मेड इन इंडिया माचा टी से असम ने खोले प्रीमियम चाय निर्यात के नए द्वार

The CSR Journal Magazine

असम ने रचा इतिहास: भारत में पहली बार व्यावसायिक स्तर पर तैयार हुई ‘माचा टी’, ₹3,000 प्रति किलो में बिकी पहली खेप

भारत की चाय राजधानी माने जाने वाले असम ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम दर्ज कर ली है। राज्य ने देश में पहली बार व्यावसायिक स्तर पर माचा (Matcha) चाय का उत्पादन कर नया इतिहास रच दिया है। जुलाई 2026 में तैयार हुई पहली 5 किलोग्राम की खेप गुवाहाटी टी ऑक्शन सेंटर (GTAC) में ₹3,000 प्रति किलोग्राम की कीमत पर नीलाम हुई। यह उपलब्धि न केवल असम की चाय उद्योग के लिए, बल्कि पूरे भारतीय कृषि एवं निर्यात क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है। यह प्रीमियम गुणवत्ता वाली माचा चाय तिनसुकिया जिले के छोटा तिंगराई टी एस्टेट में तैयार की गई है। इस परियोजना के पीछे लगभग दस वर्षों का भारत-जापान सहयोग है, जिसके तहत जापानी चाय विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने असम के चाय बागानों के साथ मिलकर माचा उत्पादन की आधुनिक तकनीक विकसित की।

क्या है माचा टी?

माचा (Matcha) जापान की पारंपरिक पाउडर ग्रीन टी है, जिसे सामान्य ग्रीन टी की तरह केवल पत्तियों को उबालकर नहीं बनाया जाता। इसके लिए विशेष प्रकार की चाय की पत्तियों को तोड़ने से पहले कई सप्ताह तक छाया (Shade) में उगाया जाता है। इससे पत्तियों में क्लोरोफिल और अमीनो एसिड की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे उनका रंग गहरा हरा हो जाता है। इसके बाद पत्तियों को भाप देकर सुखाया जाता है, उनकी डंठल और नसें अलग की जाती हैं और फिर विशेष पत्थर की चक्कियों अथवा आधुनिक मशीनों से अत्यंत महीन पाउडर में बदला जाता है। यही पाउडर माचा कहलाता है। इसे गर्म पानी में फेंटकर सीधे पिया जाता है, इसलिए इसमें चाय की पूरी पत्ती का पोषण मिलता है।

जापान से भारत तक का सफर

माचा का इतिहास लगभग 800 वर्ष पुराना माना जाता है। इसका व्यापक विकास जापान में हुआ और यह वहां की प्रसिद्ध टी सेरेमनी (Tea Ceremony) का प्रमुख हिस्सा बन गई। आज भी उच्च गुणवत्ता वाली माचा का सबसे बड़ा उत्पादक जापान ही है। हाल के वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और सोशल मीडिया के प्रभाव से माचा की मांग पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ी है। अमेरिका, यूरोप, मध्य-पूर्व और एशिया के कई देशों में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। इसी बढ़ती मांग को देखते हुए असम ने इस नए बाजार में प्रवेश किया है।

दस वर्षों की मेहनत लाई रंग

छोटा तिंगराई टी एस्टेट के निदेशक के अनुसार, इस उपलब्धि के पीछे लगभग एक दशक का निरंतर शोध, परीक्षण और तकनीकी सहयोग है। जापान के विशेषज्ञों ने असम की जलवायु और मिट्टी के अनुसार माचा उत्पादन की प्रक्रिया विकसित करने में मदद की। इस दौरान—
  • जापानी कृषि विशेषज्ञों ने विशेष प्रशिक्षण दिया।
  • अत्याधुनिक पूर्णतः स्वचालित प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की गई।
  • जापानी मशीनों और तकनीक का उपयोग किया गया।
  • कई वर्षों तक गुणवत्ता परीक्षण किए गए।
  • अंततः अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पहली व्यावसायिक खेप तैयार की गई।

पहली खेप की शानदार नीलामी

जुलाई 2026 में तैयार हुई पहली 5 किलोग्राम की खेप को गुवाहाटी टी ऑक्शन सेंटर में नीलाम किया गया। इसे ₹3,000 प्रति किलोग्राम की कीमत मिली, जो इस नए उत्पाद के प्रति बाजार की सकारात्मक प्रतिक्रिया को दर्शाता है। हालांकि असम की कुछ विशेष चाय पहले भी लाखों रुपये प्रति किलो तक बिक चुकी हैं, लेकिन माचा श्रेणी में यह भारत की पहली व्यावसायिक बिक्री है और इसे ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने जताई खुशी

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि अब दुनिया भर में लोकप्रिय माचा चाय का उत्पादन असम में भी होगा। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत-जापान की मजबूत साझेदारी का परिणाम है और इससे वैश्विक बाजार में “ब्रांड असम टी” को नई पहचान मिलेगी।

असम की चाय उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

असम दुनिया भर में अपनी मजबूत स्वाद वाली ब्लैक टी के लिए प्रसिद्ध है। अब तक यहां मुख्य रूप से—
  • सीटीसी (CTC) चाय
  • ऑर्थोडॉक्स चाय
  • ग्रीन टी
का उत्पादन होता रहा है। माचा उत्पादन शुरू होने से असम अब प्रीमियम और हाई-वैल्यू टी सेगमेंट में भी प्रवेश कर चुका है। इससे राज्य के चाय उद्योग को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

किसानों और उद्योग को होगा बड़ा लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि माचा उत्पादन से—
  • किसानों को अधिक मूल्य मिलेगा।
  • निर्यात के नए अवसर खुलेंगे।
  • जापान पर आयात निर्भरता कम होगी।
  • भारत में हेल्थ ड्रिंक बाजार को बढ़ावा मिलेगा।
  • युवाओं के लिए नई रोजगार संभावनाएं बनेंगी।
  • चाय उद्योग में तकनीकी आधुनिकीकरण को गति मिलेगी।

स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहद खास

माचा को दुनिया के सबसे स्वास्थ्यवर्धक पेयों में शामिल किया जाता है। इसमें—
  • एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा सामान्य ग्रीन टी से कहीं अधिक होती है।
  • कैटेचिन (Catechins) प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
  • एल-थीनिन (L-Theanine) मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
  • यह मेटाबॉलिज्म बढ़ाने और ऊर्जा देने में भी लोकप्रिय है।
इसी कारण फिटनेस और वेलनेस उद्योग में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

वैश्विक बाजार में नई पहचान

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में माचा की मांग तेज़ी से बढ़ी है। जापान में सीमित उत्पादन और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग के कारण कई देशों में इसकी उपलब्धता प्रभावित हुई है। ऐसे समय में भारत का माचा उत्पादन शुरू होना वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भविष्य की संभावनाएं

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि असम में माचा उत्पादन का विस्तार होता है तो भारत आने वाले वर्षों में विश्व के प्रमुख माचा उत्पादक देशों में शामिल हो सकता है। इससे—
  • “मेक इन इंडिया” को मजबूती मिलेगी,
  • कृषि आधारित निर्यात बढ़ेगा,
  • भारत-जापान तकनीकी सहयोग और मजबूत होगा,
  • तथा वैश्विक प्रीमियम चाय बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी।

मेड इन इंडिया माचा टी की शुरुआत

असम द्वारा भारत की पहली व्यावसायिक माचा चाय का सफल उत्पादन केवल एक नई चाय किस्म की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय चाय उद्योग के आधुनिकीकरण, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। छोटा तिंगराई टी एस्टेट की यह सफलता यह साबित करती है कि परंपरागत चाय उत्पादन के साथ आधुनिक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को जोड़कर भारत वैश्विक प्रीमियम पेय बाजार में नई पहचान बना सकता है। आने वाले वर्षों में यह उपलब्धि भारतीय चाय उद्योग के लिए एक नए स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत साबित हो सकती है।

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