोग किया जा रहा है। इसके माध्यम से तस्वीरें सीधे डिजिटल टेक्स्ट में बदल जाती हैं।
ब्लॉकचेन तकनीक: पांडुलिपियों की प्रमाणिकता (Provenance) बनाए रखने और बौद्धिक संपदा की चोरी या पायरेसी रोकने के लिए सुरक्षा की दृष्टि से ब्लॉकचेन का इस्तेमाल हो रहा है।

वर्तमान स्थिति: ‘ज्ञान भारतम पोर्टल’ पर क्या है उपलब्ध?

इस ऐतिहासिक खोज के बाद काम केवल सहेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आम जनता और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ भी बनाया जा रहा है। देश भर में अब तक 8 लाख से अधिक पांडुलिपियों का पूर्ण डिजिटलीकरण किया जा चुका है। इनमें से 4.40 लाख से अधिक पांडुलिपियां ज्ञान भारतम पोर्टल पर सार्वजनिक रूप से ‘व्यू मोड’ (View Mode) में उपलब्ध करा दी गई हैं, जिन्हें कोई भी विद्वान राज्यवार देख सकता है। संवेदनशील, प्रतिबंधित या निजी संरक्षकों के अधिकारों के अधीन आने वाली सामग्रियों को एक सुरक्षित ‘पहुंच नीति ढांचे’ (Access Policy Framework) के तहत नियंत्रित किया गया है।

क्लस्टर केंद्रों का संस्थागत ढांचा और ‘पांडुलिपि मित्र’

इस व्यापक अभियान को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार ने देश भर के विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, संग्रहालयों, अभिलेखागारों और धार्मिक ट्रस्टों को मिलाकर एक मजबूत संस्थागत तंत्र खड़ा किया है। इसके तहत क्लस्टर सेंटर (Cluster Centres) और इंडिपेंडेंट सेंटर (Independent Centres) बनाए गए हैं। उदाहरण के लिए, बिहार के नवा नालंदा महाविहार (नालंदा), खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी (पटना) और श्री बोधगया मठ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान इस मिशन से सक्रिय रूप से जुड़ चुके हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 100 जिलों में जमीनी स्तर पर “पांडुलिपि मित्र” (Pandulipi Mitras) नामक स्वयंसेवकों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया गया है। ये स्वयंसेवक घर-घर और मंदिर-मंदिर जाकर लोगों को अपनी प्राचीन पांडुलिपियों की जानकारी साझा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

जनभागीदारी: ‘ज्ञान भारतम ऐप’ बना डिजिटल सेतु

सरकार ने साफ किया है कि यह केवल एक सरकारी सर्वे नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन है। इसके लिए ‘ज्ञान भारतम मोबाइल एप्लिकेशन’ लॉन्च किया गया है। कोई भी आम नागरिक जिसके घर, गांव या आस-पास पुरानी पांडुलिपियां मौजूद हैं, वह इस ऐप को डाउनलोड करके उनकी तस्वीरें और बुनियादी जानकारी सरकार के साथ साझा कर सकता है। इस प्रक्रिया को पूरी तरह से स्वैच्छिक और गैर-दखलकारी (Non-intrusive) रखा गया है। सरकार ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि जानकारी देने से मूल मालिक का स्वामित्व प्रभावित नहीं होगा और न ही पांडुलिपियों को जबरन स्थानांतरित किया जाएगा। इसी जनभागीदारी के कारण अमृतसर के भाई अमित सिंह राणा ने गुरुमुखी लिपि की और अरुणाचल प्रदेश के नामसाई के चाओ नंतिसिन्ध लोकांग ने ताई लिपि की दुर्लभ पांडुलिपियों को राष्ट्रीय पटल पर साझा किया।

राष्ट्रीय डिजिटलीकरण अभियान कार्यशाला और भावी रोडमैप

हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने नई दिल्ली के ‘द अशोक’ होटल में राष्ट्रीय डिजिटलीकरण अभियान कार्यशाला (National Digitisation Drive Workshop) का आयोजन किया। इसमें राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, प्रौद्योगिकी साझेदारों और शिक्षाविदों के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। संस्कृति सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने कार्यशाला में स्पष्ट किया कि पांडुलिपियों के अत्यंत नाजुक होने के कारण, संरक्षण और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया साथ-साथ चलेगी। राज्यों और केंद्रों को अपने बुनियादी ढांचे, उपकरणों और प्रशिक्षित जनशक्ति को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। आने वाले समय में वर्चुअल म्यूजियम (Virtual Museums) और स्कूलों-विश्वविद्यालयों के लिए शैक्षिक मॉड्यूल भी तैयार किए जाएंगे ताकि देश की युवा पीढ़ी अपनी इस अमूल्य विरासत से सीधे जुड़ सके।

विश्वगुरु बनने की दिशा में एक ठोस कदम

ज्ञान भारतम मिशन की यह सफलता केवल पुरानी कॉपियों या ताड़पत्रों को अलमारी में सहेजने का काम नहीं है, बल्कि यह भारत के बौद्धिक प्रभुत्व (Intellectual Sovereignty) को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने का महा-अभियान है।1.19 करोड़ पांडुलिपियों के इस विशाल भंडार में खगोल विज्ञान, योग, गणित, धातु विज्ञान, आयुर्वेद और कलाओं का वो अनमोल खजाना छुपा है, जो आधुनिक दुनिया की कई समस्याओं का समाधान कर सकता है। तकनीक और परंपरा के इस अनूठे संगम के माध्यम से भारत ने न केवल अपने अतीत को सुरक्षित किया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान आधारित सुनहरे भविष्य की नींव भी रख दी है।

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