पुणे कोर्ट से दिल्ली तक गरमाई राजनीति; सावरकर के पड़पोते ने नेहरू को घेरा, राष्ट्रवाद पर छिड़ी बहस

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सावरकर मानहानि केस; पड़पोते ने नेहरू को बताया ब्रिटिश समर्थक, नेहरू का विरोध और सावरकर का समर्पण

स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के पड़पोते सात्यकि ने मंगलवार को पुणे की विशेष अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले में महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने दावा किया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ थे और ब्रिटिश समर्थक नीतियों को अपनाया था। यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब राजनीति में सभी की नजरें इस मामले पर केंद्रित हैं।

बहस का मुद्दा बना इतिहास

स्वाधीनता संग्राम के दो सबसे ध्रुवीय व्यक्तित्वों, पंडित जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रतावीर विनायक दामोदर सावरकर के वैचारिक मतभेद एक बार फिर सार्वजनिक बहस और अदालती गलियारों के केंद्र में हैं। हाल ही में वीर सावरकर के पड़पोते सात्यकि सावरकर द्वारा दर्ज कराए गए मानहानि मामले ने इस ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता को समकालीन राजनीति के शीर्ष पर ला दिया है। सात्यकि सावरकर ने नेहरू और उनके वंशजों की विचारधारा पर तीखा हमला बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू को ‘ब्रिटिश समर्थक’ करार दिया है। इस बयान के बाद देश के इतिहास, सावरकर के माफीनामों (दया याचिकाओं) और नेहरू के राष्ट्रवाद को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।

अदालती विवाद और ‘ब्रिटिश समर्थक’ का बयान

विवाद की शुरुआत कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा ब्रिटेन और भारत में दिए गए उन बयानों से हुई, जिनमें उन्होंने दावा किया था कि सावरकर ने अंग्रेजों से डरकर माफी मांगी थी और वे महात्मा गांधी व नेहरू की तरह साहसी नहीं थे। इस पर आपत्ति जताते हुए वीर सावरकर के पड़पोते सात्यकि सावरकर ने पुणे की अदालत में आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया। अदालती कार्यवाही और मीडिया वार्ताओं के दौरान सात्यकि सावरकर ने एक बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने इतिहास के दस्तावेजों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जवाहरलाल नेहरू की नीतियां और उनका पूरा परिवार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत के प्रति नरम रुख रखता था। सात्यकि ने आरोप लगाया कि नेहरू को अंग्रेजों ने वह कठोर यातनाएं कभी नहीं दीं जो सावरकर को अंडमान की सेलुलर जेल में झेलनी पड़ीं। उन्होंने नेहरू को ‘ब्रिटिश हितों का अनौपचारिक रक्षक’ बताते हुए कहा कि नेहरू ने भारत की रक्षा और विदेश नीति को ब्रिटिश ढांचे के तहत ही आगे बढ़ाया, जबकि सावरकर का लक्ष्य पूर्ण स्वराज और हिंदू राष्ट्रवाद था।

सावरकर का ‘समर्पण’ या रणनीतिक कदम?

सावरकर के आलोचक, विशेषकर वामपंथी और कांग्रेसी विचारक, हमेशा 1911 से 1920 के बीच अंडमान जेल से अंग्रेजों को लिखे गए उनके पत्रों को ‘कायरता और समर्पण’ का प्रतीक बताते हैं। लेकिन सावरकर के समर्थक और दक्षिणपंथी इतिहासकार इसे एक अलग नजरिए से देखते हैं।

सेलुलर जेल की अमानवीय यातनाएं

सावरकर को नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या की साजिश और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में दोहरे आजीवन कारावास (50 वर्ष) की सजा सुनाई गई थी। अंडमान की सेलुलर जेल (काला पानी) में उन्हें कोल्हू से तेल निकालने, एकांत कारावास में रहने और बेड़ियों में जकड़े रहने जैसी अमानवीय यातनाएं दी गईं। इतिहासकारों का मानना है कि जेल के भीतर रहकर घुट-घुट कर मरने के बजाय सावरकर ने बाहर निकलकर देश के लिए काम करने की रणनीति बनाई।

दया याचिका या ‘शिवाजी महाराज की रणनीति’?

सावरकर ने अपने पत्रों में ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने की बात लिखी थी। सात्यकि सावरकर और अन्य इतिहासकारों का तर्क है कि यह कोई समर्पण नहीं, बल्कि छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा औरंगजेब की जेल से भागने या समझौते करने जैसी एक कूटनीतिक चाल (जेल-मुक्ति की रणनीति) थी। सावरकर का मानना था कि एक राजनीतिक कैदी का कर्तव्य जेल में सड़ना नहीं, बल्कि किसी भी तरह बाहर आकर अपनी मातृभूमि की सेवा करना है। 1924 में जब उन्हें रत्नागिरी में नजरबंद किया गया, तो उन्होंने छुआछूत विरोधी आंदोलन और हिंदू संगठन के काम में खुद को झोंक दिया।

नेहरू का सावरकर विरोध: वैचारिक खाई

पंडित जवाहरलाल नेहरू और वीर सावरकर के बीच का विरोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरी तरह वैचारिक और दार्शनिक था। ये दोनों नेता भारत के भविष्य की दो अलग-अलग दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते थे।

धर्मनिरपेक्षता बनाम हिंदुत्व

नेहरू एक बहुसांस्कृतिक, धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक लोकतांत्रिक भारत के पक्षधर थे, जहां धर्म राज्य के कामकाज से अलग रहे। इसके विपरीत, सावरकर ‘हिंदुत्व’ के प्रणेता थे। उनका नारा था-“हिंदूकरण और सेना का राष्ट्रीयकरण।” सावरकर का मानना था कि इस देश के नागरिक वही हो सकते हैं जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि भारत है। नेहरू को डर था कि सावरकर की यह विचारधारा भारत को एक बहुसंख्यकवादी धार्मिक राज्य में बदल देगी, जिससे देश का ताना-बाना बिखर सकता है।

स्वतंत्रता के तरीकों पर मतभेद

नेहरू महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन, सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह के रास्ते पर चल रहे थे। सावरकर ने गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत को ‘कायरतापूर्ण’ माना था। सावरकर का मानना था कि पूर्ण स्वतंत्रता केवल सशस्त्र क्रांति और सैन्य शक्ति के बल पर ही हासिल की जा सकती है। यही कारण था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सावरकर ने भारतीयों से ब्रिटिश सेना में शामिल होने की अपील की ताकि वे सैन्य प्रशिक्षण हासिल कर सकें, जबकि नेहरू और कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल फूंका था।

गांधी जी की हत्या और नेहरू का कड़ा रुख

दोनों के बीच की कड़वाहट 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद अपने चरम पर पहुंच गई। गांधी जी की हत्या की साजिश में सावरकर को भी सह-आरोपी बनाया गया था। हालांकि, साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने सावरकर को ससम्मान बरी कर दिया, लेकिन नेहरू सरकार ने सावरकर के प्रति अपना अविश्वास कभी कम नहीं किया। नेहरू ने सावरकर की विचारधारा को देश की अखंडता के लिए खतरा माना और उन्हें मुख्यधारा की राजनीति से अलग-थलग रखने का हरसंभव प्रयास किया।

क्या नेहरू ब्रिटिश समर्थक थे?

इतिहास के पन्नेसात्यकि सावरकर के इस आरोप पर कि ‘नेहरू ब्रिटिश समर्थक थे’, इतिहासकारों में तीखी बहस है। कांग्रेस और नेहरूवादी विचारकों का कहना है कि नेहरू ने अपने जीवन के लगभग 9 साल (3200 से अधिक दिन) अंग्रेजों की जेलों में बिताए। उन्होंने अहमद नगर किला, नैनी और अल्मोड़ा जेल में कठोर समय काटा। हालांकि, सावरकर समर्थक इतिहासकारों का तर्क है कि नेहरू की जेल यात्राएं ‘ए’ क्लास कैदी के रूप में होती थीं, जहां उन्हें लिखने के लिए किताबें, पेन और कुछ सुविधाएं मिलती थीं, जो सावरकर को मिलीं ‘काला पानी’ की यातनाओं के मुकाबले बेहद सामान्य थीं। इसके अलावा, आजादी के बाद भारत का कॉमनवेल्थ (राष्ट्रमंडल) का सदस्य बने रहने के नेहरू के फैसले को भी दक्षिणपंथी विचारक उनकी ब्रिटिश मानसिकता का विस्तार बताते हैं।

समकालीन राजनीति पर प्रभाव

सावरकर मानहानि का यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह भारत के इतिहास को फिर से लिखने और नायक-खलनायक की परिभाषा बदलने का एक राजनीतिक प्रयास भी है। वर्तमान समय में जहां भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) वीर सावरकर को ‘राष्ट्ररत्न’ के रूप में स्थापित कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस नेहरू की धर्मनिरपेक्ष विरासत को बचाने के लिए सावरकर के माफीनामों को ढाल बना रही है। सात्यकि सावरकर के ताजा बयानों ने कांग्रेस को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर किया है, क्योंकि अब लड़ाई केवल सावरकर के आत्मसमर्पण पर नहीं, बल्कि नेहरू के राष्ट्रवाद की प्रामाणिकता पर भी टिक गई है।

वैचारिक मतभेदों का आगामी प्रभाव

इतिहास गवाह है कि नेहरू और सावरकर दोनों ने अपने-अपने तरीकों से भारत की नियति को प्रभावित किया। सावरकर का राष्ट्रवाद जहां सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति पर आधारित था, वहीं नेहरू का राष्ट्रवाद आधुनिक संस्थाओं और औद्योगिक प्रगति पर केंद्रित था। सावरकर के पड़पोते द्वारा नेहरू को ब्रिटिश समर्थक बताना इस वैचारिक युद्ध की सबसे नवीनतम और तीखी कड़ी है। अदालत का फैसला जो भी हो, लेकिन भारत के इन दो दिग्गजों के विचारों का टकराव आने वाले कई दशकों तक देश की राजनीति और जनमानस को आंदोलित करता रहेगा।

अदालती सुनवाई का महत्व

इस मामले की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि भारतीय राजनीति में सावरकर का स्थान कितना महत्वपूर्ण है और उनके खिलाफ उठाए गए दावों का सत्यापन कैसे किया जाएगा। यह मामला सावरकर के जीवन और उनके कार्यों को एक नया मोड़ दे सकता है, जिससे वह भारतीय इतिहास में एक और विवाद का केंद्र बन रहे हैं।

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