स्टार प्रचारकों की फौज भी बेअसर, प्रशांत किशोर ने बढ़ा दी सीएम सम्राट की धड़कनें

The CSR Journal Magazine

बिहार में बड़े सियासी उलटफेर का संकेत! बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की धमक, बीजेपी के अभेद्य दुर्ग में हड़कंप

बिहार की राजनीति में आज एक ऐसा भूचाल आया है, जिसने देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे की चूलें हिला दी हैं। पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव 2026 की मतगणना के शुरुआती रुझानों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं तक में हड़कंप मचा दिया है। 1995 से जिस सीट को भाजपा का ‘अभेद्य किला’ माना जाता रहा है, वहां जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) अपने पहले ही प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबले में भाजपा के पसीने छुड़ा रहे हैं।

शुरुआती दौर से ही पीके की मजबूत बढ़त, भाजपा बैकफुट पर

पटना के एएन कॉलेज में आज सुबह 8 बजे कड़ी सुरक्षा और ड्रोन की निगरानी के बीच मतगणना शुरू हुई। डाक मतपत्रों (Postal Ballots) की गिनती से लेकर ईवीएम (EVM) के खुलते ही जो आंकड़े सामने आए, वे चौंकाने वाले थे। चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने पहले ही राउंड से बढ़त बना ली, जो समय के साथ और मजबूत होती गई।

चौथे राउंड की समाप्ति तक

जन सुराज के प्रशांत किशोर को 3,795 से अधिक वोट मिल चुके हैं और वे भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा से 1,145 वोटों की मजबूत बढ़त बनाए हुए हैं। पार्टी के युवा चेहरे नीरज कुमार सिन्हा लगातार पिछड़ रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की उम्मीदवार रेखा गुप्ता (रेखा कुमारी) इस त्रिकोणीय मुकाबले में बहुत पीछे छूट गई हैं और तीसरे नंबर पर सिमट कर रह गई हैं। यह रुझान महज कुछ हजार वोटों का अंतर नहीं, बल्कि बिहार की उस ‘पारंपरिक जातिवादी राजनीति’ के ढहने का संकेत है, जिसे प्रशांत किशोर अपनी पदयात्रा के दौरान लगातार चुनौती दे रहे थे।

बीजेपी के गढ़ में सेंध: क्यों इस सीट की हार-जीत राष्ट्रीय मुद्दा है?

बांकीपुर सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है; यह बिहार में भाजपा की प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा केंद्र है। इस सीट के इतिहास और वर्तमान समीकरण को देखें तो समझ आता है कि यहां पीके की बढ़त ने भाजपा खेमे में इतनी घबराहट क्यों पैदा की है। यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का पारंपरिक क्षेत्र रही है। वे यहां से लगातार 5 बार चुनाव जीत चुके हैं। अप्रैल 2026 में उनके राज्यसभा जाने के बाद ही यह उपचुनाव आवश्यक हुआ था। अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सबसे मजबूत गढ़ में भाजपा का पिछड़ना बेहद चौंकाने वाला है।

सम्राट चौधरी की पहली अग्निपरीक्षा

अप्रैल 2026 में सम्राट चौधरी के बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला बड़ा चुनावी इम्तिहान है। अगर भाजपा यह सीट हारती है, तो मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर भी सवाल उठेंगे। बांकीपुर पारंपरिक रूप से सवर्ण (विशेषकर कायस्थ) बहुल सीट है, जो हमेशा भाजपा का एकमुश्त वोट बैंक रही है। भाजपा ने इसी समीकरण के तहत नीरज कुमार सिन्हा (कायस्थ) को उतारा था। लेकिन ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखने वाले प्रशांत किशोर ने न केवल अपने वर्ग में, बल्कि मुस्लिम, भूमिहार और युवाओं के बीच भी जबरदस्त पैठ बनाई है।

प्रशांत किशोर का चुनावी दांव: रणनीतिकार से ‘जननायक’ बनने की परीक्षा

अक्टूबर 2024 में जन सुराज पार्टी की औपचारिक शुरुआत करने के बाद प्रशांत किशोर ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि, उस समय संगठनात्मक कमजोरियों के कारण पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और बांकीपुर में भी उसे 5% से कम वोट मिले थे।लेकिन पीके हार मानने वाले नहीं थे। जब बांकीपुर उपचुनाव की घोषणा हुई, तो उन्होंने किसी अन्य कार्यकर्ता को उतारने के बजाय खुद सीधे चुनावी मैदान में उतरने का साहसिक फैसला किया। उन्होंने इसे बिहार के शासन मॉडल और वंशवादी राजनीति के खिलाफ एक ‘जनमत संग्रह’ (Referendum) के रूप में पेश किया।

जमीनी पत्रकारों का विश्लेषण

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीके ने इस बार अपनी रणनीति बदली। उन्होंने जातिगत समीकरणों को सीधे चुनौती दी और बिहार के उन बुनियादी मुद्दों (पलायन, शिक्षा, बेरोजगारी) को उठाया, जिनसे आम जनता त्रस्त है। कम मतदान प्रतिशत (34.30%) होना भी यह दर्शाता है कि पारंपरिक भाजपा और राजद के समर्थक वोट देने बाहर नहीं निकले, जबकि जन सुराज के कैडर ने अपने पक्ष में पूरी ताकत झोंक दी।

भाजपा में टिकट वितरण को लेकर मची अंतर्कलह

इस उपचुनाव में भाजपा के पिछड़ने के पीछे पार्टी की आंतरिक गुटबाजी और टिकटों का फेरबदल भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। नामांकन के ठीक बाद भाजपा के मूल घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) ने ‘पारिवारिक कारणों’ का हवाला देकर अचानक अपना नाम वापस ले लिया था। विपक्ष ने इसे भाजपा की ‘डर की राजनीति’ बताया था। इसके बाद आनंद-फानन में युवा मोर्चा के नेता नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया गया। इस आंतरिक खींचतान और स्टार प्रचारकों की भारी फौज (40 स्टार प्रचारक, 200 से अधिक विधायक और दर्जनों मंत्रियों की तैनाती) के बावजूद शुरुआती रुझानों में पार्टी का पिछड़ना यह साफ करता है कि जमीन पर कार्यकर्ताओं का तालमेल ठीक नहीं था।

विपक्ष और राजद की घटती प्रासंगिकता

बिहार में मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के लिए भी यह परिणाम एक बड़ा सबक है। तेजस्वी यादव ने चुनाव से पहले दावा किया था कि उनकी उम्मीदवार रेखा गुप्ता को हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है और नतीजा चौंकाने वाला होगा। लेकिन शुरुआती रुझानों में राजद का तीसरे नंबर पर सिमटना और प्रशांत किशोर से हजारों वोटों से पीछे हो जाना यह साबित करता है कि पटना के शहरी क्षेत्रों में राजद का ‘माय’ (MY) समीकरण बेअसर साबित हुआ है और जनता तीसरे विकल्प के रूप में जन सुराज को तरजीह दे रही है।

मुकाबला अभी बाकी है

बांकीपुर में कुल 31 राउंड की मतगणना होनी है, और अभी मुकाबला शुरुआती दौर में है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और एनडीए नेताओं का दावा है कि जैसे-जैसे ईवीएम के अगले राउंड खुलेंगे, भाजपा अपनी पारंपरिक बढ़त वापस पा लेगी। हालांकि, राजनीति के जानकारों का कहना है कि जीत चाहे किसी की भी हो, प्रशांत किशोर ने भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध लगाकर यह साबित कर दिया है कि बिहार की जनता अब बदलाव चाहती है। यदि पीके यह सीट जीतने में कामयाब रहते हैं, तो यह न केवल जन सुराज के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर होगा, बल्कि 2026-27 के आगामी राजनीतिक परिदृश्य में बिहार के भीतर एक नए ‘तीसरे मोर्चे’ के उदय की आधिकारिक घोषणा होगी।

बिहार की राजनीति का बदलता रुख

बांकीपुर की जनता का यह रुझान पूरे बिहार की भावी राजनीति का ट्रेलर है—जहां अब सिर्फ जाति के नाम पर नहीं, बल्कि काम और विकल्प के नाम पर वोट पड़ रहे हैं। पल-पल बदलते आंकड़ों के बीच पटना के एएन कॉलेज के बाहर जन सुराज के कार्यकर्ताओं का उत्साह और भाजपा खेमे की खामोशी इस वक्त बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी कहानी बयां कर रही है।

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