करंट दिया, छाती पर डंडे मारे, लड़कियों के कपड़े तक फाड़े’-सपा सांसद डिंपल यादव के आरोपों से गरमाई राजनीति, पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के बाद देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। संसद के मानसून सत्र के दौरान आयोजित इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में छात्र, युवा और पार्टी समर्थक शामिल हुए। प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प, लाठीचार्ज, आंसू गैस के इस्तेमाल तथा हिरासत में लिए जाने की घटनाओं के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर तीखा हमला बोला है।
डिंपल ने लगाए गंभीर आरोप
समाजवादी पार्टी की सांसद और पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने संसद परिसर के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया। उनके अनुसार कुछ छात्रों को कथित तौर पर बिजली का झटका (इलेक्ट्रिक शॉक) दिया गया, कई छात्रों की छाती पर डंडों से प्रहार किया गया तथा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ भी अभद्र व्यवहार हुआ, जिसमें कुछ छात्राओं के कपड़े तक फट गए।
डिंपल यादव ने क्या कहा?
मीडिया से बातचीत के दौरान डिंपल यादव ने कहा कि 20 जुलाई का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक “काले दिन” के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया जिसकी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों को बुरी तरह पीटा। उनके अनुसार कुछ पुलिसकर्मियों की आंखों में शर्म दिखाई दे रही थी, लेकिन ड्यूटी के दौरान उन्होंने अपने नाम वाले बैज तक हटा दिए।
छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार
डिंपल यादव ने आरोप लगाया कि कुछ पुलिसकर्मी “गुंडों जैसा व्यवहार” कर रहे थे जबकि कुछ अन्य सहयोगात्मक रवैया अपना रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों के विपरीत छात्रों की छाती पर डंडों से वार किए गए और कथित तौर पर कुछ लोगों को इलेक्ट्रिक शॉक भी दिए गए। डिंपल यादव ने महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए कहा कि छात्राओं के कपड़े तक फट गए, जो अत्यंत गंभीर और शर्मनाक घटना है।
प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ?
‘CJP संसद चलो’ मार्च के लिए हजारों प्रदर्शनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर और आसपास के क्षेत्रों में एकत्र हुए थे। प्रदर्शनकारियों का उद्देश्य संसद की ओर मार्च निकालकर अपनी मांगों को सरकार के सामने रखना था। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों और संसद क्षेत्र में लागू निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आंसू गैस के गोले छोड़े गए तथा कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
डिंपल यादव के आरोपों के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और यदि प्रदर्शनकारी हिंसा नहीं कर रहे थे तो उन पर इस प्रकार बल प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। विपक्षी नेताओं ने मांग की कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी पुलिसकर्मी ने अधिकारों का दुरुपयोग किया है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
पुलिस का पक्ष
दिल्ली पुलिस ने पूरे घटनाक्रम पर कहा है कि संसद क्षेत्र की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता थी और प्रदर्शनकारियों को निर्धारित सीमा से आगे बढ़ने से रोका गया। पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए। जहां तक डिंपल यादव द्वारा लगाए गए विशिष्ट आरोप, जैसे इलेक्ट्रिक शॉक देना, छाती पर जानबूझकर प्रहार करना या महिला प्रदर्शनकारियों के कपड़े फाड़ने का सवाल है, समाचार लिखे जाने तक पुलिस ने इन आरोपों की पुष्टि नहीं की थी।
मानवाधिकार संगठनों की चिंता
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका मानना है कि पुलिस को भीड़ नियंत्रण के दौरान निर्धारित मानकों और मानवाधिकारों का पालन करना चाहिए। विशेष रूप से यदि महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार या अनावश्यक हिंसा के आरोप सामने आते हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है ताकि दोषी पाए जाने पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
लोकतांत्रिक अधिकार और पुलिस की जिम्मेदारी
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। वहीं प्रशासन की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की होती है। ऐसे में किसी भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों से संयम और कानूनी मर्यादाओं के पालन की अपेक्षा की जाती है। लोगों का मानना है कि बड़े प्रदर्शनों में संवाद, पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था और न्यूनतम बल प्रयोग की नीति अपनाने से टकराव की स्थिति को काफी हद तक रोका जा सकता है।
राजनीतिक असर
‘CJP संसद चलो’ मार्च के बाद शुरू हुआ यह विवाद संसद के मानसून सत्र में भी गूंजने की संभावना है। विपक्ष इस मुद्दे को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पुलिस कार्रवाई से जोड़कर सरकार को घेरने की तैयारी में है। वहीं सरकार और प्रशासन का कहना है कि संसद की सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
क्या छात्रों को मिलेगा न्याय
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इन आरोपों की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाएगी, क्या पीड़ितों की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज होगी और क्या इस पूरे मामले पर संसद के भीतर भी विस्तृत चर्चा होगी। फिलहाल यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections.
Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast,
crisp, clean updates!
Google Play Store –

