पंजाब का ‘जिंदा शहीद’: शहीद दोस्त की याद में बदल दी जिंदगी

The CSR Journal Magazine
15 अगस्त का दिन जब पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब पंजाब के पठानकोट में एक व्यक्ति ने शहीदों की यादों को संजो रखा है। ये हैं कुंवर रविंदर सिंह विक्की, जिन्हें ‘जिंदा शहीद’ के नाम से जाना जाता है। विक्की ने शहीदों के अंतिम विदाई के समय में शहीद परिवारों के साथ खड़े रहने का संकल्प लिया। उनके अनुसार, 400 से अधिक शहीदों की अंतिम यात्राओं में शामिल होने का अनुभव उन सभी यादों को ताजा करता है।

शहीद परिवारों के लिए संघर्ष की कहानी

विक्की के जीवन का मोड़ तब आया जब उनके दोस्त लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया, जो 23 पंजाब रेजीमेंट में तैनात थे, शहीद हो गए। गुरदीप ने कहा था, “मौत ऐसी हो, जिसे पीढ़ियां याद रखें।” इस बात ने विक्की को सोचने पर मजबूर किया कि ऐसे परिवारों के साथ कौन खड़ा होगा, जिनका इकलौता बेटा शहीद हो गया। इसी के बाद उन्होंने शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद की स्थापना की।

5,000 से अधिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम

विक्की और उनकी टीम ने तीन दशकों में 5,000 से अधिक श्रद्धांजलि और देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित किए हैं। वे हर साल लगभग 200 शहीद सैनिकों के बलिदान दिवस का आयोजन करते हैं। अपने प्रयासों से उन्होंने 300 से अधिक शहीद परिवारों को अपनाया है और गुरदासपुर और पठानकोट में कई सरकारी स्कूलों और स्मारकों के नाम शहीदों के नाम पर रखवाने में योगदान दिया है।

पहली जीत: स्कूल का नाम बदलवाना

संस्था का पहला बड़ा कदम था लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया के नाम पर सरकारी स्कूल का नामकरण। इस मुद्दे पर काफी संघर्ष किए गए और अंततः स्कूल का नाम बदलकर ‘शहीद लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया मेमोरियल सीनियर सेकेंडरी स्कूल’ रखा गया।

अशोक चक्र विजेता की बहन का संघर्ष

लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह की शहादत के बाद उनकी बहन ज्योत्सना को नौकरी दिलाने के लिए विक्की ने कानूनी लड़ाई लड़ी। अंततः ज्योत्सना को एसडीएम की नौकरी मिली, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

सम्मान और पहचान का सफर

विक्की को 2001 में ‘बिना वर्दी का सैनिक’ और ‘जिंदा शहीद’ के नाम से सम्मानित किया गया। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा, सेना की तरफ से और कई अन्य संगठनों से भी सम्मान मिला है।

शहीद परिवारों के लिए भावनात्मक समर्पण

विक्की का मानना है कि शहीद परिवारों को केवल आर्थिक मदद नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें साहस और भावनात्मक समर्थन की भी जरूरत है। उनकी अंतिम इच्छा है कि वे अपनी अंतिम सांस भी शहीद की मां के आंसू पोंछते हुए लें। उनका समर्पण इस बात का प्रतीक है कि जब भी जरूरत हो, विक्की हमेशा ‘जिंदा शहीद’ की तरह शहीद परिवारों के साथ खड़े रहेंगे।

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