42 डिग्री में राजस्थान में अग्नि तपस्या कर रही रूसी योगिनी: अन्नपूर्णा नाथ की अद्वितीय साधना

The CSR Journal Magazine
गर्मी की वजह से पसीने से तर-बतर, भारतीय मिट्टी की महक में खोई एक विदेशी महिला, अन्नपूर्णा नाथ, अग्नि तपस्या कर रही हैं। यह नजारा राजस्थान के पुष्कर में स्थित अपने गुरु के आश्रम में देखा गया। अन्नपूर्णा ने नाथ संप्रदाय से दीक्षा लेने के बाद से अपनी साधना में जुटी हैं। 3 मई से शुरू हुई यह अग्नि तपस्या 25 मई तक चलने वाली है। उनकी तपस्या का समय रोजाना सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक है।

ध्यान और तपस्या का कठिन सफर

पुष्कर से लगभग 12 किलोमीटर दूर, संत बाबा सीताराम दास के समाधि स्थल पर अन्नपूर्णा नाथ की साधना चल रही है। इस स्थल पर जाने के लिए श्रद्धालुओं को चुप रहना पड़ता है, वरना उनकी ध्यान साधना भंग हो सकती है। जहाँ एक ओर गर्मी का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस है, वहीं दूसरी ओर, चारों ओर उठती आग की लपटें और भस्म में लिपटी अन्नपूर्णा अपनी साधना में लीन हैं।

कैसे कर पाती हैं इतनी गर्मी में तप?

योगिनी अन्नपूर्णा से बातचीत के दौरान, जब पूछा गया कि इतनी गर्मी में कैसे तप कर रही हैं, तो उन्होंने उत्तर दिया कि “आपको इस साधना में आकर खुद अनुभव करना होगा।” उनका कहना था कि तपस्या का अनुभव अद्भुत है और यह साधना प्राकृतिक रूप से होती है।

भारत की मिट्टी का जादू

रूस से आईं अन्नपूर्णा ने बताया कि भारत की मिट्टी का अनुभव उन्हें सबसे अधिक आकर्षित करता है। वे यहां के आध्यात्मिक वातावरण को बेहद प्रगाढ़ता से महसूस करती हैं। अन्नपूर्णा नाथ ने वर्ष 2005 में भारत का पहला दौरा किया और 2016 में नाथ संप्रदाय से जुड़ गईं।

नाथ संप्रदाय की दीक्षा और उनका अनुभव

योगिनी ने बताया कि नाथ संप्रदाय में दीक्षा लेने की प्रक्रिया काफी प्रतिबंधित है। एक महिला को दीक्षा देने पर दंड भी देना पड़ता है। पहले जहां दंड 11 हजार रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 2.5 लाख रुपये हो गया है। अन्न पूर्णा का कहना है कि साधना सिर्फ व्यक्तिगत शांति के लिए होती है, जिसके परिणाम सभी को देखने को मिलते हैं।

साधना का गूढ़ रहस्य

अन्नपूर्णा नाथ ने अपनी दिनचर्या के बारे में बताया कि वह इसे साझा नहीं कर सकतीं, क्योंकि यह व्यक्तिगत अनुभव है। उनके गुरु दीपक नाथ ने बताया कि अग्नि तपस्या आमतौर पर गर्मियों के महीनों में की जाती है और इसका उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति और साधना है।

पश्चिमी रूस की साध्वी का अद्वितीय अनुभव

योगिनी अन्नपूर्णा ने भारत में अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उनकी पहचान एक जर्नलिस्ट के तौर पर थी पर अब वह अपने आध्यात्मिक पथ पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। 21 साल पहले पहली बार भारत आने वाली अन्नपूर्णा ने बताया कि इस यात्रा ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया।

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