न्याय की कछुआ चाल और फाइलों के अंबार में दबी आम आदमी की उम्मीदें

The CSR Journal Magazine

बढ़ता हुआ न्यायिक भंडार: सुप्रीम कोर्ट में 10,000 से अधिक केस एक दशक से लंबित

‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है’ (Justice delayed is justice denied)- कानून की यह स्थापित व्यवस्था भारत की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के गलियारों में दम तोड़ती नजर आ रही है। हालिया आंकड़ों ने देश की शीर्ष अदालत की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में 10,000 से अधिक ऐसे मामले लंबित हैं, जो पिछले एक दशक (10 साल) या उससे अधिक समय से फैसले के इंतजार में धूल फांक रहे हैं। यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट को देश में त्वरित और अंतिम न्याय का प्रतीक माना जाता है। बढ़ता हुआ यह न्यायिक भंडार न केवल न्यायपालिका की साख को प्रभावित कर रहा है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे और आम नागरिक के भरोसे को भी झकझोर रहा है।

आंकड़ों की जुबानी: सुप्रीम कोर्ट में पेंडेंसी का भयावह रूप

सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष अदालत में कुल लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 10,000 से अधिक केस ऐसे हैं जो पिछले 10 से 15 वर्षों से लंबित हैं। इनमें से कई मामले संवैधानिक पीठों के हैं, जिनका असर देश की बड़ी आबादी और नीतियों पर पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट में कुल लंबित मुकदमों का आंकड़ा 80,000 के पार पहुंच चुका है। लंबित मामलों में मुख्य रूप से दीवानी (Civil), आपराधिक (Criminal), और विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) शामिल हैं। एक बड़ी संख्या उन मामलों की भी है जिनमें केंद्र या राज्य सरकारें खुद एक पक्षकार हैं। इस भारी पेंडेंसी का सीधा असर उन वादियों पर पड़ रहा है जो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अदालतों के चक्कर काटने में गंवा चुके हैं। कई मामलों में तो मुख्य याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद भी उनके कानूनी उत्तराधिकारी न्याय की उम्मीद में तारीख दर तारीख भुगत रहे हैं।

न्यायिक प्रक्रिया में रुकावटें: आखिर क्यों लग रहा है इतना समय?

सुप्रीम कोर्ट में मामलों के इस कदर लंबित होने के पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह पूरी न्यायिक व्यवस्था में मौजूद कई ढांचागत और प्रक्रियागत कमियों का परिणाम है।

न्यायाधीशों की कमी और स्वीकृत पदों का खाली होना

सबसे बड़ा कारण न्यायाधीशों की संख्या और मुकदमों के अनुपात में भारी अंतर है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के स्वीकृत पद (वर्तमान में 34) हमेशा भरे नहीं रहते। कोलेजियम प्रणाली और सरकार के बीच जजों की नियुक्ति को लेकर होने वाली खींचतान के कारण पदों को भरने में महीनों लग जाते हैं। जब तक नए जजों की नियुक्ति होती है, तब तक लंबित मामलों का ग्राफ और ऊपर जा चुका होता है।

अपीलों की बाढ़ (Frivolous Litigation)

सुप्रीम कोर्ट को मूल रूप से एक संवैधानिक अदालत के रूप में परिकल्पित किया गया था। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह एक ‘नियमित अपील की अदालत’ बनकर रह गया है। निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों (High Courts) के छोटे-छोटे फैसलों, जैसे जमानत याचिका, संपत्ति विवाद या पारिवारिक मामलों के खिलाफ भी लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं। विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) की भारी बाढ़ के कारण संवैधानिक महत्व के बड़े मामलों को सुनने का समय कम पड़ जाता है।

बार-बार स्थगन (Adjournments) की संस्कृति

अदालतों में वकीलों द्वारा विभिन्न आधारों पर मामले को आगे बढ़ाने या स्थगन (तारीख) मांगने की प्रवृत्ति एक गंभीर बीमारी बन चुकी है। कभी वकीलों की अस्वस्थता, कभी दस्तावेजों को पूरा करने की मोहलत, तो कभी लंबी बहसों के कारण मामले सालों-साल खिंचते चले जाते हैं। अदालतें भी अक्सर उदारता दिखाते हुए तारीखें दे देती हैं, जिससे प्रक्रिया बेहद धीमी हो जाती है।

जटिल प्रक्रियागत नियम और बुनियादी ढांचे का अभाव

भारतीय कानूनी प्रक्रिया (सीपीसी और सीआरपीसी) बेहद विस्तृत और जटिल है। नोटिस तामील होने में महीनों लग जाते हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर तकनीक का उपयोग तो बढ़ा है, लेकिन केस मैनेजमेंट (Case Management) की वैज्ञानिक प्रणाली अभी भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। फाइलों के वर्गीकरण और उनकी लिस्टिंग की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी भी देरी का कारण बनती है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: न्याय की भारी कीमत

इस न्यायिक देरी का खामियाजा केवल अदालतों को नहीं, बल्कि पूरे देश को भुगतना पड़ता है। एक आम नागरिक के लिए सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ना आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला होता है। महंगे वकीलों की फीस और दिल्ली आने-जाने का खर्च मध्यम वर्ग को कर्ज के जाल में धकेल देता है।

व्यापार और अर्थव्यवस्था पर असर

वाणिज्यिक विवादों (Commercial Disputes) के सालों तक लंबित रहने के कारण देश में व्यापार का माहौल प्रभावित होता है। विदेशी निवेशक ऐसे देशों में निवेश करने से कतराते हैं जहां अनुबंधों को लागू कराने या विवाद सुलझाने में दशकों लग जाते हैं।

जेलों में बंद विचाराधीन कैदी

आपराधिक मामलों में देरी के कारण हजारों लोग बिना दोष सिद्ध हुए जेलों में सड़ रहे हैं। उनकी जिंदगी के बहुमूल्य वर्ष सलाखों के पीछे सिर्फ इसलिए बीत जाते हैं क्योंकि उनकी अपील पर सुनवाई की बारी नहीं आती।

सुधार के उपाय: कैसे थमेगी मामलों की यह बाढ़?

विशेषज्ञों और विधि आयोग (Law Commission) ने समय-समय पर इस संकट से उबरने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिन्हें सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है-

संवैधानिक और अपीलीय अदालतों का विभाजन

लंबे समय से यह मांग की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट को दो हिस्सों में विभाजित किया जाना चाहिए- एक ‘संवैधानिक पीठ’ जो केवल संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों को देखे, और दूसरी ‘अपीलीय पीठ’ (Courts of Appeal) जो नियमित दीवानी और आपराधिक अपीलों की सुनवाई करे। इससे कार्यभार का सही प्रबंधन हो सकेगा।

क्षेत्रीय पीठों (Regional Benches) की स्थापना

विधि आयोग ने दिल्ली के बाहर चेन्नई, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय पीठें स्थापित करने की सिफारिश की है। इससे दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के लोगों के लिए न्याय सुलभ होगा और दिल्ली स्थित मुख्य अदालत पर बोझ कम होगा।

स्थगन (Adjournments) पर सख्त सीमा

अदालतों को बिना किसी ठोस और असाधारण कारण के स्थगन देने की प्रथा पर पूरी तरह रोक लगानी होगी। एक मामले में अधिकतम कितनी बार तारीख दी जा सकती है, इसकी सीमा तय होनी चाहिए।

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR)

मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) जैसी प्रणालियों को अनिवार्य और मजबूत बनाया जाना चाहिए ताकि मुकदमे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही आपसी सहमति से सुलझ जाएं।

अब ठोस कार्रवाई का समय

सुप्रीम कोर्ट में 10,000 से अधिक मामलों का एक दशक से लंबित रहना हमारी न्याय वितरण प्रणाली की विफलता का एक स्पष्ट संकेतक है। यदि समय रहते इस ‘न्यायिक भंडार’ को खाली करने के लिए क्रांतिकारी कदम नहीं उठाए गए, तो आम जनता का न्यायपालिका पर से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह अनिवार्य है कि सरकार और न्यायपालिका दोनों अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति दिखाएं, ताकि हर नागरिक को समय पर न्याय मिल सके और अदालतें वास्तव में उम्मीद का केंद्र बनी रहें।

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