असम की अंजलि सैकिया: इंसानियत की वह मिसाल, जो अब NCERT की किताबों में पढ़ाई जाएगी

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असम की अंजलि सैकिया बनीं मानवता की मिसाल, NCERT में शामिल हुई उनकी कहानी

असम। दया, करुणा और मानवता की अनगिनत कहानियाँ दुनिया में सुनने को मिलती हैं, लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो समय बीतने के बाद भी लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। असम के नगांव जिले की रहने वाली अंजलि सैकिया की कहानी भी ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल है। वर्ष 2009 में उन्होंने अपने छह महीने के बेटे के साथ एक मात्र 15 दिन के घायल और अनाथ एशियन पाम सिवेट (कस्तूरी बिलाव) के बच्चे को अपना दूध पिलाकर उसकी जान बचाई थी। आज, 17 वर्ष बाद, यही सच्ची घटना देशभर के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है और NCERT की कक्षा 10 की अंग्रेजी वर्कबुक में शामिल की गई है।

कैसे शुरू हुई यह अनोखी कहानी

साल 2009 में असम के नगांव जिले के कांपुर क्षेत्र के एक गांव में नारियल के पेड़ से लगभग 15 दिन का एक एशियन पाम सिवेट का शावक नीचे गिर गया। उसकी मां का कोई पता नहीं था और वह गंभीर रूप से घायल तथा भूखा था। गांव वालों ने वन्यजीव संरक्षण से जुड़े धरनी सैकिया को इसकी सूचना दी। वे उस मासूम जीव को अपने घर ले आए। घर पहुंचने पर सबसे बड़ी चुनौती उसके भोजन की थी। उस समय धरनी सैकिया की पत्नी अंजलि अपने छह महीने के बेटे गिबोन सैकिया को स्तनपान करा रही थीं। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने वही ममता उस अनाथ वन्यजीव पर भी लुटाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने बेटे के साथ उस सिवेट के बच्चे को भी स्तनपान कराया, जिससे उसकी जान बच गई।

‘भकत’ बना परिवार का सदस्य

परिवार ने उस सिवेट शावक का नाम ‘भकत’ रखा। धीरे-धीरे वह घर का अभिन्न हिस्सा बन गया। वह परिवार के साथ खेलता, बच्चों के साथ सोता, घर में स्वतंत्र रूप से घूमता और सभी का चहेता बन गया। विशेष रूप से गिबोन और भकत के बीच गहरी दोस्ती हो गई थी। दोनों साथ खेलते और एक-दूसरे से अलग नहीं रहते थे। भकत केवल एक पालतू जानवर नहीं रहा, बल्कि परिवार के तीसरे बच्चे की तरह उसकी देखभाल की गई। उसे दूध, फल, चावल, मछली और अन्य उपयुक्त भोजन दिया जाता था, जिससे वह स्वस्थ और मजबूत बन सका।

फिर लौट गया अपने प्राकृतिक घर

करीब कुछ महीनों तक परिवार के साथ रहने के बाद जब भकत पूरी तरह स्वस्थ और आत्मनिर्भर हो गया, तब उसे वापस जंगल में छोड़ दिया गया, ताकि वह अपने प्राकृतिक वातावरण में जीवन व्यतीत कर सके। परिवार के लिए यह भावुक पल था, लेकिन उन्होंने प्रकृति के नियमों का सम्मान करते हुए उसे स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर दिया।

डॉक्यूमेंट्री ने पहुंचाई कहानी दुनिया तक

इस अनोखी घटना ने बाद में कई लोगों का ध्यान आकर्षित किया। वन्यजीव और मानव के बीच प्रेम और सह-अस्तित्व की इस दुर्लभ कहानी पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई, जिसके माध्यम से यह प्रेरक घटना देश और दुनिया तक पहुंची। धीरे-धीरे यह कहानी पर्यावरण संरक्षण और मानवीय संवेदनाओं की मिसाल बन गई।

17 साल बाद मिली सबसे बड़ी पहचान

हाल ही में सैकिया परिवार को तब आश्चर्य हुआ, जब उनके बेटे गिबोन ने अपनी NCERT कक्षा 10 की अंग्रेजी वर्कबुक में अपने बचपन की यही कहानी पढ़ी। परिवार के लिए यह किसी सम्मान से कम नहीं था। धरनी सैकिया ने इसे “किसी भी पुरस्कार से बड़ा सम्मान” बताया, क्योंकि अब यह घटना देशभर के लाखों विद्यार्थियों को करुणा, जीवों के प्रति संवेदनशीलता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश दे रही है।

एशियन पाम सिवेट क्या है?

एशियन पाम सिवेट, जिसे हिंदी में कस्तूरी बिलाव कहा जाता है, एक निशाचर (रात में सक्रिय) स्तनधारी वन्यजीव है। यह मुख्य रूप से फल, छोटे जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े और पक्षियों के अंडे खाता है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों सहित दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों में यह पाया जाता है। यह जंगलों के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह बीजों के प्रसार में भी सहायक होता है।

बच्चों को क्या सिखाएगी यह कहानी?

NCERT द्वारा इस घटना को पाठ्यक्रम में शामिल करने का उद्देश्य केवल एक प्रेरक प्रसंग सुनाना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों में निम्नलिखित मूल्यों का विकास करना भी है—

समाज के लिए एक प्रेरणा

आज जब मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएँ बढ़ रही हैं, ऐसे समय में अंजलि सैकिया की यह कहानी यह संदेश देती है कि प्रेम, संवेदना और करुणा किसी भी प्रजाति की सीमाओं में बंधी नहीं होती। एक मां की ममता ने न केवल एक मासूम वन्यजीव को नया जीवन दिया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मानवता का ऐसा पाठ लिख दिया, जिसे अब पूरे देश के बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ेंगे।

मानवीय मूल्यों का प्रेरक अध्याय

अंजलि सैकिया की यह कहानी केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि मनुष्य प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील बने, तो सह-अस्तित्व की एक सुंदर और संतुलित दुनिया का निर्माण संभव है। यही कारण है कि यह घटना आज शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों का एक प्रेरक अध्याय बन चुकी है।

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