Global Tiger Day 2026: तकनीक बनी बाघों की नई ‘रक्षक’, AI और कैमरा ट्रैप से मजबूत हो रहा संरक्षण अभियान
दुनिया भर में 29 जुलाई को मनाए जाने वाले ग्लोबल टाइगर डे 2026 के अवसर पर बाघ संरक्षण को नई दिशा देने में आधुनिक तकनीक की भूमिका सबसे प्रमुख विषय बनकर उभरी है। आज बाघों की सुरक्षा केवल वन रक्षकों की गश्त तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि कैमरा ट्रैप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन, जीपीएस आधारित निगरानी, डीएनए विश्लेषण और वैज्ञानिक डेटा मॉनिटरिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकें इस अभियान की रीढ़ बन चुकी हैं। इन तकनीकों की मदद से अब प्रत्येक बाघ की अलग पहचान की जा सकती है, उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है तथा संरक्षण संबंधी निर्णय वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर लिए जा रहे हैं। \
NTCA का बाग संरक्षण अभियान
भारत, जो दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत जंगली बाघों का घर है, पिछले कुछ वर्षों में बाघ संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है। प्रोजेक्ट टाइगर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा विभिन्न राज्य सरकारें आधुनिक तकनीकों को अपनाकर शिकार, अवैध तस्करी और मानव-बाघ संघर्ष जैसी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने का प्रयास कर रही हैं।
कैमरा ट्रैप ने बदली संरक्षण की तस्वीर
पहले बाघों की गणना उनके पैरों के निशान (पगमार्क) और प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर की जाती थी। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होने के साथ-साथ कई बार त्रुटिपूर्ण भी होती थी। अब जंगलों में लगाए गए कैमरा ट्रैप सेंसर के माध्यम से जैसे ही कोई बाघ गुजरता है, उसकी तस्वीर स्वतः रिकॉर्ड हो जाती है। बाघ के शरीर पर मौजूद धारियों (Stripes) का पैटर्न मनुष्य के फिंगरप्रिंट की तरह प्रत्येक बाघ में अलग होता है। यही कारण है कि कैमरा ट्रैप से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर प्रत्येक बाघ की सटीक पहचान संभव हो जाती है। इससे यह भी पता चलता है कि कोई बाघ किस क्षेत्र में रहता है, कितनी दूरी तय करता है और उसका क्षेत्र (Territory) कितना बड़ा है।
AI कर रहा है लाखों तस्वीरों का विश्लेषण
जंगलों में लगाए गए हजारों कैमरा ट्रैप प्रतिदिन लाखों तस्वीरें रिकॉर्ड करते हैं। पहले इन तस्वीरों की मैन्युअल जांच में महीनों लग जाते थे। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सॉफ्टवेयर कुछ ही मिनटों में तस्वीरों का विश्लेषण कर लेते हैं। AI यह पहचान सकता है कि तस्वीर में कौन-सा बाघ है, उसकी उम्र का अनुमान क्या है, वह नर है या मादा, उसके साथ शावक हैं या नहीं तथा उसकी शारीरिक स्थिति कैसी दिखाई दे रही है। इससे वन विभाग को संरक्षण संबंधी निर्णय तेजी और सटीकता से लेने में मदद मिलती है।
वैज्ञानिक मॉनिटरिंग से मिल रही वास्तविक तस्वीर
आधुनिक संरक्षण केवल तस्वीरों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक अब डीएनए विश्लेषण, मल (Scat) के नमूने, बाल, पदचिह्न, शिकार की उपलब्धता और जंगल की पारिस्थितिकी का संयुक्त अध्ययन करते हैं। इन आंकड़ों से यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी क्षेत्र में बाघों की संख्या क्यों बढ़ रही है या घट रही है, किन इलाकों में भोजन की कमी है और किन क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप अधिक हो रहा है। इसी आधार पर भविष्य की संरक्षण योजनाएं तैयार की जाती हैं।
GPS और रेडियो कॉलर से हर गतिविधि पर नजर
कुछ बाघों को वैज्ञानिक अध्ययन के लिए रेडियो कॉलर या GPS कॉलर पहनाए जाते हैं। इनसे उनकी वास्तविक समय (Real Time) में लोकेशन प्राप्त होती रहती है। इस तकनीक से यह जानकारी मिलती है कि बाघ किस मार्ग से गुजरते हैं, कौन-से वन गलियारे (Wildlife Corridors) उनके लिए महत्वपूर्ण हैं और वे किन गांवों या मानव बस्तियों के निकट पहुंच रहे हैं। इससे समय रहते वन विभाग आवश्यक कदम उठाकर मानव-बाघ संघर्ष को कम कर सकता है।
ड्रोन और थर्मल कैमरे बने नए प्रहरी
घने जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में निगरानी के लिए अब ड्रोन तथा थर्मल इमेजिंग कैमरों का उपयोग भी बढ़ रहा है। रात के समय भी ये उपकरण मानव गतिविधियों और संदिग्ध शिकारियों का पता लगाने में सक्षम हैं। इन तकनीकों की सहायता से वन अधिकारियों को बिना जंगल में अधिक मानव हस्तक्षेप किए व्यापक निगरानी करने में सुविधा मिलती है।
शिकार रोकने में तकनीक की बड़ी भूमिका
बाघों के लिए सबसे बड़ा खतरा अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी है। इसे रोकने के लिए कई टाइगर रिजर्व में डिजिटल पेट्रोलिंग सिस्टम, मोबाइल एप, वायरलेस संचार नेटवर्क, जीआईएस मैपिंग और इन्फ्रारेड निगरानी उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है। वन रक्षक अपने गश्ती मार्ग, संदिग्ध गतिविधियों और वन्यजीवों की जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज करते हैं। इससे किसी भी असामान्य गतिविधि पर तत्काल कार्रवाई संभव हो जाती है।
भारत बना वैश्विक उदाहरण
भारत ने वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी। आज देश में 58 से अधिक टाइगर रिजर्व हैं और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) आधुनिक तकनीकों के उपयोग के माध्यम से संरक्षण कार्यों का समन्वय करता है। भारत की बाघ संरक्षण रणनीति को विश्व स्तर पर एक सफल मॉडल माना जाता है।
महाराष्ट्र भी तकनीकी संरक्षण पर दे रहा जोर
ग्लोबल टाइगर डे 2026 के अवसर पर महाराष्ट्र सरकार नागपुर में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इस दौरान बाघ संरक्षण में नई तकनीकों, वैज्ञानिक शोध, वन प्रबंधन और भविष्य की नीतियों पर चर्चा की जाएगी। राज्य सरकार “नागपुर टाइगर डिक्लेरेशन 2026” के आधार पर नई संरक्षण नीति तैयार करने की दिशा में भी काम कर रही है।
चुनौतियां अभी भी बरकरार
हालांकि तकनीक ने संरक्षण कार्यों को मजबूत बनाया है, लेकिन बाघों के सामने कई गंभीर चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। जंगलों का सिकुड़ना, अवैध शिकार, वन्यजीव तस्करी, जलवायु परिवर्तन, मानव-बाघ संघर्ष और वन गलियारों का बाधित होना आज भी बड़ी समस्याएं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है; स्थानीय समुदायों की भागीदारी, मजबूत कानून, वैज्ञानिक अनुसंधान और सतत वन प्रबंधन भी उतने ही आवश्यक हैं।
संरक्षण का नया युग
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य का बाघ संरक्षण “डेटा आधारित संरक्षण” (Data-driven Conservation) होगा। कैमरा ट्रैप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डीएनए अनुसंधान, उपग्रह आधारित निगरानी और आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण मिलकर ऐसे निर्णय लेने में मदद करेंगे जो पहले संभव नहीं थे। ग्लोबल टाइगर डे 2026 का संदेश भी यही है कि यदि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज की भागीदारी साथ आएं, तो बाघों और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने का लक्ष्य अधिक प्रभावी ढंग से हासिल किया जा सकता है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections.
Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast,
crisp, clean updates!
Google Play Store –

