ट्रंप का टैरिफ वॉर: अमेरिका के 25 राज्यों ने अपनी ही सरकार को अदालत में घसीटा

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US New Tariffs Row: भारत समेत 60 देशों में डोनाल्ड ट्रंप का भारी विरोध, 25 राज्यों ने ठोका मुकदमा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत समेत 60 देशों पर लगाए गए नए और भारी आयात शुल्क (टैरिफ) के खिलाफ अमेरिका के ही 25 राज्यों ने न्यूयॉर्क स्थित अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड (US Court of International Trade) में मुकदमा दायर कर दिया है। यह कानूनी जंग ट्रंप प्रशासन की उस आर्थिक नीति के सीधे विरोध में शुरू हुई है, जिसके तहत 24 जुलाई 2026 से वैश्विक व्यापारिक भागीदारों पर 10% से 12.5% तक का अतिरिक्त कर थोप दिया गया था। डेमोक्रेटिक गवर्नरों और अटॉर्नी जनरल के नेतृत्व वाले इन 25 राज्यों, जिनमें न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया और इलिनोइस जैसे बड़े राज्य शामिल हैं, का स्पष्ट आरोप है कि ट्रंप प्रशासन सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में रद्द किए गए अवैध करों को दोबारा लागू करने के लिए ‘जबरन मजदूरी’ (Forced Labor) को महज एक बहाना (Pretext) बना रहा है। इस अदालती चुनौती ने अमेरिका के भीतर एक अभूतपूर्व आंतरिक संवैधानिक और आर्थिक संकट को जन्म दे दिया है।

अमेरिकी टैरिफ विवाद- क्या है ट्रंप का नया टैरिफ आदेश?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को आगे बढ़ाते हुए 24 जुलाई 2026 को दुनिया के 60 प्रमुख व्यापारिक भागीदारों पर दोहरा अंक (Double-digit) वाला आयात शुल्क लागू कर दिया। प्रशासन का दावा है कि ये देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में ‘जबरन मजदूरी’ (Forced Labor) से बनने वाले सामान पर प्रभावी रोक लगाने में विफल रहे हैं, जिससे अमेरिकी उद्योगों और श्रमिकों को नुकसान हो रहा है। इस नीति के तहत-
10% की बेसलाइन दर: भारत, यूरोपीय संघ (EU), ब्रिटेन और श्रीलंका जैसे 17 देशों/क्षेत्रों पर लगाई गई है, जिन्होंने कुछ हद तक श्रम मानकों में सुधार की प्रतिबद्धता जताई है।
12.5% की उच्च दर: चीन, जापान, कनाडा, और तुर्किये सहित 43 देशों पर थोपी गई है, जहां अमेरिका के अनुसार श्रम कानून बेहद कमजोर हैं।
दायरा: यह नया टैक्स ढांचा अमेरिका के कुल आयात के 99.4 प्रतिशत हिस्से को कवर करता है, जिससे यह अमेरिकी इतिहास के सबसे व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों में से एक बन गया है। तेल, प्राकृतिक गैस, और उर्वरक जैसी कुछ बुनियादी वस्तुओं को ही इससे छूट दी गई है।

घर में ही घिरे राष्ट्रपति: 25 राज्यों का मुकदमा

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ अमेरिका के भीतर ही तीव्र आक्रोश फैल गया है। 25 अमेरिकी राज्यों के गठबंधन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए इस नीति को पूरी तरह ‘अवैध, मनमाना और असंवैधानिक’ करार दिया है। मुक़दमे में शामिल प्रमुख राज्यों में न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, एरिजोना, ओरेगन, वॉशिंगटन, मिशिगन और पेंसिल्वेनिया शामिल हैं। अदालत में दायर याचिका के अनुसार, अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के पास ही टैक्स या टैरिफ लगाने का संवैधानिक अधिकार है। राज्यों का तर्क है कि राष्ट्रपति अपनी मर्जी या सनक (Whims) के आधार पर पूरे देश पर करों का बोझ नहीं लाद सकते। इस मुकदमे में मांग की गई है कि कोर्ट तुरंत इन टैरिफ पर रोक लगाए और अब तक आयातकों से वसूले गए करोड़ों डॉलर वापस (Refund) करने का आदेश दे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवहेलना का आरोप

इस पूरे विवाद की जड़ें पुरानी कानूनी लड़ाई से जुड़ी हैं। इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) का इस्तेमाल कर दुनिया भर से आने वाले सामान पर भारी टैक्स लगाया था, जिसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल फरवरी में ‘अवैध’ घोषित करते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट के उस झटके के बाद सरकार को कंपनियों का लगभग 130 से 166 अरब डॉलर का टैक्स रिफंड करना पड़ रहा है। राज्यों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में हारने के बाद अपनी जिद पूरी करने और राजस्व (Revenue) की भरपाई करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट की ‘धारा 301’ (Section 301) का गलत इस्तेमाल किया है। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स ने कड़े शब्दों में कहा, “सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खाने के बाद, प्रशासन एक बार फिर नए बहानों के साथ अमेरिकी परिवारों और व्यवसायों पर अवैध रूप से टैक्स का बोझ डाल रहा है।” वहीं कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रोब बोंटा ने कहा कि टैरिफ वास्तव में आम जनता पर लगने वाला टैक्स है, जिसकी कीमत अमेरिकी नागरिक चुकाएंगे।

भारत पर प्रभाव: राहत के बीच बड़ी चुनौती

इस वैश्विक आर्थिक टकराव का केंद्र भारत भी है। शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 12.5% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, नई दिल्ली द्वारा जबरन मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर अपने घरेलू नियमों को सख्त करने और द्विपक्षीय व्यापार वार्ता जारी रखने के बाद, अमेरिका ने भारत को थोड़ी राहत देते हुए 10% की श्रेणी में डाल दिया। इसके बावजूद भारतीय निर्यातकों के लिए यह एक बड़ा झटका है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। इस 10% अतिरिक्त कर के कारण निम्नलिखित क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
टेक्सटाइल और गारमेंट्स- भारतीय कपड़ों की लागत अमेरिकी बाजार में बढ़ जाएगी, जिससे बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा कठिन होगी।
इंजीनियरिंग गुड्स और ऑटो कंपोनेंट्स: धातु और मशीनरी से जुड़े निर्यात महंगे हो जाएंगे।
फार्मास्युटिकल (दवाएं): भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश है। फार्मा सेक्टर के विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं पर अतिरिक्त शुल्क से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है, हालांकि अमेरिकी बाजार की निर्भरता के कारण वहां दवाओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
भारतीय उद्योग जगत और व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार इस मुद्दे को पूरी तरह अनुचित मानती है और इसे बातचीत या एक अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Deal) के माध्यम से सुलझाने का प्रयास कर रही है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर चौतरफा मार

इस आंतरिक मुकदमेबाजी का सबसे बड़ा कारण यह है कि खुद अमेरिकी राज्य अपने नागरिकों को महंगाई की आग में झुलसने से बचाना चाहते हैं। एरिजोना की अटॉर्नी जनरल क्रिस मेयस ने ट्रंप की इस योजना को “विक्षिप्त” (Insane) और आर्थिक रूप से आत्मघाती बताया है। व्यापार विश्लेषकों के अनुसार, जब विदेशी सामान पर आयात शुल्क बढ़ता है, तो उसका सीधा असर अमेरिकी खुदरा बाजार पर पड़ता है। ग्रोसरी (राशन), घरेलू उपयोग की जरूरी वस्तुएं, निर्माण सामग्री (Building Materials) और इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम महंगे हो जाते हैं। कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूजम ने अलग से केस दर्ज करते हुए कहा कि देश के सबसे बड़े आयातक राज्य होने के नाते कैलिफोर्निया को इस फैसले से अरबों डॉलर का राजस्व और व्यापारिक नुकसान होगा। इससे पहले अमेरिका के छोटे व्यापारियों के संगठनों (Small Businesses) ने भी इस नीति के खिलाफ क्लास-एक्शन मुकदमा दायर किया था।

ट्रंप प्रशासन का पलटवार और बचाव

चतरफा हमलों और अदालती मुकदमों के बीच व्हाइट हाउस और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमिसन ग्रीर अपने फैसले पर अडिग हैं। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने नीति का पुरजोर बचाव करते हुए कहा, “विदेशी देशों द्वारा अपने यहां जबरन मजदूरी से बनने वाले सामान पर रोक न लगाना अमेरिकी वाणिज्य और हमारे घरेलू श्रमिकों के साथ घोर अन्याय है। इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाएगा।” प्रशासन का दावा है कि ‘सेक्शन 301’ के तहत राष्ट्रपति को अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई करने का पूरा कानूनी अधिकार है और यह नीति अमेरिकी विनिर्माण (Manufacturing) को पुनर्जीवित करने तथा व्यापार घाटे को पाटने में मददगार साबित होगी।

आगे की राह

डोनाल्ड ट्रंप का यह नया टैरिफ युद्ध अब वाशिंगटन के नीतिगत गलियारों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार युद्ध (Trade War) और घरेलू स्तर पर गंभीर कानूनी लड़ाई में तब्दील हो चुका है। एक तरफ जहां वैश्विक बाजार इस अनिश्चितता से सहमा हुआ है, वहीं भारत जैसे देश अमेरिका के साथ कूटनीतिक और द्विपक्षीय वार्ता के जरिए बीच का रास्ता निकालने की कोशिशों में जुटे हैं। यदि अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड इन 25 राज्यों के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो यह ट्रंप प्रशासन के आर्थिक एजेंडे के लिए अब तक का सबसे बड़ा संवैधानिक झटका होगा। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें न्यूयॉर्क की अदालत और आने वाले हफ्तों में होने वाली सुनवाइयों पर टिकी हैं।

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